07 फ़रवरी, 2011

आशा की किरण

नित आती जाती समस्याएँ
उनका निदान या समाधान
कर सकते हो यदि
और सांझा कर सकते हो उनसे
तभी नजदीकियाँ बढ़ाना
वरना ना छेड़ना तार दिल के
बिना बात ना उलझाना
अजनबी सा व्यवहार करके |
है समय बड़ा बलवान
हर पल कीमती है
उसे ही यदि भुला दिया
वह लौट कर ना आएगा |
अपनी उलझनें सुलझाने के लिए
होता हर व्यक्ति सक्षम
सांझा अपनों से होता है गैरों से नहीं
यदि सही सलाह ना दे पाये
साथ रहना क्या आवश्यक है |
जो जाल बुना अपने आसपास
चाहती नहीं उसमें उलझ कर रह जाऊँ
प्रयास यदि कुछ तुम भी करते
कुछ भ्रम मेरे भी टूटते
गुत्थी सुलझाने का अवसर मिलता
तभी समस्या हल होती
आशा की किरण नजर आती
सोये अरमान जगा पाती |

आशा

05 फ़रवरी, 2011

आया वसंत



मंद-मंद वासंती बयार
नव किसलय करते सिंगार
नए पुराने वृक्षों का
हुआ संकेत वसंत आगमन का |
हरी भरी सारी धरती
रंगीन तितलियाँ विचरण करतीं
पुष्पों पर यहाँ वहाँ
रस रंग में डूबीं वे
मन को कर देतीं विभोर |
पुष्पों की आई बहार
कई अनोखे रंग लिये
पीली सरसों पीले कनेर
शेवंती की मद मस्त गंध
गेंदे की क्यारी हुई अनंग|
होते ही भोर सुन कोयल की तान
मन होता उसमें साराबोर
है संकेत वसन्त आगमन का |
वीणा पाणी को करते नमन
कलाकार कवि और अन्य
पीली साड़ी में लिपटी गृहणी
दिखती व्यस्त गृहकार्य में,
मीठे व्यंजन बना
करती स्वागत वसंत ऋतु का |
वासंती रंग में रंगा हुआ
खेलता खाता बचपन
माँ सरस्वती के सामने
प्रणाम करता बचपन |
है दिन वसंत पंचमीं का
माँ शारदे के जन्म का
सुहावनी ऋतु के
होते आभास का |

आशा

04 फ़रवरी, 2011

सफलता

बहुत कुछ खोना पड़ता है
एकलव्य की तरह
आगे बढ़ने लिये |
राह चुननी पड़ती है
उस पर चलने के लिये |
होता आवश्यक
नियंत्रण मन पर
भटकाव से बचने के लिये
ध्यान केन्द्रित करने के लिये |
किसी कंधे का सहारा लिया
और बन्दूक चलाई भी
तब क्या विशेष कर दिया
यदि अपनी शक्ति दिखाई होती
सच्चाई सामने होती |
झूठा भरम टूट जाता
निशाना सही था या गलत
स्पष्ट हो गया होता |
सफलता चूमती कदम उसके
जो ध्यान केन्द्रित कर पाता
मनन चिंतन उस पर कर पाता |
जो भी सत्य उजागर होता
उस पर सही निर्णय लेता
यही क्षमता निर्णय की
करती मार्ग प्रशस्त उसका |
उस पर कर आचरण
जो भी फल वह पाता
शायद सबसे मीठा होता |
है सफलता का राज़ यही
कभी सोच कर देखा होता |

आशा









01 फ़रवरी, 2011

है कौन दोषी

पैर पसारे भ्रष्टाचार ने
अनाचार ने,
नक्सलवादी उग्रवादी
अक्सर दीखते यहाँ वहाँ |
कोई नहीं बच पाया
मँहगाई की मार से ,
इन सब के कहर से
भटका जाने कहाँ-कहाँ |
जन सैलाब जब उमड़ा
इनके विरोध में
पर प्रयत्न सब रहे नाकाम
होता नहीं आसान
इन सब से उबरना |
है यह एक ऐसा दलदल
जो भी फँस जाता
निकल नहीं पाता
दम घुट कर रह जाता |
यह दोष है लोक तंत्र का
या प्रदेश की सरकार का
या शायद आम आदमी का
सच्चाई है क्या ?
जानना हो कैसे सम्भव
हैं सभी बराबर के दोषी
कोई नहीं अछूता इन से
जब खुद के सिर पर पड़ती है
पल्ला झाड़ लेते हैं |
असफल गठबंधन सरकारें
नेता ही नेता के दुश्मन
ढोल की पोल खोल देते
जब भी अवसर हाथ आता |
आम आदमी
मूक दृष्टा की तरह
ठगा सा देखता रहता
देता मूक सहमति
हर बात में |
क्या दोषी वह नहीं ?
वह विरोध नहीं कर पाता
मुँह मोड़ लेता सच्चाई से
इसी लिए तो पिस रहा है
खुद को धँसता पा रहा है
आज इस दल दल में |

आशा