09 अगस्त, 2010

क्यूँ इस ताबूत में

क्यूँ इस ताबूत में ,
खुद को सुलाना चाहते हो ,
उसमे आख़िरी कील ,
ठुकवाना चाहते हो ,
ना ही आत्ममंथन किया ,
आत्म विशलेषण भी न किया ,
यह भी कभी न सोचा ,
कहाँ से कहाँ निकल गए हो ,
सही राह से भटक गए हो ,
मधुशाला की ओर मुड़े क्यूँ ,
आकंठ मदिरा में डूबे रहते हो ,
क्या सन्देश सब को देते हो ,
ऐसा क्या हुआ है ज़रा सोचो ,
अंदर ही अंदर घुटते रहते हो ,
माना मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती ,
पर मित्र भाव तो रखती हूं ,
मैने कई घरों को,
टूटते उजड़ते देखा है ,
क्यूँ बर्बादी को चुन रहे हो ,
अन्धकार में घिर रहे हो ,
इसी तरह विचलित रहे ,
अपने को सम्हाल नहीं पाए ,
फिर बापिस आना मुश्किल होगा ,
और किसी की मत सोचो ,
पर खुद का तो ख्याल करो ,
आत्म नियंत्रण नहीं किया तो ,
पंक में धसते जाओगे ,
जागो और सोचो ,
जीवन का सत्कार करो ,
आगे अभी बहुत चलना है ,
सही राह की तलाश करो |
आशा

08 अगस्त, 2010

हे जल निधि तुमसे है विनती मेरी

वर्षा ऋतु में जब भी ,
दृष्टि पड़ी अम्बर पर ,
कभी छितरे छितरे ,
कभी बिखरते बादलों को ,
तो कभी काली घनघोर घटाओं को ,
यहाँ वहां विचरते देखा ,
कई बार जल से ओत प्रोत ,
लगता जैसे अभी बरसेगे ,
पर चुपके से हवा के संग ,
जाने कहाँ निकल जाते |
धरती प्यासी ही रह जाती ,
जल के लिये तरस जाती ,
जो व्यथित होते उसके लिए ,
तलाश में जल की ,
इधर उधर निकल जाते |
पर जब बादल ,
उमढ़ घुमड़ कर आते ,
अत्यधिक वर्षा कर जाते ,
जन जीवन अस्त व्यस्त कर जाते |
यह अल्हड़पन और मनमानी ,
क्या नहीं वारिद की नादानी |
हे जळ निधि तुमसे यह विनती है मेरी ,
मेरी बात समझ लेना ,
जब भाप बने बादल उठें ,
और आगे बढ़ना चाहें|
उनसे कहना मनमानी शोभा नहीं देती ,
इधर उधर व्यर्थ ना घूमें
पहले से जान लें ,
कहाँ कितना बरसना है ,
धरती को हराभरा करना है |
हवा जो साथ ले जाती उन्हें ,
उसको भी समझा देना ,
उन्हें स्वतंत्र नहीं छोड़े ,
धीमे धीमे साथ चले ,
गति उनकी तेज न होने दे ,
गर्जन तर्जन से यदि वे,
डराना धमकाना चाहें ,
भयाक्रांत ना हो जाए ,
मनमानी उन्हें न करने दे ,
ना ही साथ कभी छोड़े |
ओ महासागर है अनुग्रह तुमसे,
तुम्ही ध्यान ज़रा दे लेना ,
अवर्षा या अधिक वर्षा ,
कहीं भी न होने देना ,
मन चले बादलों को ,
ठीक से समझा देना |
आशा

07 अगस्त, 2010

सलाखों के पीछे से ,

जेल की कोठरी में
सलाखों के पीछे से
सींकचों को थामे
सूनी सूनी आँखों से
वह ताक रहा था कहीं शून्य में
था उदास थका हुआ सा
झाँक रहा था अपने मन में
बार बार वह दृश्य भयावह
उसके समक्ष आ जाता था
सिहरन सी होती थी मन में
मन को कचोटती थीं बातें
एक बड़ी भूल की थी उसने
जो साथ दिया ऐसे लोगों का
वे तो बच कर निकल गए
ह्त्या के आरोप में
उसे फंसा कर चले गए
वह तो केवल वहाँ खड़ा था
बीच बचाव कर रहा था
फिर क्यूँ किसी का साथ पा न सका
बाहर जेल के आ न सका
पत्नी भी भयभीत बहुत थी
हिचकी भर भर रोती थी
बच्चे बाहर जा नहीँ सकते
क्यूँ कि वे कहलाते हत्यारे के बच्चे 
जाने कब तक केस चलेगा
क्या ईश्वर भी रक्षा न करेगा
अब तो घुट घुट कर मरना है
अन्य कैदियों की हरकतों से
रोज ही दो चार होना है
कुछ कैदी शांत रहते हैं
पर कुछ असयंत व्यवहार करते हैं
जब भी कोर्ट जाना पड़ता है
नफरत से लोग देखते हैं
सब देख बहुत बैचेनी होती है
वकीलों के चक्कर काट काट
सर से छत भी छिन गई है
अब पत्नि और बच्चे रहते हें
एक किराए की झोंपड़ी में
समाज सेवा का भूत
उतर गया है अब सर से
एक ही बात याद आती है
ना हो साथ ऐसे लोगों का
जो समाज सेवा का दम तो भरते हैं
पर मन में कपट रखते हैं
अपना मतलब हल करने के लिए
चाहे जिसे फँसा सकते हैं
किसी भी हद तक जा सकते हैं |
आशा







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06 अगस्त, 2010

जाने कितनी यादों को

जाने कितनी यादों को,
अपने दिल के आंगन में ,
सजा रखा है ,
जब तुम छोटी सी परी थीं ,
प्रथम कदम उठाया था ,
आगे बढ़ना चाहा था ,
अपने नन्हें हाथों से तुमने ,
मेरी उंगली थामी थी ,
हल्का सा भय लिए हंसी थी ,
तुम्हारे भोले आनन पर ,
वह आज भी मैं भूली नहीं हूं ,
सतरंगा फ्राक पहनकर ,
जब तुमने कहा था नाच दिखाऊं ,
गोल गोल घूम घूम कर ,
एक उंगली ऊपर करके ,
अनोखे अंदाज में,
नाच दिखाया था ,
आज भी जब सोचती हूं ,
तुम्हारी वह भोली सूरत ,
पर नयनों में छिपी शरारत ,
मेरी आँखों में घूम जाती है ,
दिल के आँगन में ,
तुम और तुम्हारी छाया ,
दूर दूर तक फैल जाती है ,
वह प्यारा सा भोला बचपन ,
अब जाने कहाँ छूट गया है ,
बहुत बड़ी हो गई हो ,
जटिल समस्याओं में उलझी हो ,
फिर भी जब तुम्हें देखती हूं ,
आज भी तुममें ,
छोटी सी गुड़िया नजर आती है ,
जो नाचती है गाती है ,
बड़ी बड़ी आँखों से अपनी ,
प्यार ढेर सा छलका जाती है ,
मीठी अटपटी भाषा में,
जाने क्या कहना चाहती है ,
मैं उसे महसूस करती हूं ,
दिल की बगिया में सजा लेती हूं |
आशा

05 अगस्त, 2010

मेरी कृतियों को साथ ले जाना

तुम जाना चाहती हो चली जाना ,
पर मेरी कृतियों को ,
साथ ले जाना .
जो लिखी तो मैंनें हैं ,
पर उनकी आत्मा तुम्ही हो ,
मेंने तो कुछ शब्द चुने हैं ,
पर प्रेरणा स्त्रोत तुम्ही हो ,
मैं तो मात्र प्यार में डूबा था ,
तुम में खोया रहता था ,
मैं अभी तक समझ नहीं पाया ,
तुम जाने क्या समझ बैठीं ,
अपने आत्मीय रिश्तों को ,
तुम कैसे तोड़ पाओगी ,
इन आंसुओं के उफान पर,
कैसे काबू कर पाओगी ,
जाना चाहती हो जाओ ,
पर कारण तो बताती जाओ ,
मैं तुम्हें कहाँ खोजूंगा ,
चाहे जहां कहाँ भटकूंगा ,
अपने खाली पन के बोझ तले ,
इतना अधिक दब जाउंगा ,
न ही कोई कविता बनेगी ,
ना ही उस पर बहस होगी ,
कभी तो मुझे याद करना ,
मेरी मूक मोहब्बत पर ,
थोड़ा तो विश्वास करना ,
ज़रा सा कभी विचार करना ,
मेरी थाथी को ,
बहुत सम्हाल कर ले जाना ,
असमय की वर्षा में कहीं ,
सब समाप्त न हो जाए ,
या कहीं न बह जाए ,
तुमतो मेरी कविता हो ,
तुमसे ही है जीवन मेरा ,
मैं केवल तुम्हारा हूं ,
सदा तुम्हारा ही रहूँगा ,
जब चाहो चली आना ,
मैं तुम्हारा इन्तजार करूंगा |
आशा

03 अगस्त, 2010

अब तक जो कुछ भी लिखा था

अब तक जो कुछ भी लिखा था ,
था केवल आत्म संतुष्टि के लिए ,
पर अब इन कागजों के हाशियों पर ,
कई हस्ताक्षर करवाना चाहती हूं ,
आखिर ऐसा क्या लिखा है ,
जो इतने सारे पाठक हैं ,
पर सभी प्रशंसक ही नहीं हैं ,
कई आलोचक सामने हैं ,
जिनकी टिप्पणियों से ,
विचारों को बल मिलता है ,
कई विचार परिमार्जित होते हैं ,
कई परिष्कृत होते हैं ,
जब वे पल्लवित होते हैं ,
उनमें और निखार आता है ,
मैं चाहती हूं कुछ अनुभव बांटूं ,
कुछ मैं कहूँ कुछ औरों की सुनूं ,
उन पर और मनन करूं ,
अपने लेखन की त्रुटियों को,
मैं दूर करना चाहती हूं ,
कभी यह भी विचार आता है ,
यदि मैं कुछ कर न सकी ,
यह जीवन व्यर्थ न चला जाए |
आशा

01 अगस्त, 2010

इतनी दूर चली गई हो


इतनी दूर चली गई हो
कैसे अपने पास बुलाऊं
आवाज तुम्हें दी जब भी
तुम तक पहुंच नहीं पाई
 पास तुम्हारे आना चाहता
पर रास्ता नजर नहीं आता
है एकाकी जीवन मेरा
सपनों में खोया रहता 
यादों में डूबा रहता 
आती हें याद वे मीठी बातें
कभी तकरार कभी झूठे वादे
मन अशांत हो जाता है
बीते कल में खो जाता है
सपनों में भी साथ तुम्हारा
कुछ भी भूलने नहीं देता
बस तुम्ही में खोया रहता
समझाऊं कैसे मन को
नियति का लेखा  है यही 
तुमसे दूर होना ही था
जिन पर अधिकार  चाहता था
वे भी अब अच्छे नहीं लगते
चमक दमक इस दुनिया की
नहीं रिझाती अब मुझको
 विरक्ति भी आती हैमन में
पर जो मेरा अपना था
 उसे कैसे भूल जाऊं
स्मृति पटल पर है जो अंकित 
 कभी मिट नहीं सकता
जगह उसकी कोई ले नहीं सकता
मेरा खालीपन भर नहीं सकता
मेरी जिंदगी का अब
यादें ही हैं  सहारा 
हैं मेरे जीने का बहाना 
आने वाली पीढ़ी
जब भी मेरी कहानी सुनेगी
मुझ जैसों को याद करेगी
अपनी भावनाओं को
एक नया रूप देगी |
आशा

31 जुलाई, 2010

फिर मृत्यु से भय कैसा

होती अजर अमर आत्मा
है स्वतंत्र विचरण उसका
नष्ट कभी नहीं होती
शरीर बनता घर उसका
पर शरीर होता  नश्वर 
जन्म है प्रारम्भ
तो मृत्यु है अंत उसका
अंत तो आना ही है
फिर मृत्यु से भय कैसा
सांसारिकता में लिप्त
मद मत्सर से भरा हुआ वह
वर्तमान में जीता है
पर मृत्यु से डरता है
है हाल बुढापे का ऐसा
चाहे जितनी उम्र हो जाए
जीने का मोह नहीं छूटता
आकांक्षाएं होती अनेक
जितनी भी पूरी की  जाएँ
कुछ शेष रह ही जाती हैं
बल देती जीने की चाहत को
रोग यदि कोई लग जाए
वह हजार इलाज करवाए 
पर मरना नहीं चाहता
आख़िरी सांस तक जीने की आस
आँखें बंद होने नहीं देती
जीने की तमन्ना रहती है
यह सभी जानते हैं
एक दिन तो जाना ही है
पर माया मोह कम नहीं होते
बल देते  जीने के प्रलोभन को
यदाकदा जब सोच बदलता 
अध्यात्म की ओर खींचता 
यदि मन में स्थिरता आ जाए
माया मोह छूट जाता है
तब विश्रान्ति का
वह अनमोल पल आता है
अपार शान्ति छा जाती है
आत्मा स्वतंत्र हो जाती है
फिर मृत्यु से भय कैसा
यह तो एक सच्चाई है |
आशा

30 जुलाई, 2010

है मस्तिष्क बहुत छोटा सा

जाने कितनी घटनाएं होती
गहराई जिनकी
सोचने को बाद्य करती
कोई हल् नजर नहीं आता
पर मन अस्थिर हो जाता
है मस्तिष्क बहुत छोटा सा
कितना बोझ उठाएगा
बहुत यदि सोचा समझा
बोझ तले दब जएगा |
कोई दिन ऐसा नहीं जाता
की सोच को विराम मिले
मस्तिष्क को आराम मिले
जैसे ही पेपर दिखता है
होती है इच्छा पढ़ने की
पर खून खराबा मारधाड़
इससे भरा पूरा अखबार
फूहड़ हास्य या रोना धोना
टी.वी. का भी यही हाल
क्या पढ़ें और क्या देखें
निर्णय बहुत कठिन होता
छोटा सा मस्तिष्क बिचारा
बोझ तले दबता जाता
मंहगाई और भ्रष्ट आचरण
चरम सीमा तक पहुच रहे
आवश्यक सुविधाओ से भी
जाने कितने दूर हुए
नंगे भूखे बच्चे देख
आँखें तो नम होती हैं
कैसे इनकी मदद करें
दुःख बांट नही सकते
कोई हल् निकाल नही सकते
बस सोचते ही रह जाते
बोझ मस्तिष्क पर और बढा लेते
झूठे वादों पर बनी सरकार
उन पर ही टिकी सरकार
नाम जनता का लेकर
लेती उधार विदेशों से
पर सही उपयोग नही होता
कुछ लोग उसे ले जाते हें
गरीब तो पहले ही से
और अधिक पीसते जाते
देख कर हालत उनकी
तरस तो बहुत आता हें
अपने को अक्षम पा
मन और उदास हो जाता है
प्रजातंत्र का यह हाल होगा
पहले कभी सोचा न था
बीता समय यदि लौट आये
तो कितना अच्छा होगा
खुशियाँ पाने के लिए
सभी को प्रयास करना होगा
संकुचित विचार छोड़
आगे को बढ़ना होगा
बोझ मस्तिष्क का
तभी हल्का हो पाएगा
तब वह बेचारा ना होगा |

आशा

29 जुलाई, 2010

मैं क्या चाहती हूं ?

 अपना ब्याह रचाना है ,
यह भली भांति जानती हूं ,
पर मैं कोई गाय नहीं कि ,
किसी भी खूंटे से बांधी जाऊं
ना ही कोई पक्षी हूं ,
जिसे पिंजरे में रखा जाए ,
मैं गूंगी गुड़िया भी नहीं ,
कि चाहे जिसे दे दिया जाए ,
मैं ऐसा सामान नहीं ,
कि बार बार प्रदर्शन हो ,
जिसे घरवालों ने देखा ,
वह मुझे पसंद नहीं आया ,
मैं क्या हूं क्या चाहती हूं ,
यह भी न कोई सोच पाया ,
ना ही कोई ब्यक्तित्व है ,
और ना ही बौद्धिकस्तर ,
ना ही भविष्य सुरक्षित उसका
फिर भी घमंड पुरुष होने का ,
अपना वर्चस्व चाहता है ,
जो उसके कहने में चले,
ऐसी पत्नी चाहता है ,
पर मैं यह सब नहीं चाहती ,
स्वायत्वता है अधिकार मेरा ,
जिसे खोना नहीं चाहती ,
जागृत होते हुए समाज में ,
कुछ योगदान करना चाहती हूं ,
उसमे परिवर्तन चाहती हूं ,
वरमाला मैं तभी डालूंगी ,
यदि उसे अपने योग्य पाऊँगी |

27 जुलाई, 2010

बाढ़

भीषण गर्मी से त्रस्त थे ,
आसार वर्षा के नजर ना आते थे ,
तब पूजा पाठों का दौर चला ,
हवन और अनुष्ठान हुए ,
भविष्य बाणी पंडितों की ,
और सूचनाएं मौसम विभाग की,
सभी लगभग गलत निकलीं ,
पानी की एक बूंद न बरसी ,
जैसे जैसे दिन निकले ,
सूखे के आसार दिखने लगे ,
पर एक दिन अचानक ,
काली घनघोर घटा छाई ,
बादल गरजे ,बिजली चमकी ,
बहुत तेज बारिश आई ,
झड़ी बरसात की ऐसी लगी ,
थमने का नाम न लेती थी ,
मैने जब खिड़की से बाहर झंका ,
कुछ लोगों को टीले पर देखा ,
उत्सुकता जागी मन में ,
छाता थामा ,टीले पहुंचे ,
सब बाढ़ नदी की देख रहे थे .
छोटा पुल पूरा डूब चुका था .
पानी बड़े पुल के भी ऊपर था .
जल स्तर बढ़ता जाता था ,
खतरे का निशान भी,
नजर नहीं आता था ,
नदी पूरे उफान पर थी ,
सारी सीमाएं तोडी पानी ने ,
जब खेतों में प्रवेश किया ,
फिर एक जलजला आया ,
जब निचली बस्ती जल मग्न हुई ,
कोई पेड़ पर बैठा था ,
मचान किसी का आश्रय थी ,
कुछ लोग बच्चों को ले कर ,
सड़क पार करते दिखते थे ,
त्राहि त्राहि मची हुई थी ,
हर ओर भय की चादर पसरी थी ,
जाने कितनी हानि हुई थी ,
कई स्वयंसेवी जुटे हुए थे ,
डूबतों को बचाने में ,
निर्बलों को बाहर लाने में ,
छोटी नौकाओं के सहारे ,
महिलाओं बच्चों को ,निकालने में ,
सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने में ,
शासन ने शाला खुल्बाई ,
निराश्रितों को राहत पहुंचाई ,
पर वह इतनी ना काफी थी ,
ऊंट के मुंह में जीरे सी थी ,
ऐसी कठिन विपरीत स्थिती,
मैने पहले ना देखी थी ,
प्रकृति से छेड़छाड़ का ,
यह तो एक नतीजा है ,
जिसे रोक ना पाए तो ,
ना जाने क्या क्या होगा |
आशा

26 जुलाई, 2010

आई ऋतू वर्षा की

जब छाई काली घटा
रिमझिम रिमझिम जल बरसा
प्यासी धरती तृप्त हुई
जन मानस भी सरसा
चारों ओर हरियाली छाई
दुर्वा झूमी और मुस्काई
मुरझाए पौधे लहराने लगे
झूलों पर पैंग बढाने लगे
रंग बिरंगी तितलियाँ
पौधों पर मंडराने लगीं
फूलों से प्रेम जताने लगीं
छोटी छोटी जल की बूंदें
धीरे धीरे बढनें लगीं
धरती की गोदी भरने लगीं
मोर और पपीहे के स्वर
वन उपवन में गूँज रहे
हर्ष से भरे हुए वे
वर्षा का स्वागत कर रहे
 सौंधी खुशबू मिट्टी की
मन प्रफुल्लित हो रहा
बहुत आशा से किसान
यह कंचन वर्षा देख रहा
अच्छी फसल की आशा में
अनेकों सपने सजा रहा
नदी तलाब और झरने
वर्षा का जल सहेज रहे
कल कल करती नदियाँ झरने
और आस पास की हरियाली
है  रंगीन समा ऐसा
जी करता है जल में भीगूँ
प्रकृति की गोद में
हल्के ठंडे मौसम में
आँखें अपनी बंद कर लूं
अनुपम दृश्यों को
अपने मन में भर लूँ|

आशा

25 जुलाई, 2010

ओस की एक बूंद


अरुणिमा से भरे नीले आकाश तले
हर श्रृंगार के पत्ते पर
नाचती ,थिरकती
एक चंचल चपला सी
या नन्हीं कलिका के सम्पुट सी
दिखती ओस की एक बूंद |
कभी लगती
एक महनत कश इंसान के
श्रम कण सी ,
कभी मां के माथे पर आए स्वेद सी
या किसी सुकुमारी के
मुंह पर ठहरे जल कण सी
सच्चाई हर कण में उसके
शुद्धता संचित पूंजी उसकी |
आदित्य की प्रथम किरण
जैसे ही पड़ती उस पर
लजा कर झुका लेती आँखें
छुईमुई सी सकुचा कर
जाने कहां छुप जाती है ,
वह नन्ही सी
ओस की एक बूंद
पत्ते पर भी,
अलग थलग सी रहती
पर अस्तित्व अपना
मिटने भी नहीं देती
है छोटी सी उम्र उसकी
पर जिंदगी अनमोल उसकी |
आशा

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24 जुलाई, 2010

ममता

 कभी सोचा न था
इतनी ममता की हकदार हूं मैं
पार्क में एक अबोध बालक
मेरे बहुत पास आया
पहले मेरी साड़ी पकड़ी
फिर धीरे से उंगली थामी
मुझे ध्यान से देख रहा था
अपनी ओर खींच रहा था
मुझमे भी उत्सुकता जागी
पकड़ा हाथ साथ चल दी
वह डगमग डगमग चलता था
पर जैसे ही भय लगता 
पकड़ उंगली की
और मजबूत करता था
मैं अनजाने मित्र के साथ
खिचती चली गई
गंतव्य तक जब पहुंची
 कुत्ते के बच्चे खेल रहे थे
जैसे ही पिल्लों को देखा
ताली बजाई ,खुशी से उछला
जब पिल्लै ने पूँछ हिलाई
 औरअधिक  पास आया
भयभीत हुआ ,गोद में आया
पिल्लै भी कुछ कम न थे
पैरों पर पंजा मार रहे थे
वे भी खेलना चाहते थे
उसे छूना चाहते थे
जब मम्मी की आवाज सुनी
उतर गोद से मुस्काया
 जाने को बेचैन हुआ
मम्मी की उंगली थामी
और साथ चल दिया
मैं  अकेली खाली बेंच पर बैठी थी
सामने बृक्ष पर बैठी चिड़िया
चूजों को दाना खिला रही थी
इतने में एक कागा आया
आसपास उसके मंडराया
चिड़िया तेजी से उड़ उड़ कर
 करने लगी उसे दूर
पर चिंता एक ही थी
कोई नुक्सान न हो बच्चों को
यह कैसा खेल प्रकृति का
कोई अंत नहीं ममता का |
आशा

22 जुलाई, 2010

तमाशबीन

जन सैलाब उमढ़ता 
जाने किसे देखने को
लोगों को एकत्रित देख
राह चलते रुक जाते लोग 
कुछ और लोग जुड़ जाते है
अक्सर वे यह भी न जानते
भीड़ का कारण क्या है
फिर भी बुत से बने हुए वे
वहीं खड़े रह जाते हैं
फिर सड़क छाप जमावड़े का
पूरा मजा उठाते लोग 
जैसे ही पुलिस देखते हैं
तितर बितर भी हो जाते हैं
यदि कोई दुर्घटना हो
या दुःख का हो कोई अवसर
कुछ ही लोग मदद करते हैं
बाकी तमाशबीन होते हैं
अपने घर चल देते हैं
हर किस्से को बढा चढा कर
जब चटकारे ले कर सुनाते 
वास्तविकता क्या थी
वे यह भी भूल जाते हैं |
आशा

20 जुलाई, 2010

सफर जिंदगी का

जिंदगी बहुत बड़ी है ,
उसमे हताशा कैसी ,
प्यार में सफलता न मिली ,
तो निराशा कैसी ,
मन तो सम्हल ही जाएगा ,
आसान नहीं होता ,
प्यार में मिली असफलता से ,
दो चार होना ,
मन में भर जाता है ,
उदासी और खालीपन ,
तनाव भी घर बनाता है ,
चहरे पर साफ नजर आता है ,
निराशा और अवसाद,
भी पीछे नहीं रहते ,
सब ओर से जकड़ लेते हैं ,
आत्मविश्वास की कमी ,
होती कारण इन सब का ,
पर उदासी जीवन के प्रति ,
समझदारी नहीं होती ,
अनगिनत कारण होते हैं ,
जीवन जीने के ,
जिन में छुपे होते हैं ,
कई संकेत भविष्य के ,
समय के संदूक में ,
कई अनमोल खजाने हैं ,
कभी न कभी मिल ही जाएंगे ,
बीती बातों में क्या रखा है ,
प्यार कोई गुनाह नहीं होता ,
एक रिश्ता यदि टूटा भी ,
आपस में ब्रेकअप हुआ भी ,
तो क्या अन्य सभी ,
समाप्त हो जाएंगे ,
दर्द यदि मिल कर बांटें,
कई लोग साथ खड़े नजर आएँगे ,
जिंदगी में रवानी है ,
है इतनी बड़ी कि ,
विशेषण लगाना ही गलत है ,
जीवन की किताब का,
हर पृष्ठ खुला नहीं होता ,
हर ब्यक्ति हमदर्द नहीं होता ,
आत्मविश्वास यदि कम न हो ,
बीते कल से जो सबक मिले ,
उन पर ध्यान दिया जाए ,
तब कई विकल्प मिल सकते हैं ,
प्यार किसी की जागीर नहीं ,
छोड़ निराशा जब आगे बढते हैं ,
कई रास्ते निकलते हैं ,
इसे ही जिंदगी का सफर कहते हैं |
आशा

19 जुलाई, 2010

यह मैं नहीं जानती

मैं नहीं जानती
क्यूं तुम्हें समझ नहीं पाती
तुम क्या हो क्या सोचते हो
क्या प्रतिक्रया देते हो
तुम्हारे विचारों की अभिव्यक्ति
उसमे होते परिवर्तन
सोचने को बाद्ध्य करते हैं
मन में चंचलता भरते हैं
फिर भी तुम्हें समझ नहीं पाती
बरसों साथ रहे फिर भी
मन में झाँक नहीं पाती
सदा प्रसन्न देख नहीं पाती
कभी नरम मक्खन जैसे
कभी मौम से पिघलते
फिर  अचानक पत्थर की तरह
बहुत सख्त हो जाते
कितनी नफरत भरी हुई है
उन् लोगों के लिए
जो कभी बूले से भी
तुम्हारे आड़े आए
जाने अनजाने ही सही
कभी कोई भूल हुई
क्षमा उसे न कर पाए
उसे अपना नहीं पाए
मन में छिपी चिंगारी को
तुम्हारे अपनों ने ही हवा दी
जब आग जलने लगी
सबने हाथ खूब सके
आग कब नफरत में बदली
यह भी तुम्हें पता नहीं
असली क्या और नकली क्या
इसकी भी परख नहीं
कुंठाओं ने  मन में घर किया
कभी उन्हें विसरा न सके
असंतुष्ट सदा रहे
सत्य जान नहीं पाए
कभी यह तो सोचा होता
क्या सभी बुरे होते हैं ?
अच्छा कोई नहीं होता
कुछ न कुछ कमी
तो सब में होती है
कोई यदि खराब भी है
उसमें कुछ तो अच्छाई होगी
क्यूँ बुराई याद करते हो
अपने को व्यथित करते हो
अनुभव सभी कटु नहीं होते
उनमें भी झरोखे होते हैं
यह मैं नहीं जानती
क्यूँ तुम्हें समझ नहीं पाती
तुम क्या हो, क्या सोचते हो
क्या प्रतिक्रिया करते हो
तुम्हारे विचारों की अभिब्यक्ति
उनमे होते परिवर्तन ,
सोचने को बाध्य करते है ,
मन में चंचलता भरते हैं ,
फिर भी तुम्हें समझ नहीं पाती
बरसों साथ रहे फिर भी
मन में झांक नहीं पाती
सदा प्रसन्न देख नहीं पाती
कभी नरम मक्खन जैसे
कभी मौम से पिघल जाते
फिर अचानक पत्थर की तरह
बहुत सख्त हो जाते
कितनी नफरत भरी हुई है
उन लोगों के लिए
जो कभी भूले से भी
तुम्हारे आड़े आए
जाने अनजाने ही 
यदि कोई भूल हुई
क्षमा उसे कर नहीं पाए
उसे अपना नहीं पाए
मन में छिपी चिन्गारी को
तूम्हारे अपनों ने ही हवा दी
जब आग जलने लगी
सब ने हाथ खूब सके
आग कब नफरत में बदली
यह भी तुम्हें पता नहीं
असली क्या है ,नकली क्या है
इसकी भी परख नहीं
कुंठाओं ने घर किया मन में
कभी उन्हें बिसरा न सके
असंतुष्ट सदा रहे
सत्य पहचान नहीं पाए
जिनसे मीठी यादों की
पुरवाई भी आती है
उसे यदि महसूस करो
तब मन हल्का हो सकता है
तुम उदास कभी न होगे
असन्तुष्ट भी नहीं रहोगे
जब बदलाव सोच में होगा
अच्छाई नजर आएगी
मन में उदासी नहीं रहेगी
जीवन में विरोधाभास न होगा |
आशा



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15 जुलाई, 2010

मेरी कलम की स्याही सूख गई है

मेरी कलम की स्याही सूख गई है ,
क्या यह कोई अजूबा है ?
नहीं यह एक तजुर्बा है ,
जब मन ना हो कुछ लिखने का ,
अपने विचार व्यक्त करने का ,
तब कोई तो बहाना चाहिये ,
मन में आए इस विराम को ,
किसी का तो उलाहना चाहिए ,
कलम के रुक जाने से ,
विचारों के पैमाने से ,
स्याही छलक नहीं पाती ,
अभिव्यक्ति हो नहीं पाती ,
जब कुछ विश्राम मिल जाता है ,
फिर से ख्यालों का भूचाल आता है ,
कलम को स्याही में डुबोने का .
जैसे ही ख्याल आता है ,
विचारों का सैलाब उमड़ता है .
गति अविराम हो जाती है .
कलम में गति आ जाती है ,
सारे दरवाजे खोल जाती है ,
कलम जिसके हाथ में होती है ,
वैसी ही हो जाती है ,
साहित्यकार रचना लिखता है ,
न्यायाधीश फैसला .
साहित्यकार सराहा जाता है ,
कलम का महत्व जानता है ,
पर एक कलम ऐसी भी है ,
फाँसी की सजा देने के बाद ,
जिसकी निब तोड़ दी जाती है ,
अनगिनत विचार मन में आते हैं ,
फिर से लिखने को प्रेरित करते हैं !

आशा

14 जुलाई, 2010

है जिंदगी यही

सुन्दर सी छोटी सी चिड़िया
घोंसले में दुबकी हुई चिड़िया
देख रही आते अंधड़ को
हवा के बवंडर को
कहीं घर तो उसका
न गिर जाएगा
आसरा तो न छिन जाएगा |
यही है इकलौती पूंजी उसकी
जिस में सारी दुनिया सिमटी
छोटे छोटे चूजे उसके
भय से कांप कांप जाते
उन्हें साथ साथ चिपका लेती
भय उनका भी कम करती |
पर अपने भय का क्या करे
उसके मन की कौन सुने
सहारे भाग्य के रहती है
जब अंधड से बच जाती है
अपने को सुरक्षित पाती है
खुशी के गीत गाती है
बीते पल भूल जाती है
यूंही जिंदगी गुजर जाती है |
पर कर्मठ कभी भाग्य पर
निर्भर नहीं रहता
होता है चिड़िया से भिन्न
अपना रास्ता स्वयं खोजता
समस्याओं से जूझना सीखता
उनसे बाहर निकलने के लिए
प्रयत्नों में कमी नहीं रखता
समस्याओं से भरी है जिंदगी
यह भी कभी नहीं भूलता |
आशा

13 जुलाई, 2010

जिसे प्यार कहते हैं

मन में छुपा वह कोमल भाव ,
जिसे प्यार कहते हैं ,
इसे व्यक्त करना मुश्किल है ,
केवल अनुभूति ही होती है |
प्यार बलिदान और समर्पण ,
सभी भाव निहित इसमें ,
कैसे इसे परिभाषित करें ,
शब्द भी कम पड़ जाते हैं |
जो भाषा प्रेम की पढ़ता है ,
वही पंडित हो जाता है ,
सकल चराचर में व्याप्त प्यार ,
है कोइ अछूता नहीं इससे |
सारस का जोड़ा सदा ,
साथ साथ रहता है ,
पर एक यदि नहीं रहे ,
साथी जीवन खो देता है |
ममता ,स्नेह,प्रीत, प्रेम ,
जाने कितने रूप इसके ,
सब एकसे नहीं होते ,
सब में अंतर होता है |
है स्नेह प्यार का एक रूप ,
जिसमे स्थाईत्व नहीं रहता ,
यह बाँटा भी जा सकता है ,
जीवन पर्यन्त नहीं रहता |
ईश्वर से लगी सच्ची लगन ,
और तन्मयता उसमें ,
प्रेम ही तो है ,
निष्काम भाव से जन्मा यह ,
संबंध प्रगाढ़ कर जाता है |
जीवन के रंग मंच पर ,
सारी बातें नाटक सी लगती है ,
कुछ भुला दी जाती है ,
कुछ यादों में बस जाती हैं |
मीठी यादों से उपजी प्रीत ,
सच्चा प्यार होती है ,
राधा दिव्या प्रेम की मिसाल ,
मीरा की बात निराली है |
ईश्वर प्रदत्त यह गुण ऐसा ,
जीवन जीना सिखाता है ,
जो भी इस में लीन हुआ ,
प्रभु के करीब आ जाता है |
द्वेष ,जलन और ईर्षा ,
हैं शत्रु इस मार्ग के ,
जो इन सब से बच पाता है ,
निजी स्वार्थ से परे वह ,
प्रेम पंथ पर बढता जाता है |
आशा

12 जुलाई, 2010

दिशा हीन

दिशा हीन सा भटक रहा ,
आज यहां तो कल वहां ,
अपनी मंजिल खोज रहा ,
आज यहां तो कल वहां
क्या चाहता है कल क्या होगा ,
इसका कोइ अंदाज नहीं ,
कल भी वह अंजाना था ,
अपने सपनों में खोया रहता था ,
लक्ष क्या है नहीं जानता था ,
बिना लक्ष दिशा तय नहीं होती ,
यह भी सोचता न था ,
पढता था इस लिये ,
कि पापा मम्मी चाहते थे ,
या इसलिए कि,
बिना डिग्री अधूरा था ,
पर डिग्री ले कर भी ,
और बेकार हुआ आज ,
जो छोटा मोटा काम ,
शायद कभी कर भी पाता ,
उसके लिए भी बेकार हुआ ,
ख्वाब बहुत ऊंचे ऊंचे ,
जमीन पर आने नहीं देते ,
जिंदगी के झटकों से ,
दो चार होने नहीं देते ,
हर समय बेकारी सालती है ,
मन चाही नौकरी नहीं मिलती ,
यदि नौकरी नहीं मिली ,
तो आगे हाल क्या होगा ,
यही सवाल उसको ,
अब बैचेन किये रहता है ,
यदि थोड़ी भी हवा मिली ,
एक तिनके की तरह ,
उस ओर बहता जाता है
पैदा होती हजारों कामनाएं ,
कईसंकल्प मन में करता है ,
कोइ विकल्प नजर नहीं आते ,
दिशा हीन भटकता है |
आशा

11 जुलाई, 2010

जिसे विश्वास कर्ता पर हो

परम्पराओं में फंसा इंसान ,
रूढियों से जकड़ा इंसान ,
सदियों से इस मकडजाल में ,
चारों ओर से घिरा इंसान ,
निकलना भी चाहे ,
तो निकल नहीं पाता ,
ऊपर जब भी उठना चाहे ,
जाल से बाहर आना चाहे ,
फिर से उसी में फिसल जाता |
वह तो डरता है जाति बंधन से ,
जिसकी कोइ चर्चा नहीं ,
शास्त्रों और पुरानों में ,
समाज फिर भी जोड़ लेता इसे संस्कृति से ,
और देता है दुहाई परम्परा की ,
परिस्थितियाँ ऐसी निर्मित करता है ,
बेबस मनुष्य को कर देता है ,
सपनों का गला घुट जाता है ,
वह मन मार कर रह जाता है |
कई अनुभव जिंदगी के ,
बहुत कुछ सिखा जाते हें ,
जिसे विश्वास कर्ता पर हो ,
और आस्था उस पर ही हो ,
विश्वास स्वयम् जाग्रत होता है ,
तब सभी बंधनों से मुक्त वह ,
आगे को बढ़ता जाता है ,
झूठी परम्पराओं से ,
दुनिया के दिखावों से ,
छुटकारा पा जाता है ,
जीवन सुखी हो जाता है |
आशा

10 जुलाई, 2010

चेहरा

मन की परछाई है चेहरा ,
सारे भाव दर्शाता है ,
कोइ चाहे या ना चाहे ,
हर बात कह जाता है ,
मन के समस्त भावों को,
चेहरे पर जगह मिलती है ,
चाहे कोई लव ना खोले ,
भावों की छाया दिखती है ,
सुन्दर, सुगढ़ ,सजीव चेहरा ,
खिले फूल का विकल्प चेहरा ,
सुनहरी धुप सा दमकता है ,
सब के मन को भाता है |
दुःख से भरा हुआ चेहरा ,
आंसुओं से तर दीखता है ,
आंसूं यदि न भी आएं ,
दुःख उस पर उभर कर आता है ,
वह बहुत उदास दिखता है |
जो भी मन में होता है ,
बनावटी मुखौटा चहरे पर ,
अधिक समय नहीं रहता ,
कभी न कभी सारी सच्चाई ,
चेहरे पर आ ही जाती है ,
मन की बात कह जाती है |
कुछ चेहरे ऐसे भी हैं ,
जो भाव छिपाने में प्रवीण हैं ,
उन्हें समझना बहुत कठिन है ,
यदि ऐसे से पाला पड़ जाए ,
चेहरा पढ़ा नहीं जा पाए ,
जिंदगी पटरी से उतर जाती है ,
सारी शांति भंग हो जाती है |
आशा


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09 जुलाई, 2010

इन्कलाब

बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी ने ,
जीवन का सूरज अस्त किया ,
पहले ही गरीबी कम न थी ,
कर्ज ने और बेहाल किया ,
मन की बेचैनी बदने लगी ,
कैसे कर्ज चुक पायेगा ,
जब कोइ रास्ता नजर नहीं आया ,
आत्महत्या ही विकल्प पाया ,
धनी उद्धयोगपति और नेता ,
अपने पैर मजबूत कर रहे ,
एक से कई उद्योग किये ,
और अधिक धनवान हुए ,
है भृष्टाचार बढ़ता जाता ,
धन चाहे जहां से आए ,
चाहे किसी की जान जाए ,
पूर्ती भृष्टाचारी की हो जाए ,
सरकार कुछ नहीं कर पाती ,
उसमें बैठे लोग ,
केवल दिखावा करते हैं ,
वे बदलाव नहीं चाहते ,
स्वहित छोड़ नहीं पाते ,
गिर गई सरकार यदि ,
तो वे कहाँ जाएंगे ,
फिर से चुनाव जब होंगे ,
अपनी कुर्सी न बचा पाएंगे ,
मतलब सिद्ध यदि होता हो ,
सारे दल एक हो जाते हैं ,
संविधान में संशोधन कर ,
खुद ही लाभ उठाते हें ,
संविधान में भी केवल ,
सैद्धान्तिक बातें ही हैं ,
इसी का लाभ ,
ले जाते हैं नेता और भृष्टाचारी ,
जब जनता उठ खड़ी होगी ,
इन्कलाब बुलंद होगा ,
खलबली मच जाएगी ,
अराजक तत्व ,
कुछ तो छिप जाएंगे ,
और कुछ विदेश का रुख करेंगे ,
बदलाव जब आएगा ,
जनता को उसका हक मिल पाएगा ,
समानता और भाईचारे का ,
देश में साम्राज्य होगा ,
और एक सम्रद्ध समाज होगा |
आशा

08 जुलाई, 2010

नर्मदा उदगम स्थल

सैयाद्री पहाड़ियों से ,
हरी भरी वादी में ,
नर्मदा उदगम स्थल देखा ,
ऊँची पहाड़ियों से ,
जल धाराओं का आना देखा ,
जब पड़ी प्रथम किरण सूरज की ,
सुंदरता को बढते देखा ,
प्रकृति नटी के इस वैवभ को ,
दिगदिगंत में फैलते देखा ,
यह अतुलनीय उपहार सृष्टि का ,
है मन मोहक श्रंगार धारा का ,
दृष्टि जहां तक जाती है ,
उन पहाड़ियों में खो जाती है ,
धवल दूध सी धाराएं ,
कई मार्गों से आती हें
सब एकत्र जब हो जाती हैं
कल कल स्वर कर बहती हें
बहते जल की स्वर लहरी ,
गुंजन करती वादी में ,
अद्भुद संगीत मन में भरता है ,
मुझे प्रफुल्लित कर देता है ,
हल्की हल्की बारिश भी ,
वहां से हटने नहीं देती ,
मन स्पंदित कर देती है ,
रुकने को बाध्य कर देती है ,
बिताया गया वहां हर पल ,
कई बार खींचता मुझको ,
मन करता है घंटों अपलक ,
निहारती रहूं उसको ,
वह हरियाली और जल की धाराएं ,
अपनी आँखों में भर लूं ,
फिर जब भी आँखें बंद करूं ,
हर दृश्य साकार करूं |
आशा


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