16 जून, 2010

एक नन्हा सा दिया


दीपक ने पूछा पतंगे से
मुझ में ऐसा क्या देखा तुमने
जो मुझ पर मरते मिटते हो
जाने कहाँ छुपे रहते हो
पर पा कर सान्निध्य मेरा
तुम आत्महत्या क्यूँ करते हो
भागीदार पाप का
या साक्षी आत्मदाह का
मुझे बनाते जाते हो
जब भी मेरे पास आते हो |
जब तक तेल और बाती है
मुझको तो जलना होगा
अंधकार हरना होगा |
यह ना समझो
मैं बहुत सशक्त हूँ
मैं हूँ एक नन्हा सा दिया
नाज़ुक है ज्योति मेरी
एक हवा के झोंके से
मेरा अस्तित्व मिट जाता है ,
एक धुँआ सा उठता है ,
सब समाप्त हो जाता है ,
आग ज्वालामुखी में भी धधकती है ,
रोशनी भी होती है ,
दूर- दूर तक दिखती है ,
बहुतों को नष्ट कर जाती है ,
कितनों को झुलसाती है ,
लावा जो उससे निकलता है
उसका हृदय पिघलाता है
और ताप हर लेता है
पर तपिश उसकी
बहुत समय तक रहती है
विनाश बहुत सा करती है
वह शांत तो हो जाता है
पर स्वाभाव नहीं बदल पाता
जब चाहे उग्र हो जाता ,
ना तो मैं ज्वालामुखी हूँ
ना ही मेरी गर्मी उस जैसी
मैं तुमको कैसे समझाऊँ|
मैं तो एक छोटा सा दिया हूँ
अहित किसी का ना करना चाहूँ
पर हित के लिए जलता हूँ
तम हरने का प्रयत्न करता हूँ
शायद यही नियति है मेरी
इसी लिए मैं जलता हूँ |


आशा

15 जून, 2010

आप जब भी मेरे सामने आती हैं

आप जब भी मेरे सामने आती हैं ,
अपनी पलकों को झुका लेती हैं ,
शायद कुछ कहना भी चाहती हैं ,
मन ही मन कुछ दोहराती हैं ,
मैं समझ के भी अनजान बना रहता हूँ ,
कभी निगाहें भी चुरा लेता हूँ ,
चुप्पी साध लेता हूँ ,
कहना चाहता हूँ बहुत कुछ ,
बात मुँह तक आ कर रुक जाती है ,
फिर सोचता हूँ कोई शेर लिखूँ ,
जिसे पढ़ कर आप ,
मेरे दिल को जान सकें ,
दिल की गहराई नाप सकें ,
कुछ आप भी कोशिश करें ,
कुछ पहल मैं भी करूँ ,
जिससे मन की बातों को ,
इक दूजे से कह पायें ,
मन को अभिव्यक्ति दे पायें |


आशा

14 जून, 2010

मान पाने का हक तो सबका बनता है

तुम मेरी हो तुम्हारा अधिकार है मुझ पर ,
लेकिन अपनों को कैसे भूल जाऊँ ,
जिनकी ममता है मुझ पर ,
उन सब से कैसे दूर जाऊँ ,
मैं उनका प्यार भुला न सकूँगा ,
अपनों से दूर रह न सकूँगा ,
क्यों तुम समझ नहीं पातीं ,
क्या माँ की याद नहीं आती ,
जब भी उनसे मिलना चाहूँ ,
कोई बात ऐसी कह देती हो ,
दूरी मन में पैदा करती हो ,
यह तुम्हारी कैसी फितरत है ,
नफरत से भरी रहती हो ,
वो तुम्हारी सास हुई तो क्या ,
वह मेरी भी तो माँ हैं ,
तुमको प्यार जितना अपनों से ,
मेरा भी तो हक है उतना ,
में कैसे भूल जाऊँ माँ को ,
जिसने मुझ को जन्म दिया ,
उँगली पकड़ी, चलना सिखाया ,
पढ़ाया लिखाया, लायक बनाया ,
सात फेरों में तुम से बाँधा ,
तुम्हारा आदर सत्कार किया ,
मान पाने का तो हक उनका बनता है ,
फिर तुमको यह सब क्यूँ खलता है ,
छोटी सी प्यारी सी मुनिया ,
मेरी बहुत दुलारी बहना ,
उसने ऐसा क्या कर डाला ,
तुमने उसको सम्मान न दिया ,
दो बोल प्यार के बोल न सकीं ,
उससे भी नाता जोड़ न सकीं ,
मैं उससे मिल नहीं पाया ,
मैंने क्या खोया तुम समझ न सकीं
केवल अशांति का स्त्रोत बनी
अब तुम्हारी न चलने दूँगा ,
जो सही मुझको लगता है ,
वैसा ही अब मैं करूँगा ,
जिन सबसे दूर किया तुमने ,
उन सब से प्यार बाँटना होगा ,
हिलमिल साथ रहना होगा ,
सभी का अधिकार है मुझ पर ,
केवल तुम्हारा ही अधिकार न होगा ,
तभी कहीं घर घर होगा ,
मेरा सर्वस्व तुम्हारा होगा |


आशा

एक मनचला

एक और आँखों देखा सच तथा उससे बुना शब्द जाल !
शायद आपको पसंद आए :-

जब तुम उसे इशारे करते हो ,
शायद कुछ कहना चाहते हो ,
कहीं उसकी सूरत पर तो नहीं जाते ,
वह इतनी सुंदर भी नहीं ,
जो उसे देख मुस्कुराते हो ,
उसे किस निगाह से देखते हो ,
यह तो खुद ही जानते हो ,
पर जब उसकी निगाह होती तुम पर ,
अपने बालों को झटके देते हो ,
किसी फिल्मी हीरो की तरह ,
अपना हर अंदाज बदलते हो ,
कभी रंग बिरंगे कपड़ों से ,
और तरह-तरह के चश्मों से ,
उसको आकर्षित करते हो ,
गली के मोड़ पर,
घंटों खड़े रह कर ,
बाइक का सहारा ले कर ,
कई गीत गुनगुनाते हो ,
या गुटका खाते हो ,
तुम पर सारी दुनिया हँसती है ,
तुम्हारी यह बेखुदी देख ,
मुझको भी हँसी आ जाती है |


आशा

13 जून, 2010

कलम

मैं कलम हूँ ,
गति मेरी है अविराम ,
तुम मुझे न जान पाओगे ,
जहाँ कहीं भी तुम होगे ,
साथ अपने मुझे पाओगे ,
जीवन में जितने व्यस्त हुए ,
तब भी न मुझसे दूर हुए ,
मेरे बिना तुम अधूरे हो ,
स्वप्न कैसे साकार कर पाओगे |


आशा

12 जून, 2010

तुम्हारे वादे और मैं

तुम्हारे वादों को ,
अपनी यादों में सजाया मैंने ,
तुम तो शायद भूल गए ,
पर मैं न भूली उनको ,
तुम्हारे आने का
ख्याल जब भी आया ,
ठण्ड भरी रात में
अलाव जलाया मैंने ,
उसकी मंद रोशनी में ,
हल्की-हल्की गर्मी में ,
तुम्हारे होने का ,
अहसास जगाया मन में ,
हर वादा तुम्हारा ,
मुझ को सच्चा लगता है ,
पर शक भी कभी ,
मन के भावों को हवा देता है ,
तुम न आए ,
बहुत रुलाया मुझको तुमने ,
ढेरों वादों का बोझ उठाया मैंने ,
ऊंची नीची पगडंडी पर ,
कब तक नंगे पैर चलूँगी ,
शूल मेरे पैरों में चुभेंगे ,
हृदय पटल छलनी कर देंगे ,
पर फिर से यादें तेरे वादों की,
मन के घाव भरती जायेंगी ,
मन का शक हरती जायेंगी ,
कभी-कभी मन में आता है ,
मैं तुम्हें झूठा समझूँ ,
या सनम बेवफा कहूँ ,
पर फिर मन यह कहता है ,
शायद तुम व्यस्त अधिक हो ,
छुट्टी नहीं मिल पाती है ,
या कोई और मजबूरी है ,
वहीं रहना जरूरी है ,
मुझको तो ऐसा लगता है ,
इसीलिए यह दूरी है |


आशा

10 जून, 2010

दायरा सोच का


दायरा सोच का कितना विस्तृत 
कितना सीमित 
कोई जान नहीं पाता
उसे पहचान नहीं पाता
सागर सा विस्तार उसका
उठती तरंगों सा उछाल उसका
गहराई भी समुंदर जैसी
अनमोल भावों का संग्रह
सागर की अनमोल निधि सा |
सोच सीमित नहीं होता
उसका कोई दायरा नहीं होता
होता वह हृदय से प्रस्फुटित
मौलिक और अनंत होता
पृथ्वी और आकाश जहाँ मिलते 
क्षितिज वहीं होता है
सोच क्षितिज सा होता है |
कई सोचों का मेल
बहुत दूर ले जाता है
सीमांकित नहीं किया जाता |
सोच सोच होता है
 कोई नियंत्रण नहीं होता
स्वप्न भी तो सोच का परिणाम हैं
वे कभी सही भी होते हैं
कभी कल्पना से भरे हुए
सपनों से भी होते हैं
कुछ सोच ऐसे भी हैं
दिल के दरिया में डूबते उतराते
कभी गहरे पैठ जाते
वे जब भी बाहर आ जाते
किसी रचना में
रचा बसा खुद को पाते
और अमर वे हो जाते |


आशा

09 जून, 2010

जड़ता मन की

बहुत खोया, थोड़ा पाया ,
खुद को बहुत अकेला पाया ,
सबने मुँह मोड़ लिया ,
नाता तुझसे तोड़ लिया ,
पीड़ा से दिल भर आया ,
फिर भी कोई प्रतिकार न किया ,
दरवाजा मन का बंद किया ,
बातें कई मन में आईं ,
पर अधरों तक आ कर लौट गईं ,
क्यूँ कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं है |
आँखें सूनी-सूनी हैं ,
कुछ बोल नहीं पातीं ,
मन के भेद खोल नहीं पाती,
क्यूँ कि उनमें नमी नहीं है |
तू नारी है तेरा अस्तित्व नहीं है ,
तेरी किसी को जरूरत नहीं है ,
क्यूँ कि तू जागृत नहीं है ,
सचेत नहीं है |
तू कितनी सक्षम है ,
इसका भी तुझे भान नहीं है ,
अपनी पहचान खो चुकी है ,
चमक दमक जो दिखती है ,
वह भी शायद खोखली है ,
सारी उम्र बीत गई ,
कुछ ही शेष रही है ,
वह भी बीत जायेगी ,
यही सोच तेरा ,
साथ समय के चलने नहीं देता ,
तुझे उभरने नहीं देता ,
सचेत होने नहीं देता ,
क्यूँ कि तुझे जैसे रखा ,
वैसे ही रही तू |
अहम् की तुष्टि में व्यस्त ,
कोई तुझे समझ नहीं पाता,
साथ तेरे चल नहीं पाता ,
क्यूँ कि वह सोचता है ,
दूसरों कि तरह सक्षम नहीं है ,
तू जागृत नहीं है |
यदि कोई तुझे समझाना चाहे ,
परिवर्तन तुझ में लाना चाहे ,
समयानुकूल बनाना चाहे ,
दरवाजे पर दस्तक दे भी कैसे ,
तेरे मन के दरवाजे पर ,
ताला लगा है ,
जिसकी चाबी न जाने कहाँ है |


आशा

08 जून, 2010

इंतजार तुम्हारा

तुम्हारी याद में हर शाम गुजारी मैंने
सारी दुनिया से दूर रहा
रुसवाई का सबब बना
तुम आये मायूस किया
अपने को मुझ से दूर किया |
आने के बहाने अनेक
नया बहाना रोज एक
पर समझाना पड़ता मन को
शायद तुम जाओ
इंतजार रहता मुझ को |
गिटार पर कई धुनें बजाईं मैंने
अपलक जाग रातें गुज़ारीं मैंनें
तेरी याद में धुनें आह में बदल जायें
कहीं मेरी आखें नम कर जायें |
हाल मेरा सब देख रहे
मुझ पर हँस कर यह सोच रहे
है यह कैसा परवाना
लगता है किसी शमा का दीवाना
मर मिटने का मन बना बैठा
अपनी सुध बुध खो बैठा |
देर कितनी भी हो चाहे
शाम, रात फिर सुबह हो जाये
अनवरत गिटार बजाता रहूँगा
और तुम्हारा इंतजार करूँगा
ये धुनें तुम्हें खींच लायेंगी
मन के तार झंकृत कर जायेंगी |


आशा

,

07 जून, 2010

संग्रह यादों का


कुछ तो ऐसा है तुममें
तुम्हारी हर बात निराली है
कोई भावना जागृत होती है
एक कविता बन जाती है
लिखते-लिखते कलम न  थकती
हर रचना कुछ कह जाती
मुझको स्पंदित कर जाती 
है गुण तुममें सच्चे मोती सा
निर्मल सुंदर चारु चंद्र सा
एक-एक मोती सी 
तुम्हारी  लिखी हर  कविता
कैसे चुनूँ और पिरोऊँ 
फिर उनसे माला बनाऊँ
 माला में कई होंगे मनके 
 किसी न किसी की कहानी कहेंगे
संग्रह उन सब का करूँगा
और रूप पुस्तक का दूँगा
हर कृति कुछ बात कहेगी
मन को भाव विभोर करेगी
तुम्हारी याद मिटने ना दूँगा
हर किताब सहेज कर रखूँगा |


आशा

06 जून, 2010

आँखें तेरे मन का दर्पण

आँखें तेरे मन का दर्पण ,
चेहरा किताब का पन्ना ,
जो चाहे पढ़ सकता है ,
तुझको पहचान सकता है |
आँखें हैं या मधु के प्याले ,
पग-पग पर छलके जाते ,
दो बूँद अगर मैं पी पाता ,
आत्म तृप्ति से भर जाता |
तेरी आँखों का पानी ,
यह सादगी और भोलापन ,
बरबस खींच लाता मुझको ,
काले कजरारे नयनों की भाषा ,
मन की बात बताती मुझको |
उन में क्यूँ न डूब जाऊँ ,
आँखों में पलते सपनों को ,
तुझ में खोजूँ , मैं खो जाऊँ |
जब नयनों से नयन मिलेंगे ,
मन से मन के तार जुड़ेंगे,
अनजाने अब हम न रहेंगे ,
सुख दुःख को मिल कर बाटेंगे ,
साथ साथ चलते जायेंगे |
खुशियों से भरे ये नयना तेरे ,
जीवन में नये रंग भरेंगे ,
हर खुशी तेरे कदमों में होगी ,
हम दूर क्षितिज तक साथ चलेंगे |


आशा

05 जून, 2010

बच्चा आज के बड़े शहर का

आज के युग में एक बड़े शहर में ,
सीमेंट, रेत लोहे से बने इस जंगल में,
रहने वाला बच्चा प्रकृति को नहीं जानता ,
रात में भय से छत पर नहीं जाता ,
यह सोच कर रोता है ,
चाँद तारे कहीं उस पर तो ना गिर जायेंगे !


आशा

महक गुलाब की

महकता गुलाब और गुलाबी रंग ,
सब को अच्छा लगता है ,
और सुगंध उसकी ,
साँसों में भरती जाती है ,
उसकी ओर हाथ बढ़ाती है ,
मेरा मन यह कहता है ,
जैसे हो तुम वैसे ही रहना ,
ऐ गुलाब तुम ,
कमल से ना हो जाना ,
जो कीचड़ में खिलता है ,
पर उसमें लिप्त नहींहोता ,
लक्ष्मी के चरणों में रहता ,
पर अपना प्यार न जता पाता ,
केश नायिका के न सजा पाता ,
तुम सा प्रेम न जता पाता ,
तुम चन्दन भी नहीं बनना ,
हो भुजंग से नेह जिसका ,
बेला, चमेली, हरसिंगार न बनना ,
जिनका जीवन क्षण भंगुर है ,
अमलतास के फूल ,
कई झुमकों में लटकते हैं ,
ना तो उनमें खुशबू है ,
ना हर मौसम में खिलते हैं ,
ना कभी उपहार बने ,
नहीं किसी का हार बने ,
तुम पलाश के फूल न होना ,
गुल मोहर जैसे ना होना ,
वे दूर से सुंदर दिखते हैं ,
तुम जैसे कभी न हो पाते ,
सुगंध तुम्हारी मनमोहक ,
इत्र तुम्हारा मन हरता ,
दूर-दूर तक खुशबू देता ,
मुझको सच में यह लगता है ,
तुम जैसा कोई नहीं होता ,
जब भी कोशिश की माली ने ,
तुम्हारा रूप बदलने की ,
तुमतो आकर्षक दिखने लगे ,
पर सुगंध साथ छोड़ गई ,
तुम जैसे हो वैसे ही रहना ,
बागों को सुरभित करते रहना ,
भवरों का गुंजन जब होगा ,
मंद हवा का झोंका होगा ,
खुशबू दिग्दिगंत में होगी ,
समा रंगीन हो जायेगा ,
ऐसा कोई फूल नहीं जग में ,
जो तुमसे तुलना कर पाता ,
तुम तो फूलों के राजा हो ,
काँटों में शान से जगह बनाते ,
हर अवसर पर सराहे जाते ,
इसी शान को जीवित रखना ,
कभी नष्ट न होने देना |


आशा

04 जून, 2010

सृजन चित्रों का

मै हूँ एक चित्रकार ,
रंगों से चित्र सजाता हूँ ,
मन कि उड़ान को जी भर कर,
चित्रों में दर्शाता हूँ ,
हर रंग अनूठा लगता है ,
जब वह उभर कर आता है ,
मेरा अंतस दर्शाता है ,
पूरा केनवास सज जाता है ,
सारे रंग जब मिल जाते है ,
अद्भुत दृश्य बनाते हैं ,
वे जो चाहे दिखलाते हैं ,
समायोजन सिखलाते हैं ,
मैं कल्पना में खोया रहता हूँ ,
हर क्षण विचार पनपते हैं ,
उन सब के मिल जाने से ,
कुछ नया बन जाने से ,
आयाम सृजन का बढ़ता है ,
मन स्पंदित होने लगता है ,
हर दिन कुछ नया करता हूँ ,
नई कल्पना आती है ,
मस्तिष्क पर छा जाती है ,
मन पंछी सा उड़ता है ,
नई दिशा मिल जाती है ,
एक और कृति बन जाती है ,
इन्द्रधनुष के सारे रंग ,
जब आकाश पर दिखते हैं ,
अपना रंग बिखेरते हैं ,
दृश्य मनोरम होता है ,
जब भी मैं उसको देखूँ ,
अपनी सुध बुध खो बैठूँ ,
मैं बहुरंगी चादर ओढ़ ,
उसमें खुद को लिपटा पाऊँ ,
जितने भी रंग भरे मैंने ,
उनकी छटा निराली है ,
स्मृति पटल पर जब छाए ,
मेरे चित्र सजाती है ,
रूमानी मुझे बनाती है ,
तूलिका और रंगों का मिश्रण ,
उस पर कोरा केनवास ,
जब रंगों का संयोजन होता है ,
मुझे व्यस्त कर जाता है ,
मेरे मन की उड़ान को ,
और दूर ले जाता है |


आशा

03 जून, 2010

फिर शिकायत क्यूँ

मरूभूमि सा मेरा जीवन ,
मृगतृष्णा बन कर तुम आये ,
जब-जब तुमको पाना चाहा ,
बहुत दूर नजर आये ,
मैंने अपना सब कुछ छोड़ा,
जब से तुमसे नाता जोड़ा,
जो चाहा था बन न सके
तुम्हारे ही हो कर रह गये ,
दुखों को भी झेला हमने ,
सुख से भी ना दूर रहे ,
जैसा तुमने चाहा था ,
वैसे ही बन कर रह गये ,
अपना अस्तित्व मिटा बैठे ,
खुद को ही हम भूल गये ,
फिर शिकायत क्यूँ करते हो ,
मैंने जो चाहा बन न सका ,
आपसी दूरी घटा न सका ,
क्यूँ गिले शिकवे करते रहते हो ,
साथ चलने का वादा क्यूँ नहीं करते ,
साथ रहेंगे क्यूँ नहीं कहते ?


आशा

02 जून, 2010

पथिक से

ऐ पथिक सुगंध की चाह में ,
प्रेम के प्रवाह में ,
उस ओर तुम जाना नहीं ,
जहाँ काँटे बिछे हों राह में |
उन पुष्पों से दूरी रखना ,
जो शूलों के साथ पले हों ,
वे कहीं किनारा ना कर लें ,
और काँटे तुम्हें छलनी कर दें |
उन पुष्पों से बच के रहना ,
जो छूते ही बंद कर लें तुमको ,
पूरी तरह निगल जायें ,
आत्मसात तुम्हें कर जायें|
उस राह भी तुम ना जाना ,
छुईमुई के पौधे हों जहाँ ,
तुम उनके जैसे ना बन जाना ,
स्पर्श मात्र से ना सकुचाना ,
अपना अस्तित्व ना खो देना |
जिस राह में बाधा अनेक ,
बाधा को शूल न समझ लेना ,
शूर वीर बन आगे बढ़ना ,
एक लक्ष्य को अपनाना ,
सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी ,
कीर्ति दिग्दिगंत में होगी |
ऐ पंथी मुझे भूल न जाना ,
यादों को न मिटने देना ,
अमित निशान जो पड़े पंथ पर ,
धूमिल उन्हें न होने देना ,
ना ही कभी मिटने देना |
तुममें साहस बहुत अधिक है ,
कुछ करने का जज़्बा भी है ,
उसे न कभी कम होने देना ,
गति को क्षीण न होने देना |
बीते कल को भूल न जाना ,
सब को सुरभित करते जाना |
आशा से रिश्ता रखना ,
निराशा पास न आने देना,
यदि कभी देखो मुड़ कर पीछे ,
तो अलविदा न कहना |


आशा

01 जून, 2010

आत्म संतुष्टि

चतरू नाम का एक किसान था |उसे किसी प्रकार की कोई चिंता न थी |तीनों बेटियांअपनी अपनी ससुराल में खुश थीं |
उसके कोई बेटा नहीं था पर उसका भी कोई दुःख उसे न था |वह अपनी पत्नी के साथ प्रसन्नता पूर्वक रहता था |
एक दिन अचानक उसकी पत्नी जमुना बीमार पड़ गई |बहुत इलाज करवाया पर चतरू उसे बचा न सका | वह बहुत अकेला महसूस करने लगा |हर समय अपनी पत्नी की यादों में खोया रहता |समय के साथ उसने भी अकेले रहने का अभ्यास कर लिया |एक दिन उसने सोचा कि क्यों न वह अपनी बेटियों से मिल आये |इसी बहाने बच्चों से मिलना भी हो जायेगा और उसका मन भी बहल जाएगा |
सबसे पहले वह अपनी बड़ीबेटी ग्रीष्म के घर गया |उसका विवाह एक कृषक से हुआ था |उस साल पानी की कुछ
कमी थी |जल संकट से कैसे निपटें सब इसी सोच विचार में ब्यस्त थे |जब चतुरू चलने लगा उसने अपनी बेटी से पूंछा कि वह जब तीर्थ करने जाए तब उसके लिए क्या मांगे |बेटी बोली ,"पिताजी आपको तो पता ही है बिना पानी के सारी खेती सूख जाती है |आप इश्यर से भरपूर बारिश के लिए प्रार्थना करना "|
चतरू अपनी दूसरी बेटी शशी के घर गया |वह अपने पिता से मिल कर बहुत खुश हुई |शशी का विवाह एक कुम्हार से
हुआ था |वे दौनों मटके बनाते ,धुप में सुखाते और फिर पका कर बाजार में बेचते थे |तीन माह कब निकल गए पता ही न चला |चलते समय शशी से पूंछाकि उसे क्या चाहिए |वह बोली ,"पिताजी जब आप भगवन से प्रार्थना करें मेरे लिए
एक ही बात मांगना ,चाहे जो हो पानी न बरसे |पानी से मेरा बहुत नुकसान हो जाता है |"
चतरू सोच विचार करता हुआ अपनी तीसरी बेटी वर्षा के पास पहुंचा |वह बहुत साधारण स्थिती में रहती थी |पति पत्नी
दौनों काम पर जाते थे तब जा कर घर चलता था |कुछ दिन रुक कर चतरू ने तीर्थ जाने की इच्छा प्रगट की ||
जब वह चलने लगा बोला ,"बेटी मैं तीर्थ करने जा रहा हूं ,तेरे लिए भगवन से क्या मांगूं |" बेटी बोली ,
"पिताजी इश्वर की कृपा से आवश्यकता पूरी हो इतना सब कुछ है मेरे पास |मुझे और अधिक कि कोइ आवश्यकता नहीं है |
आप तो ईश्वर से सब के कल्याण के लिए कामना करना |"अपनी बेटी कि बात सुनकर चतरू को बहुत प्रसन्नता हुई |वह प्रसन्न
मन तीर्थ यात्रा पर चल दिया |
सच है आत्म संतुष्टि से बढ़ कर दुनिया में कुछ नहीं होता |इश्वर सब देखता है |

आशा

31 मई, 2010

प्यार का बुखार

ऐसा कोई मापक न बना,

जो प्यार का बुखार उतार सके ,

कोई मानक पैमाना न हुआ ,

जो सही आकलन कर पाए |

विज्ञानं ने प्रगति कर ली है ,

मशीनें भी कई बना ली हैं

पर ऐसे उपकरण की खोज में ,

वह भी अभी तक असफल है |

अब तक कोई मशीन न बनी ,

जो प्यार की तीव्रता नाप सके ,

ऐसी कोई दवा न बनी,

जो प्यार का बुखार उतार सके |
मन में जिसने प्यार किया ,

और प्रगट न कर पाया ,

वह शायद सबसे असफल रहा ,

बाज़ी मार नहीं पाया |

जिसको प्यार जताना आया ,

उसने ही मीर मार लिया ,

पूरा-पूरा प्यार पाने का ,

केवल उसने ही अधिकार लिया |

इक तरफा प्यार प्यार नहीं होता ,

वह टिकाऊ भी नहीं होता ,

प्यार की आग में दोनों झुलसें ,

विरही मन दर-दर भटके ,

तब प्यार सोने सा तपता है ,

जीवन में खरा उतरता है ,

क्या होगा थर्मामीटर का ,

जब प्यार का बुखार उतर जाये ,

जब आँखों में प्यार छलकता है ,

समझने वाला ही समझता है ,

आँखें ही प्यार की भाषा समझती हैं ,

शायद प्यार का पैमाना होती हैं |



आशा







29 मई, 2010

अहंकार

अहंकारी खो देता सम्मान ,
ओर विवेक भी करता दान ,
"सब कुछ है वह"यही सोच ,
दूसरों का करता अपमान ,
अहंकार जन्मजात नहीं होता ,
कमजोरों पर ही हावी होता ,
अहम् भाव से भरा हुआ वह ,
सब को हेय समझता है ,
यह भाव यदि हावी हो जाये ,
मनुष्य गर्त में गिरता है,
अहंकार से भरा हुआ वह ,
उस घायल योद्धा सा है ,
जो कुछ भी कर नहीं सकता ,
पर जीत की इच्छा रखता है ,
अहम् कोई हथियार नहीं ,
जिसके बल शासक बन पाये ,
स्वविवेक भी साथ ना दे पाये ,
तर्क शक्ति भी खो जाये ,
जो अहम् छोड़ पाया ,
सही दिशा खोज पाया ,
सफल वही हो पाया ,
यह कहावत सच्ची है ,
घमंडी का सिर नीचा होता है ,
समय अधिक बलवान है ,
सही सीख दे जाता है |


आशा

28 मई, 2010

मुक्तक

ऐ रहगुज़र मुझे माफ कर ,
मैं तेरा साथ न निभा पाया ,
हमसफर बना और साथ चला ,
पर हमराज़ कभी ना बन पाया |


आशा

27 मई, 2010

जागृति

दुखती रग पर हाथ न रखना ,
कभी कोई प्रतिकार न करना ,
मुझ पर अपना अधिकार न समझना ,
अबला नारी न मुझे समझना ,
दया की भीख नहीं चाहिये ,
मुझे अपना अधिकार चाहिये |
मैं दीप शिखा की ज्वाला सी ,
कब लपटों का रूप धरूँगी ,
सारी कठिनाई इक पल में,
ज्वाला बन कर भस्म करूँगी ,
मुझको निर्बल नहीं समझना ,
बहुत सबल हूँ वही रहूँगी |
मैं उत्तंग लहर हूँ सागर की ,
गति मैं भी कोई कमीं नहीं है ,
अधिकारों का यदि हनन हुआ ,
मुझ पर कोई प्रहार हुआ ,
तट बंध तोड़ आगे को बढूँगी ,
मुझे कमज़ोर कभी न समझना ,
सक्षम हूँ सक्षम ही रहूँगी |
कर्तब्य बोध से दबी रही ,
हर दबाव सहती रही ,
जब अधिकार की बात चली ,
सब के मुँह पर ताला पाया ,
अंतरात्मा ने मुझे जगाया ,
अधिकार यदि मैं ना पाऊँ ,
क्या लाभ सदा पिसती जाऊँ |
अब मैं जागृत और सचेत हूँ ,
नारी शक्ति का प्रतीक हूँ ,
नहीं कोई खैरात चाहिये ,
मुझे अपना अधिकार चाहिये |
मेरा स्वत्व मझे लौटा दो ,
अवसादों से नहीं भरूँगी ,
हर बाधा मैं पार करूँगी
कोई बोझ न तुम पर होगा
यदि आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहूँगी |
समाज की प्रमुख इकाई हूँ मैं ,
स्वतंत्र रूप से रह सकती हूँ ,
कोई मर्यादा पार नहीं होगी ,
यदि अधिकारों की क्षति नहीं होगी |
मिलजुल कर सब साथ रहेंगे ,
नारी शक्ति को पहचानेंगे ,
कोई कटुता नहीं होगी ,
और समाज की प्रगति होगी ,
मेरा अधिकार जो मिल पाया ,
कर्तव्य में न कभी कमी होगी |


आशा
,

26 मई, 2010

उतार चढ़ाव जीवन के

जब कभी याद आतीं हैं वे बातें पुरानी ,
जो शायद तुम्हारे स्मृति पटल से ,
तो विलुप्त हो गयीं कहीं खो गईं ,
पर मेरी आँखें नम कर गयीं ,
कभी तुम दूर हुआ करते थे ,
मुझे अपनी ओर आकर्षित करते थे ,
घंटों इंतज़ार में कटते थे ,
फिर भी जब हम मिलते थे ,
दोराहे पर खड़े रहते थे |
सदा अनबन ही रहती थी ,
सारी बातें अनकही रहतीं थीं ,
पहले हम कहाँ गलत थे ,
यह भी नहीं सोच पाते थे ,
हर बात आज याद आती है ,
मन को बोझिल कर जाती है |
प्यार का सैलाब उमड़ता ,
तब भी सोच यही रहता ,
पहले पहल कौन करे ,
मन की बात खुद क्यूँ कहे |
जो नयनों की भाषा न समझ पाये ,
दिल तक कैसे पहुँच पाये ,
मैंने लाख जताना चाहा ,
इशारों में कुछ कहना चाहा |
पर तुम मुझे न समझ पाये ,
मुझे पहचान नहीं पाये ,
तुम्हें सदा शिकायत ही रही ,
मैनें तुम्हें कभी प्यार न दिया ,
केवल सतही व्यवहार किया ,
मन की बात समझने का ,
नयनों की भाषा पढ़ने का ,
जज्बा सबमें नहीं होता ,
शायद उनमें से एक तुम थे |
मैनें लब कभी खोले नहीं ,
तुम मुझे रूखा समझ बैठे ,
तुमने झुकना नहीं जाना ,
अपने आप को नहीं पहचाना ,
तुम रूठे-रूठे रहने लगे ,
मुझसे दूर रहने लगे |
तुम्हें मनाना कठिन हो गया ,
मेरा अभिमान गुम होगया ,
जब भी तुम्हें मनाना चाहा ,
निराशा ही मेरे हाथ आई ,
आशावान न हो पाई ,
जब उम्र बढ़ी खुद को बदला ,
तुम में भी परिवर्तन आया ,
समय ने शायद यही सिखाया ,
हम मन की बातें समझने लगे ,
जीवन में रंग भरने लगे ,
एक दूजे को जब समझा ,
हमसाया हमसफर हो गये ,
मन से दोनों एक हो गये |


आशा

24 मई, 2010

जिंदगी एक पहेली

ऐ जिंदगी मेरी समझ से बहुत दूर हो तुम ,
रंगीन या बेरंग जीवन का कोई ,
झंकृत होता साज़ हो तुम ,
कोई सपना या कोई राज़ हो तुम ,
सभी सपने कभी साकार नहीं होते ,
हर राज़ के भी राज़दार नहीं होते ,
सारे पल खुशियों से भरे नहीं होते ,
आखिर तुम क्यूँ हो ऐसी,
मेरे सपने तो सजाती हो ,
पर यादों की परतों में छिपी रहती हो ,
मेरे सामने नहीं आतीं ,
मैं जानता हूँ अंत क्या होगा ,
पर हर क्षण को ,
जिंदगी की प्रतिच्छाया मानता हूँ ,
कभी तुम पूरनमासी तो कभी अमावस होती हो ,
तुम्हीं मेरी अपनी हो मुझ को समझती हो ,
मैं अपना अतीत भूल पाऊँ ,
यह होने भी नहीं देतीं ,
यदि मरना चाहूँ मुझे मरने भी नहीं देतीं ,
मेरे बिखरे हुए जीवन की ,
टूटी कड़ियों से बनी ,
जीवन के अनछुए पहलुओं
की कोई किताब हो तुम ,
या शायद मेरा भ्रम हो ,
दूर पहाड़ियों में ,
गूँजती हुई आवाज़ हो तुम ,
तुम कोई अनुत्तरित पहेली हो ,
जिसका शायद ही कोई हल हो ,
मैं आगे तो बढ़ता जाता हूँ ,
पर किसी दार्शनिक की तरह ,
किसी उतार चढ़ाव को देख नहीं पाता ,
फिर भी ऐ ज़िंदगी ,
अपने बहुत करीब पाता हूँ |


आशा

23 मई, 2010

उफ ! यह मौसम गर्मी का

उफ ! यह मौसम गर्मी का ,
औरबिजली की आँख मिचौली,
बेहाल कर रही है ,
मति भी कुंद हो रही है ,
यदि कोई काम करना भी चाहे ,
बिना रोशनी अधूरा है ,
दोपहर की गर्म हवा ,
कुछ भी करने नहीं देती ,
सारा दिन बोझिल कर देती ,
बिना लाईट के आये ,
ऐ .सी . भी काम नहीं करता ,
कूलर की बात करें क्या ,
जब भी उसे चलायें ,
सदा गर्म हवा ही देता ,
केवल बेचैनी ही रहती है ,
नींद तक अधूरी है ,
आकाश में यदि बादल हों ,
उमस और बढ़ जाती है ,
घबराहट पैदा कर जाती है ,
कहाँ जायें क्या करें ,
कुछ भी अच्छा नहीं लगता ,
इतना अधिक तपता मौसम ,
जिससे बचने का उपाय ,
नज़र नहीं आता ,
पर इस ऋतु चक्र में ,
गर्मी बहुत ज़रूरी है ,
इसके बाद ही बारिश आती है ,
चारों ओर हरियाली छाती है ,
मन हरियाली में रम जाता है ,
उत्साह से भर जाता है ,
फिर से हल्का हो जाता है |


आशा

22 मई, 2010

जंगल की एक रात

मुझे याद है पिकनिक पर जाने का वह दिन ,
जल प्रपात का सौन्दर्य निहारने का वह दिन ,
दिन बीत गया खेलने और मनोरंजन में ,
जैसे ही शाम होने लगी ,
घर की चिंता होने लगी ,
फिर भी सुरमई शाम को जंगल में घूमना ,
तरह-तरह के पक्षी देखना ,
अपने आप में एक करिश्मा था ,
उन्हें देख मन खुशियों से भर जाता था ,
सूखे पत्तों से भरी पगडंडियों पर चलना ,
चरमर-चरमर आवाज़ें सुनना ,
अजीब अहसास कराता था ,
मन धीरे-धीरे गुनगुनाता था ,
शायद हम रास्ता भटक गये थे ,
अपनी मंज़िल से दूर निकल गये थे ,
जब अँधियारा छाने लगा ,
साँय-साँय करता जंगल ,
और जंगली जानवरों का भय ,
हमें विचलित करने लगा ,
भय मन में भरने लगा ,
सामने एक वृक्ष घना था ,
वहाँ रुकें उचित यही था ,
आसमान में झिलमिल करते तारे ,
हमें उस ओर खींच ले गये ,
रात में ठहरने की वजह बन गये ,
नींद कोसों दूर हो गयी ,
बातों ही बातों में ,
जाने कब आधी रात हो गयी ,
एकाएक बादलों ने नभ में ,
उमड़ घुमड़ कर जल बरसाया ,
तेज बारिश ने सब को नहलाया ,
कम्पित तन , घुटनों में सर
जल से सराबोर हम बैठे थे ,
तरह-तरह की आवाजों का
मन में भय समेटे थे ,
फिर से जब बरसात थम गयी ,
तारों की लुकाछिपी शुरू हो गयी ,
शायद वे हम पर हँस रहे थे ,
हमारी बेचारगी पर तरस खा रहे थे ,
इतने में एक तारा टूटा ,
औरआकाश में विलीन होगया ,
हम भी कहीं गुम हो जायेंगे ,
टूटे तारे की तरह खो जायेंगे ,
फिर जाने कब आँख लग गयी ,
पौ फटते ही नींद खुल गयी ,
जब घर की राह नज़र आई ,
घर की ओर दौड़ लगाई ,
जंगल में रात कैसे कटी ,
यह बताना अच्छा लगता है ,
पूरी कहनी सुनाना ,
मन को भाता है ,
भय को पीछे छोड़,
वहाँ फिर से जाने का दिल करता है ,
जंगल में कटी रात कैसे भूल पायेंगे ,
जब भी कभी बात चलेगी ,
हम वही संस्मरण दोहरायेंगे |


आशा