08 जून, 2010

इंतजार तुम्हारा

तुम्हारी याद में हर शाम गुजारी मैंने
सारी दुनिया से दूर रहा
रुसवाई का सबब बना
तुम आये मायूस किया
अपने को मुझ से दूर किया |
आने के बहाने अनेक
नया बहाना रोज एक
पर समझाना पड़ता मन को
शायद तुम जाओ
इंतजार रहता मुझ को |
गिटार पर कई धुनें बजाईं मैंने
अपलक जाग रातें गुज़ारीं मैंनें
तेरी याद में धुनें आह में बदल जायें
कहीं मेरी आखें नम कर जायें |
हाल मेरा सब देख रहे
मुझ पर हँस कर यह सोच रहे
है यह कैसा परवाना
लगता है किसी शमा का दीवाना
मर मिटने का मन बना बैठा
अपनी सुध बुध खो बैठा |
देर कितनी भी हो चाहे
शाम, रात फिर सुबह हो जाये
अनवरत गिटार बजाता रहूँगा
और तुम्हारा इंतजार करूँगा
ये धुनें तुम्हें खींच लायेंगी
मन के तार झंकृत कर जायेंगी |


आशा

,

07 जून, 2010

संग्रह यादों का


कुछ तो ऐसा है तुममें
तुम्हारी हर बात निराली है
कोई भावना जागृत होती है
एक कविता बन जाती है
लिखते-लिखते कलम न  थकती
हर रचना कुछ कह जाती
मुझको स्पंदित कर जाती 
है गुण तुममें सच्चे मोती सा
निर्मल सुंदर चारु चंद्र सा
एक-एक मोती सी 
तुम्हारी  लिखी हर  कविता
कैसे चुनूँ और पिरोऊँ 
फिर उनसे माला बनाऊँ
 माला में कई होंगे मनके 
 किसी न किसी की कहानी कहेंगे
संग्रह उन सब का करूँगा
और रूप पुस्तक का दूँगा
हर कृति कुछ बात कहेगी
मन को भाव विभोर करेगी
तुम्हारी याद मिटने ना दूँगा
हर किताब सहेज कर रखूँगा |


आशा

06 जून, 2010

आँखें तेरे मन का दर्पण

आँखें तेरे मन का दर्पण ,
चेहरा किताब का पन्ना ,
जो चाहे पढ़ सकता है ,
तुझको पहचान सकता है |
आँखें हैं या मधु के प्याले ,
पग-पग पर छलके जाते ,
दो बूँद अगर मैं पी पाता ,
आत्म तृप्ति से भर जाता |
तेरी आँखों का पानी ,
यह सादगी और भोलापन ,
बरबस खींच लाता मुझको ,
काले कजरारे नयनों की भाषा ,
मन की बात बताती मुझको |
उन में क्यूँ न डूब जाऊँ ,
आँखों में पलते सपनों को ,
तुझ में खोजूँ , मैं खो जाऊँ |
जब नयनों से नयन मिलेंगे ,
मन से मन के तार जुड़ेंगे,
अनजाने अब हम न रहेंगे ,
सुख दुःख को मिल कर बाटेंगे ,
साथ साथ चलते जायेंगे |
खुशियों से भरे ये नयना तेरे ,
जीवन में नये रंग भरेंगे ,
हर खुशी तेरे कदमों में होगी ,
हम दूर क्षितिज तक साथ चलेंगे |


आशा

05 जून, 2010

बच्चा आज के बड़े शहर का

आज के युग में एक बड़े शहर में ,
सीमेंट, रेत लोहे से बने इस जंगल में,
रहने वाला बच्चा प्रकृति को नहीं जानता ,
रात में भय से छत पर नहीं जाता ,
यह सोच कर रोता है ,
चाँद तारे कहीं उस पर तो ना गिर जायेंगे !


आशा

महक गुलाब की

महकता गुलाब और गुलाबी रंग ,
सब को अच्छा लगता है ,
और सुगंध उसकी ,
साँसों में भरती जाती है ,
उसकी ओर हाथ बढ़ाती है ,
मेरा मन यह कहता है ,
जैसे हो तुम वैसे ही रहना ,
ऐ गुलाब तुम ,
कमल से ना हो जाना ,
जो कीचड़ में खिलता है ,
पर उसमें लिप्त नहींहोता ,
लक्ष्मी के चरणों में रहता ,
पर अपना प्यार न जता पाता ,
केश नायिका के न सजा पाता ,
तुम सा प्रेम न जता पाता ,
तुम चन्दन भी नहीं बनना ,
हो भुजंग से नेह जिसका ,
बेला, चमेली, हरसिंगार न बनना ,
जिनका जीवन क्षण भंगुर है ,
अमलतास के फूल ,
कई झुमकों में लटकते हैं ,
ना तो उनमें खुशबू है ,
ना हर मौसम में खिलते हैं ,
ना कभी उपहार बने ,
नहीं किसी का हार बने ,
तुम पलाश के फूल न होना ,
गुल मोहर जैसे ना होना ,
वे दूर से सुंदर दिखते हैं ,
तुम जैसे कभी न हो पाते ,
सुगंध तुम्हारी मनमोहक ,
इत्र तुम्हारा मन हरता ,
दूर-दूर तक खुशबू देता ,
मुझको सच में यह लगता है ,
तुम जैसा कोई नहीं होता ,
जब भी कोशिश की माली ने ,
तुम्हारा रूप बदलने की ,
तुमतो आकर्षक दिखने लगे ,
पर सुगंध साथ छोड़ गई ,
तुम जैसे हो वैसे ही रहना ,
बागों को सुरभित करते रहना ,
भवरों का गुंजन जब होगा ,
मंद हवा का झोंका होगा ,
खुशबू दिग्दिगंत में होगी ,
समा रंगीन हो जायेगा ,
ऐसा कोई फूल नहीं जग में ,
जो तुमसे तुलना कर पाता ,
तुम तो फूलों के राजा हो ,
काँटों में शान से जगह बनाते ,
हर अवसर पर सराहे जाते ,
इसी शान को जीवित रखना ,
कभी नष्ट न होने देना |


आशा

04 जून, 2010

सृजन चित्रों का

मै हूँ एक चित्रकार ,
रंगों से चित्र सजाता हूँ ,
मन कि उड़ान को जी भर कर,
चित्रों में दर्शाता हूँ ,
हर रंग अनूठा लगता है ,
जब वह उभर कर आता है ,
मेरा अंतस दर्शाता है ,
पूरा केनवास सज जाता है ,
सारे रंग जब मिल जाते है ,
अद्भुत दृश्य बनाते हैं ,
वे जो चाहे दिखलाते हैं ,
समायोजन सिखलाते हैं ,
मैं कल्पना में खोया रहता हूँ ,
हर क्षण विचार पनपते हैं ,
उन सब के मिल जाने से ,
कुछ नया बन जाने से ,
आयाम सृजन का बढ़ता है ,
मन स्पंदित होने लगता है ,
हर दिन कुछ नया करता हूँ ,
नई कल्पना आती है ,
मस्तिष्क पर छा जाती है ,
मन पंछी सा उड़ता है ,
नई दिशा मिल जाती है ,
एक और कृति बन जाती है ,
इन्द्रधनुष के सारे रंग ,
जब आकाश पर दिखते हैं ,
अपना रंग बिखेरते हैं ,
दृश्य मनोरम होता है ,
जब भी मैं उसको देखूँ ,
अपनी सुध बुध खो बैठूँ ,
मैं बहुरंगी चादर ओढ़ ,
उसमें खुद को लिपटा पाऊँ ,
जितने भी रंग भरे मैंने ,
उनकी छटा निराली है ,
स्मृति पटल पर जब छाए ,
मेरे चित्र सजाती है ,
रूमानी मुझे बनाती है ,
तूलिका और रंगों का मिश्रण ,
उस पर कोरा केनवास ,
जब रंगों का संयोजन होता है ,
मुझे व्यस्त कर जाता है ,
मेरे मन की उड़ान को ,
और दूर ले जाता है |


आशा

03 जून, 2010

फिर शिकायत क्यूँ

मरूभूमि सा मेरा जीवन ,
मृगतृष्णा बन कर तुम आये ,
जब-जब तुमको पाना चाहा ,
बहुत दूर नजर आये ,
मैंने अपना सब कुछ छोड़ा,
जब से तुमसे नाता जोड़ा,
जो चाहा था बन न सके
तुम्हारे ही हो कर रह गये ,
दुखों को भी झेला हमने ,
सुख से भी ना दूर रहे ,
जैसा तुमने चाहा था ,
वैसे ही बन कर रह गये ,
अपना अस्तित्व मिटा बैठे ,
खुद को ही हम भूल गये ,
फिर शिकायत क्यूँ करते हो ,
मैंने जो चाहा बन न सका ,
आपसी दूरी घटा न सका ,
क्यूँ गिले शिकवे करते रहते हो ,
साथ चलने का वादा क्यूँ नहीं करते ,
साथ रहेंगे क्यूँ नहीं कहते ?


आशा

02 जून, 2010

पथिक से

ऐ पथिक सुगंध की चाह में ,
प्रेम के प्रवाह में ,
उस ओर तुम जाना नहीं ,
जहाँ काँटे बिछे हों राह में |
उन पुष्पों से दूरी रखना ,
जो शूलों के साथ पले हों ,
वे कहीं किनारा ना कर लें ,
और काँटे तुम्हें छलनी कर दें |
उन पुष्पों से बच के रहना ,
जो छूते ही बंद कर लें तुमको ,
पूरी तरह निगल जायें ,
आत्मसात तुम्हें कर जायें|
उस राह भी तुम ना जाना ,
छुईमुई के पौधे हों जहाँ ,
तुम उनके जैसे ना बन जाना ,
स्पर्श मात्र से ना सकुचाना ,
अपना अस्तित्व ना खो देना |
जिस राह में बाधा अनेक ,
बाधा को शूल न समझ लेना ,
शूर वीर बन आगे बढ़ना ,
एक लक्ष्य को अपनाना ,
सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी ,
कीर्ति दिग्दिगंत में होगी |
ऐ पंथी मुझे भूल न जाना ,
यादों को न मिटने देना ,
अमित निशान जो पड़े पंथ पर ,
धूमिल उन्हें न होने देना ,
ना ही कभी मिटने देना |
तुममें साहस बहुत अधिक है ,
कुछ करने का जज़्बा भी है ,
उसे न कभी कम होने देना ,
गति को क्षीण न होने देना |
बीते कल को भूल न जाना ,
सब को सुरभित करते जाना |
आशा से रिश्ता रखना ,
निराशा पास न आने देना,
यदि कभी देखो मुड़ कर पीछे ,
तो अलविदा न कहना |


आशा

01 जून, 2010

आत्म संतुष्टि

चतरू नाम का एक किसान था |उसे किसी प्रकार की कोई चिंता न थी |तीनों बेटियांअपनी अपनी ससुराल में खुश थीं |
उसके कोई बेटा नहीं था पर उसका भी कोई दुःख उसे न था |वह अपनी पत्नी के साथ प्रसन्नता पूर्वक रहता था |
एक दिन अचानक उसकी पत्नी जमुना बीमार पड़ गई |बहुत इलाज करवाया पर चतरू उसे बचा न सका | वह बहुत अकेला महसूस करने लगा |हर समय अपनी पत्नी की यादों में खोया रहता |समय के साथ उसने भी अकेले रहने का अभ्यास कर लिया |एक दिन उसने सोचा कि क्यों न वह अपनी बेटियों से मिल आये |इसी बहाने बच्चों से मिलना भी हो जायेगा और उसका मन भी बहल जाएगा |
सबसे पहले वह अपनी बड़ीबेटी ग्रीष्म के घर गया |उसका विवाह एक कृषक से हुआ था |उस साल पानी की कुछ
कमी थी |जल संकट से कैसे निपटें सब इसी सोच विचार में ब्यस्त थे |जब चतुरू चलने लगा उसने अपनी बेटी से पूंछा कि वह जब तीर्थ करने जाए तब उसके लिए क्या मांगे |बेटी बोली ,"पिताजी आपको तो पता ही है बिना पानी के सारी खेती सूख जाती है |आप इश्यर से भरपूर बारिश के लिए प्रार्थना करना "|
चतरू अपनी दूसरी बेटी शशी के घर गया |वह अपने पिता से मिल कर बहुत खुश हुई |शशी का विवाह एक कुम्हार से
हुआ था |वे दौनों मटके बनाते ,धुप में सुखाते और फिर पका कर बाजार में बेचते थे |तीन माह कब निकल गए पता ही न चला |चलते समय शशी से पूंछाकि उसे क्या चाहिए |वह बोली ,"पिताजी जब आप भगवन से प्रार्थना करें मेरे लिए
एक ही बात मांगना ,चाहे जो हो पानी न बरसे |पानी से मेरा बहुत नुकसान हो जाता है |"
चतरू सोच विचार करता हुआ अपनी तीसरी बेटी वर्षा के पास पहुंचा |वह बहुत साधारण स्थिती में रहती थी |पति पत्नी
दौनों काम पर जाते थे तब जा कर घर चलता था |कुछ दिन रुक कर चतरू ने तीर्थ जाने की इच्छा प्रगट की ||
जब वह चलने लगा बोला ,"बेटी मैं तीर्थ करने जा रहा हूं ,तेरे लिए भगवन से क्या मांगूं |" बेटी बोली ,
"पिताजी इश्वर की कृपा से आवश्यकता पूरी हो इतना सब कुछ है मेरे पास |मुझे और अधिक कि कोइ आवश्यकता नहीं है |
आप तो ईश्वर से सब के कल्याण के लिए कामना करना |"अपनी बेटी कि बात सुनकर चतरू को बहुत प्रसन्नता हुई |वह प्रसन्न
मन तीर्थ यात्रा पर चल दिया |
सच है आत्म संतुष्टि से बढ़ कर दुनिया में कुछ नहीं होता |इश्वर सब देखता है |

आशा

31 मई, 2010

प्यार का बुखार

ऐसा कोई मापक न बना,

जो प्यार का बुखार उतार सके ,

कोई मानक पैमाना न हुआ ,

जो सही आकलन कर पाए |

विज्ञानं ने प्रगति कर ली है ,

मशीनें भी कई बना ली हैं

पर ऐसे उपकरण की खोज में ,

वह भी अभी तक असफल है |

अब तक कोई मशीन न बनी ,

जो प्यार की तीव्रता नाप सके ,

ऐसी कोई दवा न बनी,

जो प्यार का बुखार उतार सके |
मन में जिसने प्यार किया ,

और प्रगट न कर पाया ,

वह शायद सबसे असफल रहा ,

बाज़ी मार नहीं पाया |

जिसको प्यार जताना आया ,

उसने ही मीर मार लिया ,

पूरा-पूरा प्यार पाने का ,

केवल उसने ही अधिकार लिया |

इक तरफा प्यार प्यार नहीं होता ,

वह टिकाऊ भी नहीं होता ,

प्यार की आग में दोनों झुलसें ,

विरही मन दर-दर भटके ,

तब प्यार सोने सा तपता है ,

जीवन में खरा उतरता है ,

क्या होगा थर्मामीटर का ,

जब प्यार का बुखार उतर जाये ,

जब आँखों में प्यार छलकता है ,

समझने वाला ही समझता है ,

आँखें ही प्यार की भाषा समझती हैं ,

शायद प्यार का पैमाना होती हैं |



आशा







29 मई, 2010

अहंकार

अहंकारी खो देता सम्मान ,
ओर विवेक भी करता दान ,
"सब कुछ है वह"यही सोच ,
दूसरों का करता अपमान ,
अहंकार जन्मजात नहीं होता ,
कमजोरों पर ही हावी होता ,
अहम् भाव से भरा हुआ वह ,
सब को हेय समझता है ,
यह भाव यदि हावी हो जाये ,
मनुष्य गर्त में गिरता है,
अहंकार से भरा हुआ वह ,
उस घायल योद्धा सा है ,
जो कुछ भी कर नहीं सकता ,
पर जीत की इच्छा रखता है ,
अहम् कोई हथियार नहीं ,
जिसके बल शासक बन पाये ,
स्वविवेक भी साथ ना दे पाये ,
तर्क शक्ति भी खो जाये ,
जो अहम् छोड़ पाया ,
सही दिशा खोज पाया ,
सफल वही हो पाया ,
यह कहावत सच्ची है ,
घमंडी का सिर नीचा होता है ,
समय अधिक बलवान है ,
सही सीख दे जाता है |


आशा

28 मई, 2010

मुक्तक

ऐ रहगुज़र मुझे माफ कर ,
मैं तेरा साथ न निभा पाया ,
हमसफर बना और साथ चला ,
पर हमराज़ कभी ना बन पाया |


आशा

27 मई, 2010

जागृति

दुखती रग पर हाथ न रखना ,
कभी कोई प्रतिकार न करना ,
मुझ पर अपना अधिकार न समझना ,
अबला नारी न मुझे समझना ,
दया की भीख नहीं चाहिये ,
मुझे अपना अधिकार चाहिये |
मैं दीप शिखा की ज्वाला सी ,
कब लपटों का रूप धरूँगी ,
सारी कठिनाई इक पल में,
ज्वाला बन कर भस्म करूँगी ,
मुझको निर्बल नहीं समझना ,
बहुत सबल हूँ वही रहूँगी |
मैं उत्तंग लहर हूँ सागर की ,
गति मैं भी कोई कमीं नहीं है ,
अधिकारों का यदि हनन हुआ ,
मुझ पर कोई प्रहार हुआ ,
तट बंध तोड़ आगे को बढूँगी ,
मुझे कमज़ोर कभी न समझना ,
सक्षम हूँ सक्षम ही रहूँगी |
कर्तब्य बोध से दबी रही ,
हर दबाव सहती रही ,
जब अधिकार की बात चली ,
सब के मुँह पर ताला पाया ,
अंतरात्मा ने मुझे जगाया ,
अधिकार यदि मैं ना पाऊँ ,
क्या लाभ सदा पिसती जाऊँ |
अब मैं जागृत और सचेत हूँ ,
नारी शक्ति का प्रतीक हूँ ,
नहीं कोई खैरात चाहिये ,
मुझे अपना अधिकार चाहिये |
मेरा स्वत्व मझे लौटा दो ,
अवसादों से नहीं भरूँगी ,
हर बाधा मैं पार करूँगी
कोई बोझ न तुम पर होगा
यदि आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहूँगी |
समाज की प्रमुख इकाई हूँ मैं ,
स्वतंत्र रूप से रह सकती हूँ ,
कोई मर्यादा पार नहीं होगी ,
यदि अधिकारों की क्षति नहीं होगी |
मिलजुल कर सब साथ रहेंगे ,
नारी शक्ति को पहचानेंगे ,
कोई कटुता नहीं होगी ,
और समाज की प्रगति होगी ,
मेरा अधिकार जो मिल पाया ,
कर्तव्य में न कभी कमी होगी |


आशा
,

26 मई, 2010

उतार चढ़ाव जीवन के

जब कभी याद आतीं हैं वे बातें पुरानी ,
जो शायद तुम्हारे स्मृति पटल से ,
तो विलुप्त हो गयीं कहीं खो गईं ,
पर मेरी आँखें नम कर गयीं ,
कभी तुम दूर हुआ करते थे ,
मुझे अपनी ओर आकर्षित करते थे ,
घंटों इंतज़ार में कटते थे ,
फिर भी जब हम मिलते थे ,
दोराहे पर खड़े रहते थे |
सदा अनबन ही रहती थी ,
सारी बातें अनकही रहतीं थीं ,
पहले हम कहाँ गलत थे ,
यह भी नहीं सोच पाते थे ,
हर बात आज याद आती है ,
मन को बोझिल कर जाती है |
प्यार का सैलाब उमड़ता ,
तब भी सोच यही रहता ,
पहले पहल कौन करे ,
मन की बात खुद क्यूँ कहे |
जो नयनों की भाषा न समझ पाये ,
दिल तक कैसे पहुँच पाये ,
मैंने लाख जताना चाहा ,
इशारों में कुछ कहना चाहा |
पर तुम मुझे न समझ पाये ,
मुझे पहचान नहीं पाये ,
तुम्हें सदा शिकायत ही रही ,
मैनें तुम्हें कभी प्यार न दिया ,
केवल सतही व्यवहार किया ,
मन की बात समझने का ,
नयनों की भाषा पढ़ने का ,
जज्बा सबमें नहीं होता ,
शायद उनमें से एक तुम थे |
मैनें लब कभी खोले नहीं ,
तुम मुझे रूखा समझ बैठे ,
तुमने झुकना नहीं जाना ,
अपने आप को नहीं पहचाना ,
तुम रूठे-रूठे रहने लगे ,
मुझसे दूर रहने लगे |
तुम्हें मनाना कठिन हो गया ,
मेरा अभिमान गुम होगया ,
जब भी तुम्हें मनाना चाहा ,
निराशा ही मेरे हाथ आई ,
आशावान न हो पाई ,
जब उम्र बढ़ी खुद को बदला ,
तुम में भी परिवर्तन आया ,
समय ने शायद यही सिखाया ,
हम मन की बातें समझने लगे ,
जीवन में रंग भरने लगे ,
एक दूजे को जब समझा ,
हमसाया हमसफर हो गये ,
मन से दोनों एक हो गये |


आशा

24 मई, 2010

जिंदगी एक पहेली

ऐ जिंदगी मेरी समझ से बहुत दूर हो तुम ,
रंगीन या बेरंग जीवन का कोई ,
झंकृत होता साज़ हो तुम ,
कोई सपना या कोई राज़ हो तुम ,
सभी सपने कभी साकार नहीं होते ,
हर राज़ के भी राज़दार नहीं होते ,
सारे पल खुशियों से भरे नहीं होते ,
आखिर तुम क्यूँ हो ऐसी,
मेरे सपने तो सजाती हो ,
पर यादों की परतों में छिपी रहती हो ,
मेरे सामने नहीं आतीं ,
मैं जानता हूँ अंत क्या होगा ,
पर हर क्षण को ,
जिंदगी की प्रतिच्छाया मानता हूँ ,
कभी तुम पूरनमासी तो कभी अमावस होती हो ,
तुम्हीं मेरी अपनी हो मुझ को समझती हो ,
मैं अपना अतीत भूल पाऊँ ,
यह होने भी नहीं देतीं ,
यदि मरना चाहूँ मुझे मरने भी नहीं देतीं ,
मेरे बिखरे हुए जीवन की ,
टूटी कड़ियों से बनी ,
जीवन के अनछुए पहलुओं
की कोई किताब हो तुम ,
या शायद मेरा भ्रम हो ,
दूर पहाड़ियों में ,
गूँजती हुई आवाज़ हो तुम ,
तुम कोई अनुत्तरित पहेली हो ,
जिसका शायद ही कोई हल हो ,
मैं आगे तो बढ़ता जाता हूँ ,
पर किसी दार्शनिक की तरह ,
किसी उतार चढ़ाव को देख नहीं पाता ,
फिर भी ऐ ज़िंदगी ,
अपने बहुत करीब पाता हूँ |


आशा

23 मई, 2010

उफ ! यह मौसम गर्मी का

उफ ! यह मौसम गर्मी का ,
औरबिजली की आँख मिचौली,
बेहाल कर रही है ,
मति भी कुंद हो रही है ,
यदि कोई काम करना भी चाहे ,
बिना रोशनी अधूरा है ,
दोपहर की गर्म हवा ,
कुछ भी करने नहीं देती ,
सारा दिन बोझिल कर देती ,
बिना लाईट के आये ,
ऐ .सी . भी काम नहीं करता ,
कूलर की बात करें क्या ,
जब भी उसे चलायें ,
सदा गर्म हवा ही देता ,
केवल बेचैनी ही रहती है ,
नींद तक अधूरी है ,
आकाश में यदि बादल हों ,
उमस और बढ़ जाती है ,
घबराहट पैदा कर जाती है ,
कहाँ जायें क्या करें ,
कुछ भी अच्छा नहीं लगता ,
इतना अधिक तपता मौसम ,
जिससे बचने का उपाय ,
नज़र नहीं आता ,
पर इस ऋतु चक्र में ,
गर्मी बहुत ज़रूरी है ,
इसके बाद ही बारिश आती है ,
चारों ओर हरियाली छाती है ,
मन हरियाली में रम जाता है ,
उत्साह से भर जाता है ,
फिर से हल्का हो जाता है |


आशा

22 मई, 2010

जंगल की एक रात

मुझे याद है पिकनिक पर जाने का वह दिन ,
जल प्रपात का सौन्दर्य निहारने का वह दिन ,
दिन बीत गया खेलने और मनोरंजन में ,
जैसे ही शाम होने लगी ,
घर की चिंता होने लगी ,
फिर भी सुरमई शाम को जंगल में घूमना ,
तरह-तरह के पक्षी देखना ,
अपने आप में एक करिश्मा था ,
उन्हें देख मन खुशियों से भर जाता था ,
सूखे पत्तों से भरी पगडंडियों पर चलना ,
चरमर-चरमर आवाज़ें सुनना ,
अजीब अहसास कराता था ,
मन धीरे-धीरे गुनगुनाता था ,
शायद हम रास्ता भटक गये थे ,
अपनी मंज़िल से दूर निकल गये थे ,
जब अँधियारा छाने लगा ,
साँय-साँय करता जंगल ,
और जंगली जानवरों का भय ,
हमें विचलित करने लगा ,
भय मन में भरने लगा ,
सामने एक वृक्ष घना था ,
वहाँ रुकें उचित यही था ,
आसमान में झिलमिल करते तारे ,
हमें उस ओर खींच ले गये ,
रात में ठहरने की वजह बन गये ,
नींद कोसों दूर हो गयी ,
बातों ही बातों में ,
जाने कब आधी रात हो गयी ,
एकाएक बादलों ने नभ में ,
उमड़ घुमड़ कर जल बरसाया ,
तेज बारिश ने सब को नहलाया ,
कम्पित तन , घुटनों में सर
जल से सराबोर हम बैठे थे ,
तरह-तरह की आवाजों का
मन में भय समेटे थे ,
फिर से जब बरसात थम गयी ,
तारों की लुकाछिपी शुरू हो गयी ,
शायद वे हम पर हँस रहे थे ,
हमारी बेचारगी पर तरस खा रहे थे ,
इतने में एक तारा टूटा ,
औरआकाश में विलीन होगया ,
हम भी कहीं गुम हो जायेंगे ,
टूटे तारे की तरह खो जायेंगे ,
फिर जाने कब आँख लग गयी ,
पौ फटते ही नींद खुल गयी ,
जब घर की राह नज़र आई ,
घर की ओर दौड़ लगाई ,
जंगल में रात कैसे कटी ,
यह बताना अच्छा लगता है ,
पूरी कहनी सुनाना ,
मन को भाता है ,
भय को पीछे छोड़,
वहाँ फिर से जाने का दिल करता है ,
जंगल में कटी रात कैसे भूल पायेंगे ,
जब भी कभी बात चलेगी ,
हम वही संस्मरण दोहरायेंगे |


आशा

20 मई, 2010

यादें बीते कल की

जब तुम इधर से गुजरती हो ,
पहली वर्षा की फुहार सी लगती हो ,
पुरवइया बयार सी लगती हो ,
तुम मुझे कुछ-कुछ अपनी सी लगती हो |
होंठों पर मधुर मुस्कान लिये ,
कजरारी आँखों में प्यार लिये ,
जब तुम धीमी गति से चलती हो ,
मुझे बहुत प्यारी लगती हो
बचपन में तुम्हारा आना ,
मेरेपास से हँस कर गुजर जाना ,
फूलों से घर को सजाना ,
गुड़ियों का ब्याह रचाना ,
और बारात में हमें बुलाना ,
फिर सब का स्वागत करवाना ,
सब मुझे सपना सा लगता है ,
तब भी तुम्हें देखने का मन करता है ,
अब मैं तम्हें दूर से देखता हूँ ,
क्योंकि अब तुम मेरी
बचपन की दोस्त नहीं हो ,
अब तुम मेरी निगाह में ,
हर बात में , जजबात में
मुझसे बहुत दूर खड़ी हो ,
यह निश्छल प्यार का बंधन है ,
बीते बचपन का अभिनन्दन है ,
कॉलेज में साथ पढ़ते हैं ,
फिर भी दूरी रखते हैं ,
हर शब्द सोच कर कहते हैं ,
शायद मन में यह रहता है ,
कोई गलत अर्थ न लगा पाये
व्यर्थ विवाद ना हो जाये ।
जब तुम भी कहीं चली जाओगी ,
मैं भी कहीं दूर रहूँगा ,
दोनों अजनबी से बन जायेंगे ,
यदि जीवन के किसी मोड़ पर मिले ,
बीते दिन छाया चित्र से नजर आयेंगे ,
यादों के सैलाब उमड़ आयेंगे ,
हम उनमें फिर से खो जायेंगे |


आशा

,

19 मई, 2010

इंतज़ार अभी बाकी है

विरही मन चारों ओर भटकता है ,
हर आहट पर चौंक जाता है ,
शायद वह लौट कर आयेगी ,
इंतज़ार नहीं करवायेगी |
मैं तपता सूरज कभी नहीं था ,
पर शांत कभी न रह पाया ,
मयंक सा शीतल न हो पाया ,
उसे कभी न समझ पाया |
मैं कैसे इतना निष्ठुर निकला ,
ऐसा क्या गलत किया मैंने ,
मुझे भूल गई बिसरा बैठी ,
कहीं और तो नेह न लगा बैठी ?
उसे मेरी याद नहीं आई ,
क्यों मुझे समझ नहीं पाई ,
घंटों मोबाईल पर बातें ,
अक्सर चैटिंग भी करती थी |
वह यह सब कैसे भूल गयी,
बीता कल पीछे छोड गयी ,
मैं दीपक सा जलता ही रहा ,
पर उसे कभी झुलसने न दिया |
मैं ही शायद गलत कहीं हूँ ,
कैसे यह अलगाव सहूँ ,
मन उद्वेलित होता जाये ,
विद्रूप से भरता जाये |
मन का तिलस्म टूट गया ,
वह बैचेनी से भटक रहा ,
मुझ में ही कुछ कमी रह गयी ,
अपना उसे बना न पाया ,
घायल पंछी सा तड़पता रहा ,
ठंडी बयार न दे पाया |
फिर भी हर क्षण ,
उसकी याद सताती है ,
वह चाहे कुछ भी सोचे ,
इंतज़ार अभी तक बाकी है |


आशा

18 मई, 2010

दो किनारे नदिया के

दो किनारे नदिया के ,
होते है कितने बेचारे ,
साथ-साथ चलते हैं सदा ,
फिर भी मिल नहीं पाते ,
संगम को तरस जाते|
ये जन्म और मृत्यु जैसे नहीं होते ,
जो कभी एक न हो पाते ,
वे कभी साथ न चल पाते |
किनारों में है गहरा बंधन ,
यह बंधन नहीं है अनजाना ,
इसको किसीने न जाना ,
वे अलग-अलग तो रहते हैं ,
पर उनमें है गहरा बंधन ,
बंधन सेतु है बहता पानी ,
जिसका कोई नहीं सानी |
देख एक दूसरे को दोनों ,
आगे तो बढ़ते रहते हैं ,
हमराही भी कहलाते हैं ,
आगे बढ़ते हैं अनजानों से ,
चलते जाते बेगानों से ,
शायद हालातों से है समझौता ,
पर है यह समन्वय कैसा ,
समझौते की बात करें क्या ,
वे ख़ुद ही कटते जाते हैं ,
पर राह छोड़ नहीं पाते हैं |
यदि सलिला नहीं होती ,
शायद वे भी नहीं होते ,
अपना अस्तित्व कहाँ खोजते ,
साथ चले थे साथ चल रहे ,
आगे भी साथ निभायेंगे ,
प्रगाढ़ बंध के कारण हैं वे ,
यह कैसे भूल पायेंगे ,
किसी के साथ चलने की,
होती है हर पल चाह ,
शायद यही है जीवन जीने की राह |


आशा

17 मई, 2010

तीन चूहे

तीन चूहे थे |वे अपने आप को बहुत चतुर समझते थे |प़र वे बिल्ली से बहुत डरते थे |हर समय अपने आप को उससे बचाने की कोशिश में लगे रहते थे |एक दिन उनने सोचा की क्यों न वे अपने मकान बना लें रोज रोज का झंझट ही
समाप्त हो जाएगा |
पहले चूहे ताऊं ने अपना मकान कागज का बनाया ,
उसमें रंग बिरंगा दरवाजा लगवाया |
ख़ुद को बहुत सुरक्षित पाया |
दूसरे चूहे ठाऊँ ने एक किला बनवाया,
आसपास की खाई में दूध भरवाया ,
किले में अपने को अधिक सुरक्षित पाया |
तीसरा चूहा दाऊं था ,
वह बहुत असमंजस में था ,
आर्कीटेक्ट से नक्षा बनवाया ,
सीमेंट रेत से घर बनवाया ,
लोहे का दरवाजा लगवाया ,
अन्दर ख़ुद को सुरक्षित पाया |
बिल्ली भी कुछ कम नहीं थी ,
उसने एक तरकीब सोची,
पहुंची पहले ताऊं के घर ,
बोली "बेटा ताऊं ,बेटा ताऊं ,
क्या मैं घर के भीतर आऊं ",
ताऊं बोला " मौसी आज नहीं आना ,
मुझको है बाहर जाना "
पहले तो वह लौट चली ,
पर कुछ सोच लौट पड़ी ,
गुस्से मैं पंजा फैलाया ,
ताकत से घर पर दे मारा ,
कागज का मकान नष्ट हो गया ,
ताऊंबिल्ली का भोजन हो गया |
पेट भर गया जब बिल्ली का ,
उसका मूड ठीक हो गया |
दुसरे दिन बिल्ली देर से उठी ओर इधर उधर घूमने लगी |पर कुछ समय बाद उसे भूख सताने लगी उसको ख्याल आया की क्यों न वह ठाऊं के घर जाए ओर उसे अपना भोजन बनाए |
वह जल्दी से किले तक पहुंची ,
खाई देख हुई भोंच्क्की ,
केसे खाई पार करे ,
ओर किले तक पहुंचे ,
कुछ क्षण तक वह खडी रही,
फिर सारा दूधचट कर गई ,
ओर खाई पार कर गई |
एक छलांग में दीवार फांद कर,
ठाऊं को भी चट कर गई |
बात तीसरे दिन की है |जब बिल्ली को भूख लगी तब वह बेचैन हो रही थी | अब उसे दाऊं की याद आनेलगी |
ओर वह उसके घर की ओर चल दी |
जैसे ही उसने घर देखा ,
लोहे का दरवाजा देखा ,
घूम घूम बाहर से घर देखा ,
कोइ राह नजर न आई ,
उसके मन में उदासी छाई |
फिर भी हिम्मत न हारी,
मीठी आवाज में वह बोली ,
दाऊं दाऊं प्यारेदाऊं ,
"क्या नया घर नहीं दिखलाओगे ,
अपने घर नहीं बुलाओगे ",
दाऊं बहुत सीधा था वह भूल गया कि अपने घर में ही वह बहुत सुरक्षित है |घर दिखाने की लालसा में उसने
लोहे का दरवाजा खोल दिया |
जैसे ही बिल्ली अन्दर आई ,
मुंह से लार उसने टपकाई ,
फुर्ती से कूदी दाऊं पर ,
पंजे में कस कर पकड़ लिया ,
उसे भी पेट के हवाले किया |
सारे मकान खाली रह गये ,
तीनों चूहे नष्ट हो गए ,
बिल्ली मौसी से कोई भी नहीं बच पाया |तीनों की चतुराई बिल्ली के आगे न चल सकी

16 मई, 2010

सोच एक शाम की

शाम को झील के किनारे ,
बेंच पर बैठना अच्छा लगता है ,
हरियाली पास से देखना ,
सपना सा लगता है ,
झिलमिल करते बिजली के खम्भे ,
उनकी पानी में छाया ,
पानी में छोटी-छोटी कश्ती ,
दृश्य मनमोहक लगता है |
धीमी गति की लहरों में ,
अँधेरी रात के पहलू में ,
पानी में पैर डाले रखना ,
जब मन चाहे छप-छप करना ,
जल से नाता अपना रखना ,
मुझको बहुत प्यारा लगता है |
दूर एक छोटा सा मंदिर ,
मन्दिर में एक सुन्दर मूरत ,
रोशनी से भरा हुआ परिसर ,
भक्तों की भीड़ अपार जहाँ पर ,
मधुर ध्वनि घंटों की सुनकर ,
वहाँ पहुँचने का मन करता है |
अनिश्चय की दुविधा मिट जाती है ,
मन अभिमंत्रित हो जाता है ,
जल्दी से वहाँ पहुँच पाऊँ ,
प्रभु चरणों में शीश नवाऊँ ,
भगवत भजन में चित्त लगाऊँ ,
सारी चिंता बिसराऊँ ,
संसार चक्र से मुक्ति पाऊँ |


आशा

14 मई, 2010

अनमोल नज़ारा

गर्मी का मौसम और ठंडी बयार ,
झील का किनारा एक मदहोश शाम ,
सनोवर के पेड़ों की लम्बी होती छाया ,
पानी में हिलती डुलती जैसे कोई काया ,
है रंगीन फिज़ा ओर अनमोल नज़ारा |
पानी में दिखती हाउस बोट,
भाग जिसके लकड़ी से तराशे गये ,
बाहर और अन्दर का रख रखाव ,
उसमें चार चाँद लगाते हैं ,
अविस्मरणीय उसे बनाते हैं ,
पानी में घर और उसका अक्स ,
दोनों ही मन को लुभाते हैं |
जो लोग वहाँ ठहरते हैं ,
झील का नज़ारा देखते हैं ,
पा प्रकृति की गोद में ख़ुद को ,
अपने को धन्य समझते हैं |
उगता सूरज स्वर्णिम आभा ,
झील का मन मोहक नज़ारा ,
रंगों को कूची में ले कर ,
केनवास पर उसे उकेरते हैं |
बजरों में सजी दुकानों में ,
दूधिया रोशनी के साये में ,
दिखा रहे हर वस्तु सभी को ,
चाहत देने की लेने की ,
अपनी और खींच रही सबको ,
चहल पहल और गहमागहमी ,
सभी आकृष्ट हो जाते हैं ,
और खरीदार बन जाते हैं ,
आवश्यकता का सभी सामान ,
सब यहीं मिल जाता है ,
एक वृहद् बाज़ार नजर आता है |
व्यवहार शिकारे के मालिक का ,
अपनापन लिए हुए होता है ,
सब का ध्यान वे रखते हैं ,
सदा प्रसन्न वे दिखते हैं ,
वे कई बातें बताते हैं ,
अनेक संस्मरण सुनाते हैं ,
क्या पहले घटा क्या बीत गया ,
सारे पलों का हिसाब,
उनके होंठों पर होता है ,
मानों छोटे-छोटे मनकों को ,
कोई धागे में पिरोता है ,
बात चले यदि केशर की ,
केशर की क्यारी दिखाते हैं ,
असली ओर नकली केशर में ,
है क्या अन्तर समझाते हैं ,
घर से कहवा बनवा कर लाते ,
उसका स्वाद चखाते हैं ,
अपनापन अधिक दिखाते हैं |
कश्मीर की सुरम्य वादियाँ ,
चार चिनार की बहार ,
उस पर झील का आकर्षण ,
मन डल झील में खोता जाता है ,
धरती पर स्वर्ग नज़र आता है |


आशा