31 अक्तूबर, 2010

मैं लिखती हूँ तेरे लिये

सब लिखते हैं स्वयं के लिये ,
आत्म संतुष्टि के लिये ,
पर मैं लिखती हूँ तेरे लिये ,
कहीं तेरा लगाया यह पौधा ,
मुरझा ना जाये ,
तू उदास ना हो जाये ,
रोज पानी देती हूँ ,
खाद देती हूँ ,
तेरे उगाए पौधे को ,
बहुत प्यार करती हूँ ,
मुरझाये पीले पत्तों की ,
काट छाँट करती हूँ ,
बस रह जाते हैं ,
हरे-हरे नर्म-नर्म,
कोमल मखमली पत्ते ,
अब तो फूल भी आ गये हैं ,
फल की आशा रखती हूँ ,
जिस दिन पहला फल आयेगा ,
तुझे ही समाचार दूँगी ,
तेरी देखरेख बगिया की ,
व्यर्थ नहीं जाने दूँगी ,
मेहनत से नहीं डरती ,
पूरी शक्ति लगा दूँगी ,
यह पेड़ फलफूल रहा है ,
दूसरा बोने की इच्छा है ,
उन्नत बीज तुझी से मिलेगा ,
खाद पानी की जुगत करूँगी ,
तभी वह चेत पायेगा ,
दिन रात बड़े जतन से ,
उसकी भी सेवा करूँगी ,
सबसे रक्षा करूँगी ,
सुगन्धित पुष्पों से जब ,
वह भी लड़ जायेगा ,
तुझे और उन सब को ,
जो प्रोत्साहित करते हैं ,
दिल से साधुवाद दूँगी !


आशा

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ ही एक सशक्त सन्देश भी है इस रचना में।

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  2. जीवन में आगे बढ़ने की अभिलाषा -
    सुंदर कृति-
    शुभकामनाएं

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  3. बहुत ही बहतरीन कविता हैँ। आपने लाजबाव सन्देश संजोया हैँ। बहुत बहुत आभार! -: VISIT MY BLOG :- मैँने अपने ब्लोग "Sansar" पर नई गजल पोस्ट की है....... जुबाँ की खामोशी। इसे पढ़ने के लिए आप आमंत्रित हैँ। http://vishwaharibsr.blogspot.com

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  4. आशा माँ,
    नमस्ते!
    अच्छी लगी....
    ये 'तू' है कौन?
    आशीष
    ---
    पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!

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  5. बहुत धन्यवाद इतनी सुन्दर प्रस्तुति के लिये ! मेरी बगिया की इतनी सुन्दर देखभाल के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ! यह भी तो देखिये कि एक खूबसूरत पौधे का नन्हा सा बीज बो देने मात्र से वीरान उपवन में कैसी रौनक और बहार आ गयी है ! जिसकी बगिया महक रही है वह तो सुखी है ही ! जिसने बीज बोया वह भी कृत कृत्य है ! इसकी सुगंध दिग्दिगंत में फैले यही शुभकामना है ! मधुर फलों की भी अपेक्षा है ! आशा है जल्दी ही मिलेंगे ! इतनी प्यारी रचना के लिये हृदय से बधाई एवं धन्यवाद !

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