30 जून, 2011

नार बिन चले ना

नार कटवाती दाई ,जन्म होता सुखदाई

मनुष्य जीवन पाया ,यूं व्यर्थ जाए ना |

वह सुन्दरी सुमुखी ,सज सवर चल दी

रीत यहाँ की जाने ना ,चाल सीधी चले ना |

उसकी नागिन जैसी ,बल खाती लंबी वेणी

मुख में बीड़ा दबाना ,बिना हंसे चले ना |

मंद मंद मुस्काना ,ध्यान कहीं भटकाना

गुमराह होती जाना ,मार्ग है अनजाना |

मन में होती अशांति ,तूती बजे ना फिर भी

प्रभु के भजन गाना ,नार बिन चले ना|

आशा

20 टिप्‍पणियां:

  1. मन में होती अशांति ,तूती बजे ना फिर भी

    प्रभु के भजन गाना ,नार बिन चले ना|

    बेहतरीन !

    सादर

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  2. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  3. सुन्दर मनोभाव की कविता ,बधाई

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  4. मन में होती अशांति ,तूती बजे ना फिर भी

    प्रभु के भजन गाना ,नार बिन चले ना|

    सुन्दर रहस्मय प्रस्तुति.आनंद आ गया.
    रहस्य का जरा पर्दा उठे,तो आनंद का वेग और बढे

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  5. आदरणीय आशा माँ
    नमस्कार !
    सुन्दर रहस्मय प्रस्तुति....
    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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  6. करीब १५ दिनों से अस्वस्थता के कारण ब्लॉगजगत से दूर हूँ
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

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  7. सोंचने को मजबूर करती रचना ...बधाई आपको !

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  8. बढ़िया प्रयास है ! अच्छा लिखा है ! पढ़ कर आनंद आया ! बधाई !

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  9. बहुत सुन्दर गीत... वाकई नारी जननी है श्रृष्टि की

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