06 मई, 2012

महिमा अति की

रसना रस में पगी 
शब्दों में मिठास घुली 
आल्हादित मन कर गयी 
सुफल सकारथ कर गयी
पर अति मिठास से 
कानों में जब मिश्री घुली 
हुआ संशय मन में
पीछे  से कोई वार न कर जाए 
अति मिठास कडवी लगी 
दरारें दिल में दिखीं 
तभी जान पाए 
महिमा अति की |
सच  ही कहा था किसी ने
"अति सर्वत्र वर्ज्यते"
पर तब केवल पढ़ा था
आज उसे देख पाए |
आशा


04 मई, 2012

बंधन

 
 ये  घुंघरू बंधन  पैरों के
 ना पहले बजे ना आज
डाले गए  पायलों में
फिर भी बेआवाज
हें ना जाने क्यूँ मौन ?
शायद इसलिए कि
पहनने वाली भी रहती मौन
भाग्य सराहा जाता उसका
होती चर्चा रूप की
सजे पैर पायलों से
यूँ तो आकर्षित करते
घुँघरू तब भी रहते मौन
कोई नहीं जानता
मुराद उसके मन की
रहती सदा अपूर्ण
निराशा ने डेरा डाला
उदासी से पड़ा पाला
 है परकटे पक्षी सी
कैद चार दीवारी में
उड़ नहीं सकती
 है परतंत्र  इतनी
मन की कह नहीं सकती
सोच नहीं पाती
 घर के बाहर भी
 है एक और  जहाँ
ग़मों के अलावा भी
 हैं खुशियाँ वहाँ
 प्रारब्ध का यह खेल कैसा
या फल अनजाने कर्मों का
सब को  सहन करना
आदत सी हो गयी है
ओढ़े आवरण दिखावे का
दिन तो कट ही जाते हैं
है यह कैसा बंधन
लोग ऐसे भी जी लेते हैं |
asha