06 जून, 2012

निडर


हो निडर घूम रही   
जंगल  की पनाह में 
आवाज से दहशत भरती
लोगों के दिलों  में
पर क्या वह माँ नहीं 
उसे ममता का 
लेशमात्र भी अहसास नहीं ?
पर ऐसा कुछ नहीं
हैं ममता के रूप अनेक
वह  भी  है  सतर्क माँ 
सहेज रही अपने बच्चों को 
सचेत कर रही उन्हें
 आने वाले खतरों से 


वह  जानती है अभी छोटे हैं
  दुनिया की रीत नहीं जानते
यहाँ के रास्ते नहीं पहचानते
यदि इधर उधर भटक गए
सुरक्षा होगी कठिन
शायद इसी लिए 
  साथ लिए फिरती है
यदि कोई अंदेशा हो 
सचेत उन्हें करती है |

आशा 



04 जून, 2012

है वह कौन




हूँ एक अनगढ़ खिलोना
बनाया सवारा बुद्धि दी
किसी अज्ञात शक्ति ने
पर स्वतंत्र न होने दिया
बुद्धि जहाँ हांक ले गयी  
उस ओर ही खिंचता गया
राह की बाधाओं से
पार पाने के लिए
सफलता और असफलताओं के
  बीच  ही झूलता रहा
जीवन के रंग उन्हें मान
बढता जा रहा हूँ 
अंधकार में डूबा
उन्हें नहीं मानता
प्रकाश की खोज में
अग्रसर होना चाहता
है वह कौन
जो संचालित करती मुझे
उसे ही खोज रहा हूँ
हर कठिन वार सह कर भी
 बचता  रहा हर बार
जीना चाहता हूँ
क्यूं कि हूँ मनुष्य
वही बना रहना चाहता हूँ |

आशा 

01 जून, 2012

यादें भर शेष रहा गईं

 सपनों की चंचलता बहुत कुछ
सागर की उर्मियों सी
भुला न पाई उन्हें
कोशिश भी तो नहीं की |
बार बार उनका आना
हर बार कोई संदेशा लाना
मुझे बहा ले जाता
किसी अनजान दुनिया में |
उसी दुनिया में जीने  की ललक
बढ़ने लगती ले जाती  वहीँ
 अचानक एक ठहराव आया
 मन के गहरे सागर में |
फिर चली सर्द हवा
उर्मियों ने सर उठाया
आगे बढ़ीं टकराईं
पर हो हताश लौट आईं |
यह ठहराव बदल गया
समूंचे जीवन की राह
अब न कोई स्वप्न रहे
ना ही कभी याद आए |
भौतिक जीवन की
 जिजीविषा की
बेरंग होते  जीवन की
 यादें भर शेष  रह गईं |

आशा