23 अक्तूबर, 2010

पर्वत पर बिछी सफेद चादर

पर्वत पर बिछी श्वेत चादर ,
और धवल धरा सारी ,
लगती बेदाग़ सफेद चादर सी ,
है सिंधु उदगम यहीं पर ,
यह है रेगिस्तान बर्फ का ,
दुनिया की सबसे ऊँची सड़क ,
जिस पर गुजरते वाहन ,
नहीं वह भी अछूती बर्फ से ,
यदि विहंगम द्रष्टि डालें ,
दिखती है बिछी सफेद चादर सी ,
जाड़ा कम ही लगता है ,
जब गुजरते सड़क से ,
फिर भी भय रहता है ,
कहीं फिसल ना जाएं ,
कोई हादसा ना हो जाए ,
गाड़ी ,पिघलती बर्फ ,
और बर्फीला द्रश्य ,
कहीं कहीं पानी सड़क पर ,
धीमी गति से गाडी बढ़ना ,
लगता है पैदल चल रहे हें ,
एक ओर दीवार बर्फ की ,
दूसरी ओर गहरी खाई ,
रूह कांप जाती है ,
जब दृष्टि पडती खाई पर ,
वहाँ बने बंकरों में ,
रहते देश के रक्षक ,
होता जीवन कठिन उनका ,
पर सच्चे निगहवान देश के ,
सदा प्रसन्न होते हें ।
जब मिलते किसी भारत वासी से ,
देख उनकी कठिन तपस्या ,
श्रद्धा से नत होता मस्तक |
आशा

22 अक्तूबर, 2010

है जीवन काँटों की बस्ती ,

है जीवन काँटों की बस्ती ,
जो भी इस में रहता है
,बच नहीं पाता उनसे ,
एक ना एक चुभ ही जाता है ,
सहन करना है बहुत कठिन ,
मिलता दंश जो उससे ,
कभी नहीं मिट पाता |
है जीवन दुखों का समुन्दर ,
यदि तैरना नहीं आता ,
कोई बाहर निकल नहीं पाता ,
तब डूब ही जाना है ,
व्यर्थ है हाथ पैर मारना |
हर ओर निराशा ही हो ,
आशा की किरण,
न दिखाई दे ,
हो छुपी कहीं गहरे में ,
उसकी एक झलक पा कर ,
जीवन हरा भरा होता है ,
पर है वह क्षणिक ,
उसमे यदि खो जाओ ,
स्वयं को भी भूल जाओ ,
ढेरों खुशियाँ आ सकती हें |
पर जीना केवल अपने लिए ,
है नहीं उचित किसी के लिए ,
है परोपकार भी आवश्यक ,
थोड़ा हित किसी का हो ,
तब उसमे है बुराई क्या |
जो कुछ भी करोगे,
वह यादों में रह जाएगा ,
जो किया अपने लिए,
उसे ना कोई जानेगा ,
ना ही तुम्हें पहचानेगा ,
तुम कृपण समझे जाओगे ,
यदि काम किसी के ना आओगे |
विहंगम द्रष्टि डाल कर देखो ,
जिसने भी परोपकार किया ,
छोड़ कर दुनिया भी चल दिया ,
पर दुनिया ने उसे,
बारम्बार याद किया ,
यथोचित सम्मान दिया |
आशा

21 अक्तूबर, 2010

उन यादों में खो जायें

यहां आओ पास बैठो ,
हम उन यादों में खो जाएं ,
वे गीत गुनगुनाएं ,
जो कभी गाया करते थे ,
उन्हें रचते थे ,
एक दुसरे को,
सुनाया करते थे ,
जो प्यार छिपा था उनमें ,
आओ उसे फिर दोहराएं ,
मुझसे कहीं दूर न जा सकोगे ,
अटूट प्यार के बंधन को ,
यूं ठुकरा न सकोगे |
कैसे भुला पाओगे ,
जब भी यह मौसम आएगा ,
उन यादों को साथ लाएगा ,
बार बार वहीँ ले जाएगा ,
जहां कभी हम मिलते थे ,
अपनी रचनाएं गाते थे ,
कई धुनें बनाते थे ,
जब भी आँखें बंद करोगे ,
याद आएंगे वे लम्हें ,
आखें नम हो जाएगीं ,
उन्हें विदा ना कर पाओगे ,
ऐसा कुछ भी तो नहीं था ,
जिसे सच समझ बैठे ,
कुछ ऐसा कर गए ,
जिसे सोचना भी कठिन था |
अब सीख लिया है ,
वह चर्चा कभी ना हो ,
जो दिल में चुभ जाए ,
घाव कर जाए ,
हमें दुखी कर जाए |
कभी लव पर ,
वे बातें नहीं आएंगी ,
गैरों के समक्ष ,
चर्चा का विषय,
ना बन पाएंगी ,
चिंता नहीं है ,
कि लोग क्या कहेंगे ,
पर बंधन यदि टूटा ,
मुझे मिटा कर रख देगा ,
जीवन वीरान कर देगा ,
है मेरी इच्छा बस इतनी ,
हम दौनों फिर से गीत लिखें ,
पहले से प्यार मैं खो जाएं |
मेरी न अधूरी चाह छोड़ ,
तुम कहीं भी ना जा सकोगे ,
यदि भूले से हुआ ऐसा ,
मुझे कभी ना पा सकोगे ,
फिर एकाकी कैसे रह पाओगे |
आशा

19 अक्तूबर, 2010

है कितना आकर्षण

तुम नहीं जानतीं ,
है कितना आकर्षण,
समझो या ना समझो ,
मैं कुछ कहना चाहता हूं ,
तुम्हें मांगना चाहता हूं ,
हूं बहुत उलझन में ,
क्या करूं ,किससे कहूं ?
दिन तो कट ही जाता है ,
पर रात काटना बहुत कठिन है ,
मैं तुम्ही में खोया रहता हूं ,
सपनों में तुम्हें देख,
नींद भी धोख दे जाती है ,
तुम्हारी कही हर बात ,
बार बार याद आती है ,
है कारण इसका क्या ,
मुझे नहीं मालूम ,
दिन में याद कहां जाती है ,
रात में ही क्यूं आती है ,
मैं नहीं जानता ,
मेरे लिए क्या सोचा तुमने ,
क्या विचार तुम्हारे मन में ?
पर है इतना अवश्य ,
आकर्षण प्रेम नहीं होता ,
उसे पाने के लिए ,
होता आवश्यक,
मध्यस्त का होना ,
अभी तक सोच नहीं पाया ,
आखिर वह होगा कौन ,
जो तुम तक पहुंचाएगा ,
तुम से संबंध जुड़वाएगा,
यदि तुम भी चाहो ,
और तुम्हारी इच्छा हो,
तभी कोई बात होगी ,
मेरी चाहत पूर्ण होगी ,
अनचाहा रिश्ता नहीं चाहता ,
हो कोई बोझ ह्रदय पर ,
मैं ऐसा भी नहीं चाहता ,
हो संबंध ऐसा,
जिसमें सहमत दौनों हों ,
खुशियां ही खुशियां हों ,
तभी सार्थक होता है ,
सफलता की,
प्रथम सीड़ी होता है |
आशा

17 अक्तूबर, 2010

हुई सुबह सूरज निकला

हुई सुबह सूरज निकला ,
हुआ रथ पर सबार ,
धीमी गति से आगे बढ़ा ,
दोपहर में कुछ स्फूर्ति आई ,
फिर अस्ताचल को चला ,
और शाम होगई ,
मन की बेचैनी और बढ़ गई ,
एकाकी सदासे रहता आया ,
ना कोई संगी नाकोई साथी ,
सूना घर सूना चौराहा ,
था बस तेरा इन्तजार ,
पर तू भी ना आया ,
सुबह से शाम यूंही होगी ,
बिना बात की सजा होगई ,
राह देख थक गई आँखें ,
मन पत्थर सा होने लगा ,
पर आशा की एक किरण ,
कहीं छिपी मन के अंदर ,
उसकी एक झलक नजर आई ,
जब दस्तक दी दरवाजे पर ,
होने लगा स्पंदित मन ,
देख तुझे अरमान जगे ,
मन को कुछ सुकून मिला ,
पत्थर पिघला मोम हुआ ,
सारी बेचैनी सारा गुस्सा ,
जाने कहां गुम हो गया ,
मेरी बगिया गुलजार कर गया |
आशा







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