14 दिसंबर, 2010

खुलने लगे हैं राज

खुलने लगे हैं राज़ अब ,
अब उस किताब के ,
अनछुए पन्नों के ,
हर पन्ने पर थीं कुछ लाइनें ,
पेन्सिल से चिन्हित ,
वे ही पढ़ ली जाती थीं ,
और रस्म अदाई हो जाती थी ,
उसे पढ़ने की ,
जो पन्ने छुए नहीं गये ,
जानने क़ी इच्छा ज़रूर थी ,
लिखा है क्या उनमें ,
लगने लगा तुझ से मिल कर ,
कहीं भूल हुई है ,
पुस्तक को पढ़ने में ,
उसका तो हर शब्द बोलता है ,
तेरे मन में क्या था ,
कैसी अभिव्यक्ति थी ,
और अनुभवों का ,
रिसाव था कृति में ,
सच कहूँ अब लग रहा है ,
तुझमें और उसमें ,
है कितना अधिक साम्य ,
एक-एक शब्द यदि नहीं पढ़ा ,
उस पर विचार नहीं किया ,
तब समझना बहुत कठिन है ,
तुझे और तेरी किताब को ,
और उसमें छिपे राज़ को |


आशा




,

8 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय आशा माँ
    नमस्कार !
    खुलने लगे हें राज अब ,
    अब उस किताब के ,
    अनछुए पन्नों के
    .........बहुत खूब, लाजबाब !

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  2. .

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !
    आभार।

    .

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  3. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति..वाह!

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  4. सच कहूँ अब लग रहा है ,
    तुझ में और उसमे ,
    है कितना अधिक साम्य ,

    यह सब पढ़ने के बाद ही पता चलता है ...अच्छी अभिव्यक्ति

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  5. बहुत सुन्दर ढंग से अभिव्यक्त किया है। आभार,

    जवाब देंहटाएं
  6. अरे वाह ! यह किसकी बात हो रही है और किसके राज़ बेपर्दा हो रहे हैं ? बहुत ही सुन्दर रचना है ! देर से ही सही किसी को सही रूप में जाना तो सही ! बहुत खूब ! देर से आये दुरुस्त आये !

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