22 जनवरी, 2011

कोई नहीं समझ पाया

उगता सूरज धीरे-धीरे
चढ़ता ऊपर धीमी गति से
पर अस्ताचल को जाता
इतनी तीव्र गति से
कब शाम उतरी आँगन में
जान नहीं पाई वह |
ऐसा ही कुछ हुआ है
उसकी भी जिंदगी में
थी नन्ही नाजुक गुड़िया सी
ठुमक-ठुमक चलती घर में
किलकारियों से दूर बहुत
गुमसुम रहती घर बाहर में|
एकांत उसे अच्छा लगता
किसी के समक्ष जब आती
चुप रहती कुछ सकुचाती
ना कोई मित्र ना ही सहेली
रहती नितांत अकेली
वह भावनाओं का साझा
किसी से भी कर पाई
मन में दबे हुए अहसास
भी किसी से बाँट पाई |
उसके मन में क्या है
अंदाज कोई लगा पाया
जब भी कोई बात उठी
उसे ही दोषी ठहराया
मन कि स्थिति है क्या उसकी
यह भी ना जानना चाहा |
वह तनाव ग्रस्त
रह कर जिये कैसे
समझ नहीं पाती
अस्त होते सूरज की तरह
खुद को डूबता पाती
विचलित मन
कुछ करने नहीं देता
यदि करना चाहे
समाज अतीत के जख्मों से
उबरने भी नहीं देता |
बहुत अकेली हो गई है
यही सोचती रहती है
उसका भविष्य क्या होगा
जब कोई भी सहारा होगा
क्या कभी वह
इतनी सक्षम हो पायेगी
अपने निर्णय स्वयं लेने की
क्षमता जुटा पायेगी |

आशा



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6 टिप्‍पणियां:

  1. .

    हिम्मत जुटानी ही पड़ती है। खुद को सक्षम बनाना ही पड़ता है। सहारे की तलाश में बेसहारा ही रह जाता है इंसान।

    जो गिर-गिर का संभालना सीख लेते हैं, वही इस सुन्दर वसुंधरा का उपभोग कर पाते हैं।

    .

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  2. आदरणीय आशा माँ
    नमस्कार !
    ...खुद को सक्षम बनाना ही पड़ता है

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  3. सच्चाई को दर्शाती हुई ........ सुन्दर कविता।

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  4. बहुत सार्थक रचना..लेकिन हिम्मत तो जुटानी ही होगी..आज के समय में किससे सहारे की आशा की जा सकती है...अपने ही को समर्थ बनाना पड़ेगा..आभार

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  5. परावलम्बी होने की अपेक्षा आत्मनिर्भर होना कहीं अधिक बेहतर है ! सुन्दर और सार्थक रचना ! मेरी बधाई एवं शुभकामनाएं !

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