है जिंदगी इक शमा की तरह ,
जैसे जैसे आगे बढ़ती है ,
गति साँसों की धीमी होती है ,
शमा तो रात भर जलती है ,
सुबह होते ही गुल हो जाती है ,
धीरे धीरे जलते जलते ,
रोशनी कम होती जाती है ,
वह तो जलती है, पर हित के लिए ,
परवाने उस पर मर मिटते हैं ,
जब कोई लौ से टकराता है ,
उसे बुझाना चाहता है ,
शमा सतर्क हो जाती है ,
बुझने से बच जाती है ,
जीवन की चाह उसे,
गुल होने नहीं देती ,
जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है ,
कई दौर से गुजरती है ,
कभी परोपकारी होती है ,
कभी स्वार्थी भी हो जाती है ,
बुझने के पहले ,
चंद लम्हों के लिए ,
चेतना लौट कर आती है ,
अंधकार फिर छा जाता है ,
सांसें वहीँ रुक जाती हैं ,
परोपकार साथ देता है ,
स्वार्थ यहीं रह जाता है ,
वैसे तो सच यह है ,
थोड़े दिन परोपकार याद रहते हें ,
फिर समय के साथ धुंधला जाते हें ,
मनुष्य तो खाली हाथ आता है ,
और खाली हाथ ही जाता है |
आशा
07 जुलाई, 2010
06 जुलाई, 2010
मैं तुम्हें पा कर रहूंगी
इस चमक दमक कि दुनिया में ,
तुम्हारी तलाश मुझे रहती है ,
क्यूँ फीके रंगों की बात करूं ,
समा रंगीन बर्बाद करूं ,
हर सुबह तुम्ही से होती है ,
हर शाम तुम्हीं से होती है ,
मैं शमा जलाए बैठी हूं ,
हर रात तुम्ही में खोती है ,
केवल एक झलक पाने को ,
मन की प्यास बुझाने को ,
कितने ही यत्न किये मैने ,
पर कभी सफलता पा न सकी ,
इस दूरी को मिटा न सकी ,
सारा बैभव छोड़ दिया ,
दुनिया से खुद को दूर किया ,
एकाग्र मना मैं सोच रही ,
तुम जैसा खुद को ढाल रही ,
कभी तो मन पसीजेगा ,
अपनी ओर आकृष्ट करेगा ,
यह तो एक ऐसा बंधन है ,
जिसे समझना मुश्किल है ,
अदृश्य नियंता ने जाने कब ,
मुझको इसका भान कराया ,
तुम्हीं को पाने के लिए ,
बंधन प्रगाढ़ बनाने के लिए ,
मैं सारी हदें पार करूंगी ,
तलाश मेरी जब पूरी होगी ,
पूरे दिल से सत्कार करूंगी ,
कितनी भी कठिनाई आए ,
मैं तुम्हें पा कर ही रहूंगी |
आशा
तुम्हारी तलाश मुझे रहती है ,
क्यूँ फीके रंगों की बात करूं ,
समा रंगीन बर्बाद करूं ,
हर सुबह तुम्ही से होती है ,
हर शाम तुम्हीं से होती है ,
मैं शमा जलाए बैठी हूं ,
हर रात तुम्ही में खोती है ,
केवल एक झलक पाने को ,
मन की प्यास बुझाने को ,
कितने ही यत्न किये मैने ,
पर कभी सफलता पा न सकी ,
इस दूरी को मिटा न सकी ,
सारा बैभव छोड़ दिया ,
दुनिया से खुद को दूर किया ,
एकाग्र मना मैं सोच रही ,
तुम जैसा खुद को ढाल रही ,
कभी तो मन पसीजेगा ,
अपनी ओर आकृष्ट करेगा ,
यह तो एक ऐसा बंधन है ,
जिसे समझना मुश्किल है ,
अदृश्य नियंता ने जाने कब ,
मुझको इसका भान कराया ,
तुम्हीं को पाने के लिए ,
बंधन प्रगाढ़ बनाने के लिए ,
मैं सारी हदें पार करूंगी ,
तलाश मेरी जब पूरी होगी ,
पूरे दिल से सत्कार करूंगी ,
कितनी भी कठिनाई आए ,
मैं तुम्हें पा कर ही रहूंगी |
आशा
05 जुलाई, 2010
कल भारत बंद है
चिंकी पिंकी लो यह पर्चा ,
जल्दी से सौदा ले आओ ,
शायद तुमको पता नहीं ,
कल बाजार बंद है |
सुनो ज़रा अपने पापा को भी ,
मोबाइल तुम कर देना ,
आज जरा जल्दी आ जाएं ,
कल की भी अर्जी दे आएं ,
कल जाना न हो पाएगा ,
गाड़ी के पहिये थम जाएंगे ,
कल तो भारत बंद है |
एक थाली भी चुनना है ,
मंहगाई का विरोध करना है ,
पर टूटी थाली ही चुनना ,
नई नहीं कोइ चुनना |
बजा बजा कर थाली को
तो तोड़ा जा सकता है ,
पर कमर तोड़ मंहगाई का ,
क्या कोइ हल निकल सकता है ?
हर बार बंद होते हैं ,
वे सफल भी होते है ,
हर बार यही दावा होता है ,
पर असर उल्टा होता है,
मंहगाई और बढ़ती जाती है |
इस बार न जाने क्या होगा ,
पर दिन भर के रुके कामों का,
जो भी हर्जाना होगा ,
उसकी भरपाई कौन करेगा ?
जब भी ऐसे बंद होते है ,
मंहगाई और बढा जाते है ,
आम आदमी ही पिसता है ,
पर वह यह नहीं समझता है |
आशा
जल्दी से सौदा ले आओ ,
शायद तुमको पता नहीं ,
कल बाजार बंद है |
सुनो ज़रा अपने पापा को भी ,
मोबाइल तुम कर देना ,
आज जरा जल्दी आ जाएं ,
कल की भी अर्जी दे आएं ,
कल जाना न हो पाएगा ,
गाड़ी के पहिये थम जाएंगे ,
कल तो भारत बंद है |
एक थाली भी चुनना है ,
मंहगाई का विरोध करना है ,
पर टूटी थाली ही चुनना ,
नई नहीं कोइ चुनना |
बजा बजा कर थाली को
तो तोड़ा जा सकता है ,
पर कमर तोड़ मंहगाई का ,
क्या कोइ हल निकल सकता है ?
हर बार बंद होते हैं ,
वे सफल भी होते है ,
हर बार यही दावा होता है ,
पर असर उल्टा होता है,
मंहगाई और बढ़ती जाती है |
इस बार न जाने क्या होगा ,
पर दिन भर के रुके कामों का,
जो भी हर्जाना होगा ,
उसकी भरपाई कौन करेगा ?
जब भी ऐसे बंद होते है ,
मंहगाई और बढा जाते है ,
आम आदमी ही पिसता है ,
पर वह यह नहीं समझता है |
आशा
04 जुलाई, 2010
सत्यता जीवन की
तरह तरह के लोग ,
आसपास जब होते हें ,
सब एक जैसे नहीं होते ,
कुछ विनम्र दीखते हैं ,
कई उग्र हो जाते है ,
कुछ ऐसे भी होते हैं ,
मीठी छुरी बने रहते हैं |
कटुता मन मैं विष भरती है
नहीं किसी को फलती है ,
सारी कटुता को बिसरा कर ,
क्षमा उसे यदि कर पाएं ,
अपनी गलती यदि खोजी ,
मन मैं पश्चाताप किया ,
हर क्षण खुशी से भर जाएगा ,
बीता कल हावी नहीं होगा ,
सारी कटुता बहा ले जाएगा ,
जीने का सही मार्ग यही है ,
मेरा अपना विश्वास यही है ,
भविष्य में क्या होना है ,
इसकी तो चिंता रहती है ,,
जीवन सफल बनाने की ,
मन में अभिलाषा रहती है ,
जो कल किया और आगे करना है ,
कठिन समस्या रहती है |
आगे बढने की प्रतिस्पर्धा में ,
बैचेनी भी रहती है ,
तटस्थ भाव से यदि देखें ,
भौतिकता सब कुछ नहीं होती ,
मन को संतोष नहीं देती ,
कुछ काम ऐसेभी है ,
जो मन को शांति देते हैं ,
इसी सकून को पाने के लिए ,
निष्काम भाव से जीना होगा ,
बैर भाव और कटुता को ,
खुद से दूर रखना होगा ,
प्रकृति हर नुकसान की ,
भरपाई तभी कर पाएगी ,
जब यह विश्वास जाग्रत होगा ,
सही मार्ग मिलता जाएगा ,
सफलता तुम्हारे कदम चूमेंगी ,
खुशियों से तुमको भर देंगी ,
सदा तुम्हारे साथ चलेगी ,
जीवन आनन्दित कर देगी
आशा
आसपास जब होते हें ,
सब एक जैसे नहीं होते ,
कुछ विनम्र दीखते हैं ,
कई उग्र हो जाते है ,
कुछ ऐसे भी होते हैं ,
मीठी छुरी बने रहते हैं |
कटुता मन मैं विष भरती है
नहीं किसी को फलती है ,
सारी कटुता को बिसरा कर ,
क्षमा उसे यदि कर पाएं ,
अपनी गलती यदि खोजी ,
मन मैं पश्चाताप किया ,
हर क्षण खुशी से भर जाएगा ,
बीता कल हावी नहीं होगा ,
सारी कटुता बहा ले जाएगा ,
जीने का सही मार्ग यही है ,
मेरा अपना विश्वास यही है ,
भविष्य में क्या होना है ,
इसकी तो चिंता रहती है ,,
जीवन सफल बनाने की ,
मन में अभिलाषा रहती है ,
जो कल किया और आगे करना है ,
कठिन समस्या रहती है |
आगे बढने की प्रतिस्पर्धा में ,
बैचेनी भी रहती है ,
तटस्थ भाव से यदि देखें ,
भौतिकता सब कुछ नहीं होती ,
मन को संतोष नहीं देती ,
कुछ काम ऐसेभी है ,
जो मन को शांति देते हैं ,
इसी सकून को पाने के लिए ,
निष्काम भाव से जीना होगा ,
बैर भाव और कटुता को ,
खुद से दूर रखना होगा ,
प्रकृति हर नुकसान की ,
भरपाई तभी कर पाएगी ,
जब यह विश्वास जाग्रत होगा ,
सही मार्ग मिलता जाएगा ,
सफलता तुम्हारे कदम चूमेंगी ,
खुशियों से तुमको भर देंगी ,
सदा तुम्हारे साथ चलेगी ,
जीवन आनन्दित कर देगी
आशा
03 जुलाई, 2010
क्षितिज
है अनंत यह आसमान ,
इसका कोई छोर नहीं ,
दूर क्षितिज में जब भी देखा ,
धरती आकाश को मिलते देखा ,
जब अधिक पास जाना चाहा ,
उनको दोराहे पर पाया ,
यह तो केवल भ्रम ही है ,
कि क्षितिज दौनों को मिलाता है ,
सारी दुनिया यही समझती है ,
यह वही जगह है ,
जो पृथ्वी आकाश की मिलन स्थली है ,
जिंदगी का क्षितिज भी ,
न कोई खोज पाया ,
यह कल्पना से परे ,
एक उलझी हुई पहेली है ,
जिसने उसे हल करना चाहा ,
खुद को और उलझता पाया |
आशा
इसका कोई छोर नहीं ,
दूर क्षितिज में जब भी देखा ,
धरती आकाश को मिलते देखा ,
जब अधिक पास जाना चाहा ,
उनको दोराहे पर पाया ,
यह तो केवल भ्रम ही है ,
कि क्षितिज दौनों को मिलाता है ,
सारी दुनिया यही समझती है ,
यह वही जगह है ,
जो पृथ्वी आकाश की मिलन स्थली है ,
जिंदगी का क्षितिज भी ,
न कोई खोज पाया ,
यह कल्पना से परे ,
एक उलझी हुई पहेली है ,
जिसने उसे हल करना चाहा ,
खुद को और उलझता पाया |
आशा
मेरा जीवन सागर जैसा
मेरा जीवन सागर जैसा ,
और उन्माद सागर उर्मी सा ,
सागर की उथलपुथल ,
अनेक आपदाएं लाती है ,
जो भी फंस जाए उसमे ,
अपनी जान से जाता है ,
सागर शांत जब होता है ,
आकर्षित सब को करता है |
मुझ में जब उफान आता है ,
असंयत ब्यवहार हो जाता है ,
क्या गलत किया मैने ,
अहसास बाद में होता है ,
पर पहले इसके ,
जाने कितना समय ,
व्यर्थ हो जाता है|
क्षतिपूर्ति नहीं होती ,
मन अशांत हो जाता है ,
केवल इतना ही नहीं होता ,
हीन भावना भी बढ़ती है ,
फिर जिंदगी में असफलता की ,
एक और कड़ी जुड़ जाती है |
जब कभी मुड़ कर देखता हूं ,
आत्म विश्लेषण भी करता हूं ,
बहुत देर हो जाती है ,
बाजी हाथ से निकल जाती है |
असंयत ब्यवहार मेरा ,
दूसरों को दुखी करता है ,
कोइ जाने या न जाने ,
मैं भी दुखी होता हूं |
हर बार यही सोचता हूं ,
यदि खुद में परिवर्तन ला पाऊं ,
सागर की तरह शांत हो जाऊं ,
तब कितना अच्छा जीवन होगा ,
कोइ न मेरा बैरी होगा |
यह सब मैं जानता हूं ,
समझता भी हूं ,
पर कमीं है आत्मसंयम की,
भावनाएं अनियंत्रित हो जाती हैं ,
बड़ी बड़ी लहरों की तरह ,
बहुत उत्पात मचा जाती हैं ,
समय हाथ से निकल जाता है ,
मुठ्ठी में भरी रेत, की तरह फिसल जाता है ,
सोचता हूं अब मैं ,
किसी ऐसे की शरण में जाऊं ,
सही शिक्षा यदि पाऊं ,
मेरा अशांत मन ,
फिर से शांत हो जाएगा ,
आध्यात्म की ओर झुक जाएगा
आशा
और उन्माद सागर उर्मी सा ,
सागर की उथलपुथल ,
अनेक आपदाएं लाती है ,
जो भी फंस जाए उसमे ,
अपनी जान से जाता है ,
सागर शांत जब होता है ,
आकर्षित सब को करता है |
मुझ में जब उफान आता है ,
असंयत ब्यवहार हो जाता है ,
क्या गलत किया मैने ,
अहसास बाद में होता है ,
पर पहले इसके ,
जाने कितना समय ,
व्यर्थ हो जाता है|
क्षतिपूर्ति नहीं होती ,
मन अशांत हो जाता है ,
केवल इतना ही नहीं होता ,
हीन भावना भी बढ़ती है ,
फिर जिंदगी में असफलता की ,
एक और कड़ी जुड़ जाती है |
जब कभी मुड़ कर देखता हूं ,
आत्म विश्लेषण भी करता हूं ,
बहुत देर हो जाती है ,
बाजी हाथ से निकल जाती है |
असंयत ब्यवहार मेरा ,
दूसरों को दुखी करता है ,
कोइ जाने या न जाने ,
मैं भी दुखी होता हूं |
हर बार यही सोचता हूं ,
यदि खुद में परिवर्तन ला पाऊं ,
सागर की तरह शांत हो जाऊं ,
तब कितना अच्छा जीवन होगा ,
कोइ न मेरा बैरी होगा |
यह सब मैं जानता हूं ,
समझता भी हूं ,
पर कमीं है आत्मसंयम की,
भावनाएं अनियंत्रित हो जाती हैं ,
बड़ी बड़ी लहरों की तरह ,
बहुत उत्पात मचा जाती हैं ,
समय हाथ से निकल जाता है ,
मुठ्ठी में भरी रेत, की तरह फिसल जाता है ,
सोचता हूं अब मैं ,
किसी ऐसे की शरण में जाऊं ,
सही शिक्षा यदि पाऊं ,
मेरा अशांत मन ,
फिर से शांत हो जाएगा ,
आध्यात्म की ओर झुक जाएगा
आशा
02 जुलाई, 2010
एकाकी जीवन मेरा
छोटीसी जिंदगी होती है
कई अनुभवों से भरी हुई
जैसे एकाकी जीवन मेरा
पेड़ से टूटे पत्ते सा
वह जीवन ही क्या
सुख ने ना झंका जिस में
दुखों ने किनारा न किया
केवल असंतोष को जन्म दिया |
जब दुःख परचम फहराता है
मन बहुत खिन्न हो जाता है
हर समय का अकेलापन
बहुत उदास कर जाता है |
परेशानी हावी हो जाती है
नीरस जिंदगी हो जाती है
अकेलेपन से बचना चाहती है
खालीपन भरना चाहती है |
कई बार आंसूं भी
नदी में उफान की तरह आते हैं
झरने की तरह झर झर बहते जाते हैं
और अधिक उदास कर जाते है
मैं अकेला ही निकला हूं
ऐसी जिंदगी की तलाश में
जहां दुःख का साया ना हो
यदि आंसू आएं भी तो खुशी के हों
और साथी हो तो ऐसा हो
जब भी मेरे साथ चले
मेरे एकाकी जीवन मैं
रंग खुशियों के भर दे |
आशा
कई अनुभवों से भरी हुई
जैसे एकाकी जीवन मेरा
पेड़ से टूटे पत्ते सा
वह जीवन ही क्या
सुख ने ना झंका जिस में
दुखों ने किनारा न किया
केवल असंतोष को जन्म दिया |
जब दुःख परचम फहराता है
मन बहुत खिन्न हो जाता है
हर समय का अकेलापन
बहुत उदास कर जाता है |
परेशानी हावी हो जाती है
नीरस जिंदगी हो जाती है
अकेलेपन से बचना चाहती है
खालीपन भरना चाहती है |
कई बार आंसूं भी
नदी में उफान की तरह आते हैं
झरने की तरह झर झर बहते जाते हैं
और अधिक उदास कर जाते है
मैं अकेला ही निकला हूं
ऐसी जिंदगी की तलाश में
जहां दुःख का साया ना हो
यदि आंसू आएं भी तो खुशी के हों
और साथी हो तो ऐसा हो
जब भी मेरे साथ चले
मेरे एकाकी जीवन मैं
रंग खुशियों के भर दे |
आशा
01 जुलाई, 2010
दर्पण
दर्पण के सामने जो भी आया
उसने उसका रूप दिखाया
वह दांये को बांया,बाएं को दांया
दिखलाता अवश्य है
फिर भी सब कुछ
दिख ही जाता है |
चेहरे पर जो भी भाव आए
स्पष्ट दिखाई दे जाते हैं
सुख हो या दुःख
शीशे में दिख ही जाते हैं |
मुखोटा यदि चेहरे पर हो
भाव कहीं छिप जाते हैं
जैसे ही वह हटता है
वे साफ उभर कर आते हैं |
जब रंग मंच का उठता है पर्दा
नाटक का प्रत्येक पात्र
अभिनय कर कुछ दर्शाता है
कलाकार का असली चेहरा
रंग मंच पर खो जाता है
पात्र यदि भाव प्रवण न हो
नाटक नीरस हो जाता है |
फिर से दर्पण में निहार कर
खुद को जब खोजना चाहे
मन में छिपे दर्द को उसके
दर्पण भी न पहचान पाए
दिखाई देता है चेहरा उसमें
पर मन में छिपे भावों को
वह भी नकार देता है
विष कन्या सुन्दर दिखती थी
पर रोम रोम में भरा विष
दर्पण नहीं देख पाता था
वह तो बाह्य सुंदरता का ही
आकलन कर पाता था
सुंदरता चार चाँद लगाती है
ब्यक्तित्व को निखारती है
कई तरह के प्रसाधनों से
यदि कोई रूप सवारता है
दर्पण में निहारता है
वह सुन्दर भी दिखने लगता है
यदि कोइ कमी रह जाए
दर्पण तुरंत पकड़ लेता है |
सब सुन्दर नहीं होते
यह दर्पण भी समझता है
यदि सारे सुन्दर चहरे
दर्पण के सामने आएंगे
तो बेचारे कुरूप कहाँ जाएंगे |
आशा
मैं तो एक शमा हूं ,
मैं जलती हुई शमा हूं
यह कैसे समझाऊं परवानों को
तरह तरह की भाषा जिनकी
और जाति भी जुदा जुदा |
बिना बुलाये आते हैं
जब तक कुछ कहना चाहूं
जल कर राख हो जाते हैं
बदनाम मुझे कर जाते है |
मैं जलती हूं रोशनी के लिए
सब को राह दिखाने के लिए
एक रात का जीवन मेरा
नहीं चाहती अहित किसी का |
इसी लिए तो कहती हूँ
यहां रात में क्या रखा है
छोटा सा जीवन है तुम्हारा
आज नहीं तो कल जाना है
जीवन का अंत तो होना है
दिन के प्रकाश में तुम जाओ
उन अतृप्त चिड़ियों के पास
जिनका भोजन यदि बन पाओ
तृप्त उन्हें तुम कर सकते हो
तब यह तो लोग न कह पाएगें,
मैं जलती हूं तुम्हारे लिए
रिझाती हूं तुम्हें
अपने पास आने के लिए |
तुम एक बात मेरी सुन लो
फिर से मेरे पास न आना
मरने की यदि चाहत ही हो
उन चिड़ियों के पास चले जाना
यदि मेरी बात रास न आए
तुमको यदि यह ना भाए
तब कहीं और चले जाना
फिर से बापस ना आना |
आशा
30 जून, 2010
रूढ़िवादिता
ना ही धोखा दिया ,
ना ही हम बेवफा हैं ,
हैं कुछ मजबूरियाँ ऐसी,
कि हम तुम से जुदा हैं |
समाज ने हम को ,
किसी तरह जीने न दिया ,
साथ रहने की चाहत को ,
समूल नष्ट किया ,
पर अब जो भी हो ,
समाज में परिवर्तन लाना होगा ,
रुढीवादी विचारधारा को ,
आईना दिखाना होगा ,
उसे जड़मूल से मिटाना होगा ,
आने वाली पीढ़ी भी वर्ना,
कुछ ना कर पायेगी,
इसी तरह यदि फँसी रही ,
कैसे आगे बढ़ पायेगी ,
हम तो बुज़दिल निकले ,
समाज से मोर्चा ले न सके ,
कुछ कारण ऐसे बने कि ,
अपनी बात पर टिक न सके ,
अब बेरंग ज़िंदगी जीते हैं ,
हर पल समाज को कोसते हैं ,
अपनी अगली पीढ़ी को ,
दूर ऐसे समाज से रखेंगे ,
समस्या तब कोई न होगी ,
स्वतंत्र विचारधारा होगी |
आशा
ना ही हम बेवफा हैं ,
हैं कुछ मजबूरियाँ ऐसी,
कि हम तुम से जुदा हैं |
समाज ने हम को ,
किसी तरह जीने न दिया ,
साथ रहने की चाहत को ,
समूल नष्ट किया ,
पर अब जो भी हो ,
समाज में परिवर्तन लाना होगा ,
रुढीवादी विचारधारा को ,
आईना दिखाना होगा ,
उसे जड़मूल से मिटाना होगा ,
आने वाली पीढ़ी भी वर्ना,
कुछ ना कर पायेगी,
इसी तरह यदि फँसी रही ,
कैसे आगे बढ़ पायेगी ,
हम तो बुज़दिल निकले ,
समाज से मोर्चा ले न सके ,
कुछ कारण ऐसे बने कि ,
अपनी बात पर टिक न सके ,
अब बेरंग ज़िंदगी जीते हैं ,
हर पल समाज को कोसते हैं ,
अपनी अगली पीढ़ी को ,
दूर ऐसे समाज से रखेंगे ,
समस्या तब कोई न होगी ,
स्वतंत्र विचारधारा होगी |
आशा
29 जून, 2010
परम सत्य
जन्म जीवन की सुबह है ,
तो मृत्यु शाम है,
शाम जब ढल जाती है ,
अंधकार हो जाता है ,
दिन का प्रकाश,
जाने कहाँ खो जाता है ,
जीवन साथ छोड़ जाता है ,
सब कुछ यहीं रह जाता है ,
मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ वह ,
विचारों में खो जाता है ,
कई बातें याद आती हैं ,
कभी पश्चाताप भी होता है ,
मन में भय भी उभरता है ,
लोभी का लोभ यदि ना छूटे ,
वह विचलित भी होता है ,
सत्कर्म हो या दुष्कर्म ,
सभी यहीं छूट जाते हैं ,
जाने वाले अपने निशान छोड़ जाते हैं ,
दुष्कर्मों की गहरी खाई ,
समय के साथ पट जाती है ,
यादें सत्कर्मों की ,
लम्बे समय तक रहती हैं ,
जन्म और मृत्यु शाश्वत सत्य हैं .
है जन्म जीवन का प्रारम्भ ,
तो मृत्यु अंतिम छोर है ,
सब जानते हुए भी ,
लालसा जीने की रहती है ,
यदि सचेत न हुए ,
आत्मा को शांति नहीं मिलती ,
सच है परम सत्य यही है ,
मृत्यु ही परम शांति है ,
जीवन की विश्रान्ति है |
आशा
तो मृत्यु शाम है,
शाम जब ढल जाती है ,
अंधकार हो जाता है ,
दिन का प्रकाश,
जाने कहाँ खो जाता है ,
जीवन साथ छोड़ जाता है ,
सब कुछ यहीं रह जाता है ,
मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ वह ,
विचारों में खो जाता है ,
कई बातें याद आती हैं ,
कभी पश्चाताप भी होता है ,
मन में भय भी उभरता है ,
लोभी का लोभ यदि ना छूटे ,
वह विचलित भी होता है ,
सत्कर्म हो या दुष्कर्म ,
सभी यहीं छूट जाते हैं ,
जाने वाले अपने निशान छोड़ जाते हैं ,
दुष्कर्मों की गहरी खाई ,
समय के साथ पट जाती है ,
यादें सत्कर्मों की ,
लम्बे समय तक रहती हैं ,
जन्म और मृत्यु शाश्वत सत्य हैं .
है जन्म जीवन का प्रारम्भ ,
तो मृत्यु अंतिम छोर है ,
सब जानते हुए भी ,
लालसा जीने की रहती है ,
यदि सचेत न हुए ,
आत्मा को शांति नहीं मिलती ,
सच है परम सत्य यही है ,
मृत्यु ही परम शांति है ,
जीवन की विश्रान्ति है |
आशा
28 जून, 2010
पाप और पुण्य
होते सिक्के के दो पहलू
एक पाप और एक पुण्य
बाध्य करते सोचने को
है पाप क्या और पुण्य क्या
है यह अवधारणा
विकसित मस्तिष्क की |
विकसित मस्तिष्क की |
निजी स्वार्थ हित धन देना
क्या पाप नहीं होता ?
पर मंदिर में दिया दान
कैसे पुण्य हो जाता |
जहाँ किसी का हित होता
वही पुण्य निहित होता
जब पश्चाताप किसी को होता
उसके लिए वही पाप होता
आवश्यकता से अधिक संचय
आता पाप की श्रेणी में
लोक हित के लिए संचय
लोक हित के लिए संचय
महान कार्य कहा जाता |
यदि पशु की बलि देते हैं
कहलाता देवी का प्रसाद
पर है पशु वध हिंसा ही
यह पाप भी कहलाती है |
है दोनों में अंतर क्या
यह कठिन प्रश्न सा लगता है |
पाप है क्या व पुण्य क्या ?
दृष्टिकोण है सब का अपना
जो जैसा सोचता है
वैसा ही उसको लगता |
आशा
यदि पशु की बलि देते हैं
कहलाता देवी का प्रसाद
पर है पशु वध हिंसा ही
यह पाप भी कहलाती है |
है दोनों में अंतर क्या
यह कठिन प्रश्न सा लगता है |
पाप है क्या व पुण्य क्या ?
दृष्टिकोण है सब का अपना
जो जैसा सोचता है
वैसा ही उसको लगता |
आशा
27 जून, 2010
नई राह
ना तुम बदले, ना हम बदले
पिछली बातों में क्या रखा है
क्यूँ न हम उन्हें भूल जायें
फिर से अनजान हो जायें
समय बदलाव लाता है
अनुभव भी कुछ सिखाता है
यदि रास्ता नहीं खोजा
साथ-साथ चलते ही रहे
जीवन एक रस हो जायेगा
जब नई राहें होंगी
बंधन कोई नहीं होगा
एक नई पहचान बनेगी
और जिंदगी कट जायेगी
वादा बस एक करना होगा
ना तुम मुझसे मिलना
और ना मैं तुमसे
इसी राह पर यदि चल पाये
फिर से अजनबी हो जायेंगे |
आशा
काले कजरारे भूरे बादल
काले कजरारे भूरे बादल,
सारे आसमान में छाये ,
आशा कि किरणें जागी मन में ,
अब तो शायद बरसेंगे ,
पहले सा निराश नहीं करेंगे ,
सारे दिन का इन्तजार ,
निराशा में बदल गया ,
जल की एक बूँद ना बरसी ,
और उमस बढ़ती गई ,
हवा के झोंको को भी ,
बादल सहन न कर पाये ,
जाने कहाँ गुम हो गये ,
हवा को भी संग ले गए ,
दिन में शाम नजर आई ,
चारों ओर अंधियारी छाई,
पर पानी तो बरसा ही नहीं ,
गर्मी और चौगुनी हो गई ,
अब आसमान बिल्कुल साफ है ,
बेचारा किसान बहुत उदास है ,
जाने कब वर्षा आयेगी ,
धरती की प्यास बुझा पायेगी ,
हाथों में बीज लिए वह सोच रहा ,
पिछला साल कहीं फिर तो ना लौटेगा ,
एक-एक बूँद पानी के लिये ,
जब त्राहि-त्राहि मचती थी ,
बिना पर्याप्त जल के ,
बहुत कठिनाई होती थी ,
सूखे की चपेट में आ कर ,
यदि धरती बंजर हो जायेगी ,
सारी खुशियाँ तिरोहित होंगी ,
रोज़ी रोटी भी जायेगी |
आशा
सारे आसमान में छाये ,
आशा कि किरणें जागी मन में ,
अब तो शायद बरसेंगे ,
पहले सा निराश नहीं करेंगे ,
सारे दिन का इन्तजार ,
निराशा में बदल गया ,
जल की एक बूँद ना बरसी ,
और उमस बढ़ती गई ,
हवा के झोंको को भी ,
बादल सहन न कर पाये ,
जाने कहाँ गुम हो गये ,
हवा को भी संग ले गए ,
दिन में शाम नजर आई ,
चारों ओर अंधियारी छाई,
पर पानी तो बरसा ही नहीं ,
गर्मी और चौगुनी हो गई ,
अब आसमान बिल्कुल साफ है ,
बेचारा किसान बहुत उदास है ,
जाने कब वर्षा आयेगी ,
धरती की प्यास बुझा पायेगी ,
हाथों में बीज लिए वह सोच रहा ,
पिछला साल कहीं फिर तो ना लौटेगा ,
एक-एक बूँद पानी के लिये ,
जब त्राहि-त्राहि मचती थी ,
बिना पर्याप्त जल के ,
बहुत कठिनाई होती थी ,
सूखे की चपेट में आ कर ,
यदि धरती बंजर हो जायेगी ,
सारी खुशियाँ तिरोहित होंगी ,
रोज़ी रोटी भी जायेगी |
आशा
26 जून, 2010
जब भी कोरा कागज़ देखा
जब भी कोरा कागज़ देखा ,
पत्र तुम्हें लिखना चाहा ,
लिखने के लिए स्याही न चुनी ,
आँसुओं में घुले काजल को चुना ,
जब वे भी जान न डाल पाये ,
मुझे पसंद नहीं आये ,
अजीब सा जुनून चढ़ा ,
अपने खून से पत्र लिखा ,
यह केवल पत्र नहीं है ,
मेरा दिल है ,
जब तक जवाब नहीं आयेगा ,
उसको चैन नहीं आयेगा ,
चाहे जितने भी व्यस्त रहो ,
कुछ तो समय निकाल लेना ,
उत्तर ज़रूर उसका देना ,
निराश मुझे नहीं करना ,
जितनी बार उसे पढूँगी ,
तुम्हें निकट महसूस करूँगी ,
फिर एक नये उत्साह से ,
और अधिक विश्वास से ,
तुम्हें कई पत्र लिखूँगी ,
जब भी उनको पढूँगी ,
मैं तुम में खोती जाऊँगी ,
आत्म विभोर हो जाऊँगी |
आशा
पत्र तुम्हें लिखना चाहा ,
लिखने के लिए स्याही न चुनी ,
आँसुओं में घुले काजल को चुना ,
जब वे भी जान न डाल पाये ,
मुझे पसंद नहीं आये ,
अजीब सा जुनून चढ़ा ,
अपने खून से पत्र लिखा ,
यह केवल पत्र नहीं है ,
मेरा दिल है ,
जब तक जवाब नहीं आयेगा ,
उसको चैन नहीं आयेगा ,
चाहे जितने भी व्यस्त रहो ,
कुछ तो समय निकाल लेना ,
उत्तर ज़रूर उसका देना ,
निराश मुझे नहीं करना ,
जितनी बार उसे पढूँगी ,
तुम्हें निकट महसूस करूँगी ,
फिर एक नये उत्साह से ,
और अधिक विश्वास से ,
तुम्हें कई पत्र लिखूँगी ,
जब भी उनको पढूँगी ,
मैं तुम में खोती जाऊँगी ,
आत्म विभोर हो जाऊँगी |
आशा
25 जून, 2010
बंजारा
मैं बंजारा घूम रहा ,
कभी यहाँ तो कभी वहाँ ,
कहीं रात गुजरती है ,
सुबह कहीं और होती है ,
जिंदगी यूँ ही बसर होती है |
चाहे जहाँ घर बन जाता है ,
भोजन पानी भी मिल जाता है ,
जब भी पैर थक जाते हैं ,
पड़ाव वहीं डल जाता है |
दुनिया की चमक दमक से ,
दूरी अब तक रख पाया ,
सीमित आवश्यकताओं से ही,
खुद को जीत पाया |
मैं तो एक बंजारा हूँ ,
जगह-जगह घूमता हूँ ,
एक जगह बंध कर रहना ,
आजादी का हनन लगता,
नहीं चाहता महल अटारी ,
मेरा घर दुनिया सारी ,
मेहनतकश इंसान हूँ,
मेहनत रंग लाती है मेरी |
जब थकान हो जाती है ,
फटा चादरा ओढ़ कर ,
चाहे जहाँ सो जाता हूँ ,
सपनों में खो जाता हूँ |
जैसे ही सुबह होती है,
फिर खानाबदोश हो जाता हूँ |
आशा
कभी यहाँ तो कभी वहाँ ,
कहीं रात गुजरती है ,
सुबह कहीं और होती है ,
जिंदगी यूँ ही बसर होती है |
चाहे जहाँ घर बन जाता है ,
भोजन पानी भी मिल जाता है ,
जब भी पैर थक जाते हैं ,
पड़ाव वहीं डल जाता है |
दुनिया की चमक दमक से ,
दूरी अब तक रख पाया ,
सीमित आवश्यकताओं से ही,
खुद को जीत पाया |
मैं तो एक बंजारा हूँ ,
जगह-जगह घूमता हूँ ,
एक जगह बंध कर रहना ,
आजादी का हनन लगता,
नहीं चाहता महल अटारी ,
मेरा घर दुनिया सारी ,
मेहनतकश इंसान हूँ,
मेहनत रंग लाती है मेरी |
जब थकान हो जाती है ,
फटा चादरा ओढ़ कर ,
चाहे जहाँ सो जाता हूँ ,
सपनों में खो जाता हूँ |
जैसे ही सुबह होती है,
फिर खानाबदोश हो जाता हूँ |
आशा
24 जून, 2010
पल दो पल की खुशियाँ
संघर्ष रत इस दुनिया में ,
उलझनों से भरा हुआ जीवन ,
फूलों की सेज सा दिखता है ,
पर काँटों की कमी भी नहीं है ,
समस्याओं का पिटारा है वह ,
जिन्हें सुलझाना ही होता है ,
शिकायतों के लिए जगह नहीं होती |
पल दो पल की खुशियाँ ,
इस में यदि झाँक पायें ,
उलझनों से दूरी रख कर ,
समस्याओं से भी निपट पायें ,
जीवन इतना भी सहज नहीं ,
जितना कि दिखाई देता है ,
सच तो यही है ,
दूर का ढोल सुहावना लगता है ,
कुछ क्षणों की प्रसन्नता की चाहत ,
हर किसी को होती है ,
वह भी यदि ऐसा ही चाहे ,
इसमें हानि ही क्या है ,
खुशियाँ जब जीवन में होंगी ,
कष्टों की पीड़ा कुछ तो कम होगी ,
तब जीवन असफल नहीं रहेगा ,
कुछ करने की चाह बढ़ेगी |
आशा
उलझनों से भरा हुआ जीवन ,
फूलों की सेज सा दिखता है ,
पर काँटों की कमी भी नहीं है ,
समस्याओं का पिटारा है वह ,
जिन्हें सुलझाना ही होता है ,
शिकायतों के लिए जगह नहीं होती |
पल दो पल की खुशियाँ ,
इस में यदि झाँक पायें ,
उलझनों से दूरी रख कर ,
समस्याओं से भी निपट पायें ,
जीवन इतना भी सहज नहीं ,
जितना कि दिखाई देता है ,
सच तो यही है ,
दूर का ढोल सुहावना लगता है ,
कुछ क्षणों की प्रसन्नता की चाहत ,
हर किसी को होती है ,
वह भी यदि ऐसा ही चाहे ,
इसमें हानि ही क्या है ,
खुशियाँ जब जीवन में होंगी ,
कष्टों की पीड़ा कुछ तो कम होगी ,
तब जीवन असफल नहीं रहेगा ,
कुछ करने की चाह बढ़ेगी |
आशा
23 जून, 2010
एक सत्य चित्रण (केरीकेचर)
जब उसको देखा परखा ,
तभी उसे जान पाये ,
उसकी अजीब आदतों का ,
कुछ मज़ा उठा पाये ,
हीनता से भरा हुआ वह ,
अपने दोष छुपाता था ,
कमज़ोर हुआ तो क्या ,
पहलवान सा चलता था,
यदि कोई देख रहा हो ,
दुगुना तन कर चलता था ,
कभी हिन्दी तो कभी अंग्रेजी में ,
अपना रौब झाड़ता था ,
यदि इसका भी प्रभाव न हो ,
चंद किताबों के संदर्भ बताता था ,
सबसे आगे रहने की चाहत ,
उसके मन में रहती थी ,
सब करने की क्षमता थी ,
ऐसा सब को जतलाता था ,
एक बार कड़ाके की ठण्ड में ,
सब को शान बताने के लिये ,
नदी में तैरने उतर गया ,
ठण्ड से दाँत बजने लगे ,
हाथ पैर भी रुकने लगे ,
जैसे तैसे बचाया गया ,
बुखार से हाल बेहाल हुआ ,
आदत शान बताने की ,
खुद को बहुत समझने की ,
उससे दूर न होती थी ,
रोज नये करतब करता था ,
चर्चा में खुद को रखता था ,
जब भी खेलों की चर्चा होती ,
वह हरफनमौला हो जाता था ,
जब भी मैदान में उतरता ,
कुछ देर भी न टिक पाता था ,
चोट यदि भूल से भी लगती ,
दूसरों को दोषी ठहराता था ,
पर बहस करने की आदत ,
वह छोड़ नहीं पाता था ,
सवा सेर जब कोई मिल जाता ,
वह पतली गली से निकल जाता था ,
सभी लोग पीठ पीछे ,
उसकी हँसी उड़ाते थे ,
वह एक ऐसा नमूना था ,
हँसी का पात्र बन कर भी जो ,
खुद में सुधार न कर पाया ,
वह क्या है क्या चाहता है ,
यह भी नहीं समझ पाया ,
पासिंग शो से अच्छा उन्वान,
जिसके लिए नहीं मिलता ,
उससे मिलने के लिए,
किसका जी नहीं होता |
आशा
तभी उसे जान पाये ,
उसकी अजीब आदतों का ,
कुछ मज़ा उठा पाये ,
हीनता से भरा हुआ वह ,
अपने दोष छुपाता था ,
कमज़ोर हुआ तो क्या ,
पहलवान सा चलता था,
यदि कोई देख रहा हो ,
दुगुना तन कर चलता था ,
कभी हिन्दी तो कभी अंग्रेजी में ,
अपना रौब झाड़ता था ,
यदि इसका भी प्रभाव न हो ,
चंद किताबों के संदर्भ बताता था ,
सबसे आगे रहने की चाहत ,
उसके मन में रहती थी ,
सब करने की क्षमता थी ,
ऐसा सब को जतलाता था ,
एक बार कड़ाके की ठण्ड में ,
सब को शान बताने के लिये ,
नदी में तैरने उतर गया ,
ठण्ड से दाँत बजने लगे ,
हाथ पैर भी रुकने लगे ,
जैसे तैसे बचाया गया ,
बुखार से हाल बेहाल हुआ ,
आदत शान बताने की ,
खुद को बहुत समझने की ,
उससे दूर न होती थी ,
रोज नये करतब करता था ,
चर्चा में खुद को रखता था ,
जब भी खेलों की चर्चा होती ,
वह हरफनमौला हो जाता था ,
जब भी मैदान में उतरता ,
कुछ देर भी न टिक पाता था ,
चोट यदि भूल से भी लगती ,
दूसरों को दोषी ठहराता था ,
पर बहस करने की आदत ,
वह छोड़ नहीं पाता था ,
सवा सेर जब कोई मिल जाता ,
वह पतली गली से निकल जाता था ,
सभी लोग पीठ पीछे ,
उसकी हँसी उड़ाते थे ,
वह एक ऐसा नमूना था ,
हँसी का पात्र बन कर भी जो ,
खुद में सुधार न कर पाया ,
वह क्या है क्या चाहता है ,
यह भी नहीं समझ पाया ,
पासिंग शो से अच्छा उन्वान,
जिसके लिए नहीं मिलता ,
उससे मिलने के लिए,
किसका जी नहीं होता |
आशा
22 जून, 2010
आज के संदर्भ मै
भ्रष्टाचार का दानव पनपा ,
महँगाई सीमा लाँघ गयी
जमाखोरी और रिश्वतखोरी भी ,
सारी हदें पर कर गई ,
कई लोग लिप्त हुए इसमें ,
सिक्ता कण से रमे सब में |
विषमता की विभीषिका ने ,
पग-पग पर कदम बढ़ाये अपने ,
गरीबों की जमीन हथिया कर ,
चालाक किसान धनवान हो गया ,
छोटा किसान बिना ज़मीन के ,
केवल मजदूर बन कर रह गया |
संख्या गरीबों की बढ़ी है ,
आवाज बुद्धिजीवी की ,
दवा दी जाती है ,
स्थिति देश की बिगड़ती जाती है ,
चंद हाथों में धन के सिमटने से ,
धनिक अधिक धनाढ्य हो गया ,
इस मकड़ जाल में फँस कर ,
जीना आम आदमी का कठिन हो रहा |
नेतागिरी एक धंधा बनने से ,
कई गुंडे नेता बन बैठे हैं ,
करते हैं देश हित की बातें ,
पर जेब अपनी भरते हैं ,
जब भी क्रांति आयेगी ,
जागृति समाज में लायेगी ,
सत्य की आवाज न दबाई जाएगी ,
गरीबों और अमीरों के बीच की ,
खाई पटती जायेगी ,
देश में खुशहाली आयेगी |
आशा
महँगाई सीमा लाँघ गयी
जमाखोरी और रिश्वतखोरी भी ,
सारी हदें पर कर गई ,
कई लोग लिप्त हुए इसमें ,
सिक्ता कण से रमे सब में |
विषमता की विभीषिका ने ,
पग-पग पर कदम बढ़ाये अपने ,
गरीबों की जमीन हथिया कर ,
चालाक किसान धनवान हो गया ,
छोटा किसान बिना ज़मीन के ,
केवल मजदूर बन कर रह गया |
संख्या गरीबों की बढ़ी है ,
आवाज बुद्धिजीवी की ,
दवा दी जाती है ,
स्थिति देश की बिगड़ती जाती है ,
चंद हाथों में धन के सिमटने से ,
धनिक अधिक धनाढ्य हो गया ,
इस मकड़ जाल में फँस कर ,
जीना आम आदमी का कठिन हो रहा |
नेतागिरी एक धंधा बनने से ,
कई गुंडे नेता बन बैठे हैं ,
करते हैं देश हित की बातें ,
पर जेब अपनी भरते हैं ,
जब भी क्रांति आयेगी ,
जागृति समाज में लायेगी ,
सत्य की आवाज न दबाई जाएगी ,
गरीबों और अमीरों के बीच की ,
खाई पटती जायेगी ,
देश में खुशहाली आयेगी |
आशा
21 जून, 2010
एक झलक तेरी
चूड़ियों की खनक ,
मेंहदी की महक ,
पैरों से पायल की छन-छन,
मन में मिश्री घोल रही ,
एक झलक पाने को तेरी ,
मन की कोयल बोल रही |
मीठी मधुर हँसी तेरी ,
घूँघट से झाँकती चितवन तेरी ,
क्यों बार-बार खींच लाती मुझको ,
तेरे दामन को छूती हवा ,
और करीब लाती मुझको |
लाल रंग के जोड़े में ,
लहरा कर जब चलती है ,
दामिनी सी दमकती है ,
और अधिक सम्मोहित करती है |
तू चपला है या मुखरा है ,
यह तो मुझे पता नहीं ,
पर यह तेरा सुन्दर चेहरा ,
जो छिपा हुआ अवगुंठन में ,
अपनी ओर खींचता मुझको |
मन पंछी उड़ना चाह रहा ,
पंखों को अपने तोल रहा ,
तेरी एक झलक पाने के लिये ,
मन का पिंजरा छोड़ रहा |
आशा
मेंहदी की महक ,
पैरों से पायल की छन-छन,
मन में मिश्री घोल रही ,
एक झलक पाने को तेरी ,
मन की कोयल बोल रही |
मीठी मधुर हँसी तेरी ,
घूँघट से झाँकती चितवन तेरी ,
क्यों बार-बार खींच लाती मुझको ,
तेरे दामन को छूती हवा ,
और करीब लाती मुझको |
लाल रंग के जोड़े में ,
लहरा कर जब चलती है ,
दामिनी सी दमकती है ,
और अधिक सम्मोहित करती है |
तू चपला है या मुखरा है ,
यह तो मुझे पता नहीं ,
पर यह तेरा सुन्दर चेहरा ,
जो छिपा हुआ अवगुंठन में ,
अपनी ओर खींचता मुझको |
मन पंछी उड़ना चाह रहा ,
पंखों को अपने तोल रहा ,
तेरी एक झलक पाने के लिये ,
मन का पिंजरा छोड़ रहा |
आशा
20 जून, 2010
क्या तुम मेरी बैसाखी बनोगी
भावुकता से भरा हुआ मैं ,
अपनी सुधबुध खो बैठा ,
आगा पीछा कुछ न देखा ,
जीवन संग्राम में कूद पड़ा ,
मेरे आहत मन की पीड़ा की ,
क्या तुम गवाह बन पाओगी ,
मेरी उखड़ी साँसों का ,
कैसे हिसाब रख पाओगी |
जीवन का सफर काँटों से भरा है ,
यह मैं अब जान पाया ,
समस्याओं से जब जूझा ,
तभी उन्हें पहचान पाया |
कठिन डगर पर चलते-चलते ,
कई बार गिरा, गिर कर सम्हला ,
जब से तुम्हारा साथ मिला ,
मैं बहुत कुछ सोच पाया |
जब कभी मैं याद करूँगा ,
क्या तुम मेरी बैसाखी बनोगी ,
ऊँची नीची पगडंडी पर ,
क्या तुम मेरे साथ चलोगी ?
आशा
अपनी सुधबुध खो बैठा ,
आगा पीछा कुछ न देखा ,
जीवन संग्राम में कूद पड़ा ,
मेरे आहत मन की पीड़ा की ,
क्या तुम गवाह बन पाओगी ,
मेरी उखड़ी साँसों का ,
कैसे हिसाब रख पाओगी |
जीवन का सफर काँटों से भरा है ,
यह मैं अब जान पाया ,
समस्याओं से जब जूझा ,
तभी उन्हें पहचान पाया |
कठिन डगर पर चलते-चलते ,
कई बार गिरा, गिर कर सम्हला ,
जब से तुम्हारा साथ मिला ,
मैं बहुत कुछ सोच पाया |
जब कभी मैं याद करूँगा ,
क्या तुम मेरी बैसाखी बनोगी ,
ऊँची नीची पगडंडी पर ,
क्या तुम मेरे साथ चलोगी ?
आशा
शेर
इस सुरमई शाम में ,
दिल में, महफिल सजाये बैठा हूँ ,
कोई आये या न आये ,
शमा जलाये बैठा हूँ ,
तुम तो ज़रूर आओगी ,
यह आस लगाये बैठा हूँ |
आशा
दिल में, महफिल सजाये बैठा हूँ ,
कोई आये या न आये ,
शमा जलाये बैठा हूँ ,
तुम तो ज़रूर आओगी ,
यह आस लगाये बैठा हूँ |
आशा
19 जून, 2010
जीवन मेरा
जाने कितने सपनों से
अपनी रातों को सजाया मैंने
जब उनकी सच्चाई जानी
एक भी आँसू न बहाया मैंने
हर आँसू है मोती जैसा
उसका मोल नहीं भूली
अनमोल मोतियों की माला से
अपना गला न सजाया मैंने
सारा वैभव छोड़ दिया
जब धरातल पर पैर रखे
सहज भाव से सारे रिश्तों को
जी जान से निभाया मैंने
जीवन के अंतिम पड़ाव पर
जब भी सोचा दुःख पाया
जाने क्या खोया क्या पाया
अवसाद ने सिर उठाया
सपनों का मोल भी समझाया
तब आँखों से गिरा एक मोती भी
बहुत अनमोल नजर आया |
आशा
18 जून, 2010
लद्दाख
पिछले साल गर्मियों में लद्दाख जाने का मन बनाया |जम्मू से सुबह ८ बजे की फ्लाईट थी |जब हम एअर पोर्ट पहुंचे
कुछ मजदूर बड़ी बड़ी पोटलियां लिए हुए बैठे थे |अधिक ताज्जुब तो तब हुआ जब वे लोग भी हमारे साथ हवाईजहाज में लद्दाख जाने के लिए चढे |ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी लोकल बस में सफर कर रहे हों |कुछ ने तो अपनी गठरी भी अपने ही साथ रख ली थीं |
हवाईजहाज बहुत छोटा था |अब हम रन वे से ऊपर आसमान मे थे |खिड़की से बाहर का दृश्य बहुत ही सुंदर दिख रहा था |बादलों पर पड़ती सूर्य की किरणे,बर्फ से ढके पहाड़ किसी परी के देश की सैर का मजा दे रहे थे |
लगभग एक घंटे बाद हम लेह हवाई अड्डे पर थे | कम दबाव वाले वायु मंडल से सामंजस्य स्थापित करने के लिए
(acclimatization )कुछ समय रुकने के बाद होटल की ओर रवाना हुए |होटल बहुत साफ सुथरा था |पर कमरे में न तो कोई पंखा था न ही ऐ.सी .|जून का महीना था पर ठण्ड ऐसी थी कि दांत कट कटाने लगे|
वहाँ जितने भी लोग ठहरे थे लगभग सभी विदेशी थे |कुछ यूरोपियन्स से बात हुई |वे भी हम से मिल कर बहुत खुश हुए| काफी देर तक लद्दाख की चर्चा होती रही |उन लोगों के घूमने की व खाने की अलग से ब्यवस्था थी |
सुबह नाश्ते के बाद कमरे के सामने गेलरी में जा बैठे |वहां धूप थी |धूप इतनी तेज थी कि बदन जलने लगा और छांव में कपकपा देने वाली ठण्ड |बड़ा अजीब सा अहसास हुआ |होटल मालिक ने इनर लाइन परमिट और घूमने के लिए टाटा
सूमो की ब्यवस्था करवा दी थी |
सुबह होते ही लेह के jokhang &Spitak बौद्ध गोम्फा देखने के लिए चल दिए |स्पितक बौद्ध गोम्फा एक पहाड़ी पर होने के कारण चढ़ते समय कुछ अधिक समय लगा | वहां भगवान बुद्ध की एक बहुत विशाल प्रतिमा देखी |इतनी सुंदर प्रतिमा थी
कि उस पर से नजर ही नहीं हटती थी |उसी परिसर में देवी तारा और उनके २३ अवतारों के भी दर्शन किये |वहां का रख रखाव करने वाले एक बौद्ध से कई बातें जानने को मिलीं |जब हमने उसे कुछ देना चाहा उसने लेने से इंकार कर दिया |हमने दान पेटी में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये ,और सिंधु उदगम स्थल जाने के लिए नीचे उतरे |
सिंधु नदी का उदगम स्थल देखना भी एक बहुत मन मोहक सपना सा था |वहां पर नदी बहुत तीब्र गति से बहती है |
नदी पर बने पुल पर खड़े हो कर आसपास का नज़ारा देखना बहुत सुंदर अनुभव था |पुल पर असंख्य पताकाएं बंधी हुईं थीं |
पूछने पर ड्राइवर ने बताया कि जब कोई मानता की जाती है तब लोग कपड़ों पर लिख कर उन पताकाओं को वहां बांध जाते है |
और जब मानता पूरी हो जाती है ,उनको खोल कर नदी में प्रवाहित कर देते है |रास्ते में एक हरे घास के मैदान में " याक और जो" को चरते देख हमने ड्राइवर से उनकी जानकारी ली |उसने बताया कि याक का उपयोग परिवहन के लिए किया जाता है तथा जो को दूध के लिए पाला जाता है |"जो" एक cross -breed चौपाया है |लौटते समय नाम्बियार राजा का ९मंजिला महल भी देखा | उसका रख रखाव बहुत अच्छे ढंग से किया गया है |शाम होते होते हम अपने आज के अंतिम पड़ाव शांती स्तूप पर थे | ऊपर से लेह का दृश्य बहुत सुंदर लग रहा था |जब हम वापस लौट रहे थे रास्ते में मिलने वाले कुछ लोगों ने"जुले" कह कर अभिवादन किया ,ड्राइवर ने बताया कि यहाँ पर अभिवादन के लिए जुले कहा जाता है | हमने भी नमस्ते की जगह लोगों का अभिवादन जुले कह कर किया |
अगले दिन सुबह नुब्रा घाटी जाने के लिए तैयार हुए |हमारे साथ चार अन्य यात्री भी थे उनमें से तीन बोम्बे से आई हुई
शिक्षिकाएं थीं और एक तमिल सज्जन थे |जैस जैसे आगे बढने लगे अपने को चारों ओर से बर्फ के पहाड़ों से घिरा हुआ पाया |
हरियाली का दूर दूर तक नामोंनिशान नहीं था |इसी लिए तो लद्दाख को बर्फ का रेगिस्तान कहा जाता है |
कुछ समय बाद हम दुनिया की highest motorable road पर से गुजर रहे थे |सड़क की कुल ऊंचाई १८300 फीट
है |इसे खारडुंग-ळा के नाम से जाना जाता है |एक तरफ ऊंची बर्फ से ढकी पहाड़ी और सड़क के दूसरी ओर बर्फ से ढकी खाई |यहां तक कि सडक पर भी हल्की सी बर्फ की परत थी |जगह जगह मिलिट्री की चौकियां बनी हुई थीं |
मिलिट्री के लोगों का ब्यवहार बहुत आत्मीयता से भरा हुआ था |मन उनके प्रति श्रद्धा से भर गया |
एकाएक हमारी गाड़ी पीछे की ओर स्किट होने लगी |ड्राइवर जल्दी से नीचे उतरा और पहियों पर रोक लगाई |सावधानी से हमारे साथ के लोग भी उतरे |तमिल राम स्वामी तो फिसल ही गए ,और बर्फ की दीवार से टिक कर खड़े हो गये |
पीछे से एक मिलिट्री की जीप आरही थी |उसकी मदद से सड़क पार कर पाए और खाई में गिरते गिरते बचे |एक बहुत बड़ा
हादसा होते होते बचा |
जब नुब्रा घाटी पहुचे दिन के १२ बज रहे थे |दो नदियों शायोक और नुब्रा की छोटी छोटी सी धाराओं से बनी यह घाटी
बहुत हरी भरी है |वहां का बौद्ध गोम्फा और मंदिर देखे |फिर एह फार्म हाउस पर दो कुब्ब वाला ऊँट भी देखा |क्यों कि
शाम हो गई थी, हम एक विश्राम गृह में रुक गए |वहां दो भाई बहन उस विश्रामगृह की देख रेख करते थे |वे इतने स्नेह से मिले कि घर सा लगने लगा |रात को हमारे साथ के लोगों ने वहां के लोकल पेय "छंग" का भी रसास्वादन किया |
अगले दिन सुबह होते ही लेह के लिए यात्रा शुरू की |थकान इतनी होगई थी कि सारे दिन होटल में आराम किया |
शाम को वहां के छोटे से मार्केट में कुछ खरीदारी की |उस समय एक बहुत बड़ा बौद्ध लोगों का जुलुस भी देखा |
फिर सुबह होते ही Pangong lake जाने के लिए जीप में सबार हुए |सोचा कुछ खाने के लिए ले लिया जाए |एक होटल पर बन रहे पराठों को पेक करवा लिया| यह रास्ता बहुत ऊबड़ खाबड़ होने के कारण रास्ते में बहुत कठिनाई हुई |जाते समय सेनडूल्स भी देखने को मिले |पर जब झील पर पहुंचे ,सारी थकान चारों ओर बर्फ से ढंकी पहाड़ियों से घिरी झील देख कर एक दम तिरोहित हो गई |इस झील कि लम्बाई १३० किलोमीटर है |अघिकांश भाग चींन के अधिकार में है तथा शेष भाग भारत में है|यह १४००० फीट की ऊंचाई पर स्थित है |इतना साफ पानी इससे पहले कभी न देखा था |कचरे का तो नामो निशान तक नहीं था |सच पृथ्वी पर स्वर्ग नजर आ गया | वहां बने बंकरों में मिलिट्री के लोग सुरक्षा हेतु रहते है |
बादल घिर आए थे अतः लेह लौटना ही उचित समझा |समयाभाव के कारण चुम्बकीय घाटी नहीं जा पाए |जब कोई वाहन इससे से गुजरता है ,वाहन की गति अपने ही आप धीमी हो जाती है | मौसम खराब होने के कारण उस दिन की फ्लाईट रद्द हो गई थी |कुछ लोग तो सड़क मार्ग से कारगिल होते हुए श्री नगर चले गऐ |पर हम दूसरे दिन अपनी फ्लाईट का इंतजार करते रहे |हमारी फ्लाईट तीन घंटे लेट थी |एरोड्रम पर समय काटने के लिए लोगों से बातें करने लगे |
बातों ही बातों में बहुत सी और जानकारियाँ मिलीं |जुलाई माह में सिन्धु महोत्सव में वहां के लोग अपनी अपनीं पारंपरिक
वेश भूषा में आते हैं और उस समय वहां तरह तरह के सांस्कृतिक आयोजन और खेल होते हैं |लद्दाख के प्रत्येक गांव में पोलो खेला जाता है पर हर जगह अपने अपने नियम होते हैं|हमने उनलोगों से "जुले" कह कर अभिवादन किया और कुछ समय बाद हम अपने २ गंतव्य की ओर चल दिए |उस यात्रा में बहुत अच्छा लगा |सोचती हूं एक बार वहां जाने का
और प्लान बना लें तो कितना अच्छा हो |
आशा
कुछ मजदूर बड़ी बड़ी पोटलियां लिए हुए बैठे थे |अधिक ताज्जुब तो तब हुआ जब वे लोग भी हमारे साथ हवाईजहाज में लद्दाख जाने के लिए चढे |ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी लोकल बस में सफर कर रहे हों |कुछ ने तो अपनी गठरी भी अपने ही साथ रख ली थीं |
हवाईजहाज बहुत छोटा था |अब हम रन वे से ऊपर आसमान मे थे |खिड़की से बाहर का दृश्य बहुत ही सुंदर दिख रहा था |बादलों पर पड़ती सूर्य की किरणे,बर्फ से ढके पहाड़ किसी परी के देश की सैर का मजा दे रहे थे |
लगभग एक घंटे बाद हम लेह हवाई अड्डे पर थे | कम दबाव वाले वायु मंडल से सामंजस्य स्थापित करने के लिए
(acclimatization )कुछ समय रुकने के बाद होटल की ओर रवाना हुए |होटल बहुत साफ सुथरा था |पर कमरे में न तो कोई पंखा था न ही ऐ.सी .|जून का महीना था पर ठण्ड ऐसी थी कि दांत कट कटाने लगे|
वहाँ जितने भी लोग ठहरे थे लगभग सभी विदेशी थे |कुछ यूरोपियन्स से बात हुई |वे भी हम से मिल कर बहुत खुश हुए| काफी देर तक लद्दाख की चर्चा होती रही |उन लोगों के घूमने की व खाने की अलग से ब्यवस्था थी |
सुबह नाश्ते के बाद कमरे के सामने गेलरी में जा बैठे |वहां धूप थी |धूप इतनी तेज थी कि बदन जलने लगा और छांव में कपकपा देने वाली ठण्ड |बड़ा अजीब सा अहसास हुआ |होटल मालिक ने इनर लाइन परमिट और घूमने के लिए टाटा
सूमो की ब्यवस्था करवा दी थी |
सुबह होते ही लेह के jokhang &Spitak बौद्ध गोम्फा देखने के लिए चल दिए |स्पितक बौद्ध गोम्फा एक पहाड़ी पर होने के कारण चढ़ते समय कुछ अधिक समय लगा | वहां भगवान बुद्ध की एक बहुत विशाल प्रतिमा देखी |इतनी सुंदर प्रतिमा थी
कि उस पर से नजर ही नहीं हटती थी |उसी परिसर में देवी तारा और उनके २३ अवतारों के भी दर्शन किये |वहां का रख रखाव करने वाले एक बौद्ध से कई बातें जानने को मिलीं |जब हमने उसे कुछ देना चाहा उसने लेने से इंकार कर दिया |हमने दान पेटी में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये ,और सिंधु उदगम स्थल जाने के लिए नीचे उतरे |
सिंधु नदी का उदगम स्थल देखना भी एक बहुत मन मोहक सपना सा था |वहां पर नदी बहुत तीब्र गति से बहती है |
नदी पर बने पुल पर खड़े हो कर आसपास का नज़ारा देखना बहुत सुंदर अनुभव था |पुल पर असंख्य पताकाएं बंधी हुईं थीं |
पूछने पर ड्राइवर ने बताया कि जब कोई मानता की जाती है तब लोग कपड़ों पर लिख कर उन पताकाओं को वहां बांध जाते है |
और जब मानता पूरी हो जाती है ,उनको खोल कर नदी में प्रवाहित कर देते है |रास्ते में एक हरे घास के मैदान में " याक और जो" को चरते देख हमने ड्राइवर से उनकी जानकारी ली |उसने बताया कि याक का उपयोग परिवहन के लिए किया जाता है तथा जो को दूध के लिए पाला जाता है |"जो" एक cross -breed चौपाया है |लौटते समय नाम्बियार राजा का ९मंजिला महल भी देखा | उसका रख रखाव बहुत अच्छे ढंग से किया गया है |शाम होते होते हम अपने आज के अंतिम पड़ाव शांती स्तूप पर थे | ऊपर से लेह का दृश्य बहुत सुंदर लग रहा था |जब हम वापस लौट रहे थे रास्ते में मिलने वाले कुछ लोगों ने"जुले" कह कर अभिवादन किया ,ड्राइवर ने बताया कि यहाँ पर अभिवादन के लिए जुले कहा जाता है | हमने भी नमस्ते की जगह लोगों का अभिवादन जुले कह कर किया |
अगले दिन सुबह नुब्रा घाटी जाने के लिए तैयार हुए |हमारे साथ चार अन्य यात्री भी थे उनमें से तीन बोम्बे से आई हुई
शिक्षिकाएं थीं और एक तमिल सज्जन थे |जैस जैसे आगे बढने लगे अपने को चारों ओर से बर्फ के पहाड़ों से घिरा हुआ पाया |
हरियाली का दूर दूर तक नामोंनिशान नहीं था |इसी लिए तो लद्दाख को बर्फ का रेगिस्तान कहा जाता है |
कुछ समय बाद हम दुनिया की highest motorable road पर से गुजर रहे थे |सड़क की कुल ऊंचाई १८300 फीट
है |इसे खारडुंग-ळा के नाम से जाना जाता है |एक तरफ ऊंची बर्फ से ढकी पहाड़ी और सड़क के दूसरी ओर बर्फ से ढकी खाई |यहां तक कि सडक पर भी हल्की सी बर्फ की परत थी |जगह जगह मिलिट्री की चौकियां बनी हुई थीं |
मिलिट्री के लोगों का ब्यवहार बहुत आत्मीयता से भरा हुआ था |मन उनके प्रति श्रद्धा से भर गया |
एकाएक हमारी गाड़ी पीछे की ओर स्किट होने लगी |ड्राइवर जल्दी से नीचे उतरा और पहियों पर रोक लगाई |सावधानी से हमारे साथ के लोग भी उतरे |तमिल राम स्वामी तो फिसल ही गए ,और बर्फ की दीवार से टिक कर खड़े हो गये |
पीछे से एक मिलिट्री की जीप आरही थी |उसकी मदद से सड़क पार कर पाए और खाई में गिरते गिरते बचे |एक बहुत बड़ा
हादसा होते होते बचा |
जब नुब्रा घाटी पहुचे दिन के १२ बज रहे थे |दो नदियों शायोक और नुब्रा की छोटी छोटी सी धाराओं से बनी यह घाटी
बहुत हरी भरी है |वहां का बौद्ध गोम्फा और मंदिर देखे |फिर एह फार्म हाउस पर दो कुब्ब वाला ऊँट भी देखा |क्यों कि
शाम हो गई थी, हम एक विश्राम गृह में रुक गए |वहां दो भाई बहन उस विश्रामगृह की देख रेख करते थे |वे इतने स्नेह से मिले कि घर सा लगने लगा |रात को हमारे साथ के लोगों ने वहां के लोकल पेय "छंग" का भी रसास्वादन किया |
अगले दिन सुबह होते ही लेह के लिए यात्रा शुरू की |थकान इतनी होगई थी कि सारे दिन होटल में आराम किया |
शाम को वहां के छोटे से मार्केट में कुछ खरीदारी की |उस समय एक बहुत बड़ा बौद्ध लोगों का जुलुस भी देखा |
फिर सुबह होते ही Pangong lake जाने के लिए जीप में सबार हुए |सोचा कुछ खाने के लिए ले लिया जाए |एक होटल पर बन रहे पराठों को पेक करवा लिया| यह रास्ता बहुत ऊबड़ खाबड़ होने के कारण रास्ते में बहुत कठिनाई हुई |जाते समय सेनडूल्स भी देखने को मिले |पर जब झील पर पहुंचे ,सारी थकान चारों ओर बर्फ से ढंकी पहाड़ियों से घिरी झील देख कर एक दम तिरोहित हो गई |इस झील कि लम्बाई १३० किलोमीटर है |अघिकांश भाग चींन के अधिकार में है तथा शेष भाग भारत में है|यह १४००० फीट की ऊंचाई पर स्थित है |इतना साफ पानी इससे पहले कभी न देखा था |कचरे का तो नामो निशान तक नहीं था |सच पृथ्वी पर स्वर्ग नजर आ गया | वहां बने बंकरों में मिलिट्री के लोग सुरक्षा हेतु रहते है |
बादल घिर आए थे अतः लेह लौटना ही उचित समझा |समयाभाव के कारण चुम्बकीय घाटी नहीं जा पाए |जब कोई वाहन इससे से गुजरता है ,वाहन की गति अपने ही आप धीमी हो जाती है | मौसम खराब होने के कारण उस दिन की फ्लाईट रद्द हो गई थी |कुछ लोग तो सड़क मार्ग से कारगिल होते हुए श्री नगर चले गऐ |पर हम दूसरे दिन अपनी फ्लाईट का इंतजार करते रहे |हमारी फ्लाईट तीन घंटे लेट थी |एरोड्रम पर समय काटने के लिए लोगों से बातें करने लगे |
बातों ही बातों में बहुत सी और जानकारियाँ मिलीं |जुलाई माह में सिन्धु महोत्सव में वहां के लोग अपनी अपनीं पारंपरिक
वेश भूषा में आते हैं और उस समय वहां तरह तरह के सांस्कृतिक आयोजन और खेल होते हैं |लद्दाख के प्रत्येक गांव में पोलो खेला जाता है पर हर जगह अपने अपने नियम होते हैं|हमने उनलोगों से "जुले" कह कर अभिवादन किया और कुछ समय बाद हम अपने २ गंतव्य की ओर चल दिए |उस यात्रा में बहुत अच्छा लगा |सोचती हूं एक बार वहां जाने का
और प्लान बना लें तो कितना अच्छा हो |
आशा
17 जून, 2010
मेरी चाहत
समझदार हूँ
अपना अस्तित्व है मेरा
मेरी सोच सबसे जुदा
यह भी कोई खता नहीं
बदलाव समाज में चाहूँ
अपने ढंग से रहना चाहूँ
ना मैं हूँ मोम की गुड़िया
ना ही भेड़ बकरी
हूँ देन आज के युग की
मेरे भी हैं अपने सपने
उनको पूरा करना चाहूँ
ऐरे गैरे चाहे जैसे से
विवाह मैं न कर पाऊँगी
दान दहेज के दानव से
खुद को दूर रखना चाहूँगी
मन चाहा रिश्ता जब होगा
तभी उसे स्वीकार करूँगी |
बड़ा परिवार ढेर से बंधन
हर समय दबाने की चाहत
बात-बात पर रोका टोकी
यह मुझे स्वीकार न होगी
मन को सब से दूर करेगी
सास ननद के ताने सुनना
घुटन भरे माहौल में रहना
हर पल मर-मर कर जीना
है मेरी फितरत नहीं
यह सब मैं सह न सकूँगी
सहज भाव से जी न सकूँगी
ठेस यदि मन को पहुँची
सब के साथ रह न सकूँगी
पहले भी अकेले रही
अब भी मैं स्वतंत्र रहूँगी |
यदि मेरा पढ़ना लिखना
उनको नहीं सुहाता है
पर मेरा है जीवन वही
उससे गहरा नाता है
ऐसे विचार रखने वालों से
ताल मेल न हो पायेगा
उन्नति मार्ग अवरुद्ध होगा
जीवन नर्क हो जायेगा
हूँ आज की नारी
अपनी अस्मिता मिटने न दूँगी
जाग्रत हूँ जाग्रत ही रहूँगी |
आशा
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