17 अक्तूबर, 2018

सबब अशांति का

 अनगिनत जल कण उड़ते
बहते हुए झरने से
कोलाहल बेबजह होता
गिरते हुए निर्झर से
कुछ ऐसा ही हाल हुआ
प्रश्नों का अम्बार लगा
क्यूँ ? क्या ,किस लिए
किसके लिए और
 न जाने क्या क्या ?
क्या लाभ बेमतलब
प्रश्न करने का
जब सही उत्तर  न मिले
उत्सुकता तो शांत न होगी
छोटी छोटी बातें
मन में घर कर जाएगी जाएंगी
विकृत रूप में सामने आएंगी
-सार कुछ न निकलेगा
ज्ञान पिपासा शांत न होगी
आँखों देखा सच
 कानो सुनी झूट
बिनाबात बातों को तूल देना
है कहाँ की सभ्यता
बात का बतंगड़ बनाना
शोभा नहीं देता
कुछ तो सबब हो
कारण जब स्पष्ट होगा
बातों में वजन होगा
ठोस सबूत होगा
ब्यर्थ अनर्गल बातों से
कुछ लाभ नहीं होता
सबब बहस का
 स्पष्ट होना चाहिए
व्यर्थ की बातों में
कुछ हासिल  नहीं होता
बस व्यर्थ  बहस का   मुद्दा
अशांत मन करता
अकारण बहस का सबब
 प्रदूषण ही बढ़ता
बात बात में मन में
दरार आ जाती  है
जो बढ़ती ही जाती  है
प्रश्न वहीं रह जाते है
उत्तर नहीं मिल पाते
हम मुद्दे से भटक जाते हैं|
झूठे वादों पर टिक नहीं पाते
यह भी भूल जाते हैं कि
 यहाँ आने का सबब क्या था
सब की नज़रों से गिर जाते हैं |


आशा







16 अक्तूबर, 2018

न जाने किसकी नजर लगी



मेरी खुशियों को
न जाने किस की
नजर लगी 
सह न पाए लोग
मैं जब हंसी |
रोने पर तो बहुत
तसल्लियाँ मिलीं 
पर सब सतही
बातों की दूकान लगीं |
खिल्ली उड़ाने से
 खुदको रोका क्यूँ कि
दोनो हाथ बंधे हैं
 संस्कारों से |

आशा

15 अक्तूबर, 2018

दशहरा


दशहरा मिलन
की बेला आई 
बड़ा था बच्चों को 
इंतज़ार इसका 
नए कपडे,नए जूते
  और  मिठाई 
पाने को था
बेकरार मन 
सबसे बड़ा लालच था 
रावण दहन 
करने जाने का 
वहां पहुँच 
राम जी की सवारी 
देखने का 
दस शीश
 क्या सच में
 होते रावण के ?
हर बार यही प्रश्न 
मन में उठता था 
पर किसी के उत्तर से
 न होती संतुष्टि 
पर दशहरा मैदान जाने की 
उत्सुकता कम न होती 
रोजाना दिन गिन कर 
कटते दिन |
आशा

14 अक्तूबर, 2018

मन चाहता








+



काली कजरारी
 आँखें तेरी
 गहराई उनमें
झील सी 
 मनमोहक 
अदाएं उनकी
उनमें डूब जाने
 को दिल होता
अधर तेरे
 सुर्ख गुलाब से
  दंतपंक्तियाँ
 अनार सी

अधर चूमने  का
 मन होता
काली जुल्फों से
ढका मुख मंडल
प्यार दुलार से
 बड़े जतन से 
उन्हें सम्हालने को
 मन चाहता 
मीठी मधुर
 स्वर लहरी तेरी 
सुनते रहने को 
मन चाहता |
आशा



10 अक्तूबर, 2018

उलझन







ज़िन्दगी की तंग गलियों में
पग धरते ही उलझने ही उलझने
जब तब शूल सी चुभतीं हैं
कर देती हैं लहूूलुुहान पैरों को
छलनी तन मन को
एक समस्या हल न होती
दूसरी मुँँह फाड़ हो जाती उपस्थित
धीरे धीरे आदत हो जाती
उलझनों के साथ जीने की
बीच में गत्यावरोध अवश्य
सहन करने होते
कभी मन असंतुष्ट होता
ऐसी क्या जिन्दगी
कभी प्रसन्न न हो पाते
पर हिम्मत नहीं हारते
समस्याओं का 
कभी तो अंत होगा
रोज़-रोज़ की उलझनों से
छुटकारा मिलेगा |

आशा