09 सितंबर, 2010

अधूरी कविता

मैं कविता लिखना चाहता हूं ,
उसे पूरी करना चाहता हूं ,
पर वह अधूरी रह जाती है ,
चाहता हूं परिपूर्णता ,
पर कुछ त्रुटि रह ही जाती है ,
और विचार करते करते ,
सारी रात गुजर जाती है ,
और कलम रुक जाती है ,
जैसे ही तुम्हें देखता हूं ,
मुस्कान तुम्हारे चेहरे की ,
अद्वितीय प्रभाव छोड़ जाती है ,
कविता और निखरती है ,
उसमे मुस्कान सिमट जाती है ,
काले घुंगराले कुंतल ,
जब माथे पर लहराते हैं ,
कांति तुम्हारे चेहरे की ,
कई गुना हो जाती है ,
विचार अंगड़ाई लेते हैं ,
फिर कविता मैं,
एक कड़ी और जुड़ जाती है ,
सुंदर सुगढ़ हाथ देख ,
डूब जाता हूं मैं तुम में ,
तब कलम में गति आती है
कुछ पंक्तियाँ साथ लाती है ,
चाहता हूं सामने बैठो ,
मेरी कल्पना की उड़ान बनो ,
जब डूबूं सौंदर्य के खजाने में ,
कारे कजरारे नयनों की,
भाषा समझ पाऊं ,
तभी पूर्णता ला पाउँगा ,
कविता को सवार पाऊंगा ,
पर यह भय सदा रहता है ,
तुम कहीं व्यस्त ना हो जाना ,
तुम्ही मेरी कल्पना हो ,
तुम ही मेरी प्रेरणा हो ,
मैं जब तुम्हें न पाउँगा ,
कल्पना उड़ान न भर पाएगी ,
कविता अधूरी रह जाएगी
आशा




,

08 सितंबर, 2010

व्यथा बेरोजगार की

जब अध्यनरत था ,
सफलता के शिखर पर ,
सदा रहता था ,
हर बार प्रथम आता था ,
कभी भाग्य आड़े,
नहीं आता था ,
बहुत लगन से यत्न किये ,
लिखित परीक्षा में सफल रहा ,
पर ना जाने क्यूँ ,
असफलता ही हाथ लगी ,
नौकरी ना मिल पाई ,
बार बार की असफलता ,
हीन भावना भरने लगी ,
लोगों के सामने आने से ,
घबराहट सी होने लगी ,
जब भी कोई मिलता था ,
पहला प्रश्न यही होता था ,
आजकल क्या कर रहे हो ,
मैं निरुत्तर हो जाता था ,
कभी विद्रोह भी करता था ,
तरह तरह की बातों से ,
मन में अकुलाहट होती थी ,
वेदना घर कर जाती थी ,
मन तार तार कर जाती ही ,
पानी बिना मछली की तरह ,
छटपटाहट होने लगती है ,
बेचैनी और बढ़ जाती है ,
यदि योग्यता नहीं होती ,
शायद दुःख भी नहीं होता ,
सब कुछ होते हुए भी ,
असफलता से गठबंधन ,
कुंठित करता जाता है ,
विष मन में घुलता जाता है ,
सब की हिकारत भरी दृष्टि,
मुझे अकेला कर जाती है ,
मैं क्या करूं, क्या है मेरे हाथ में ?
धन भी पास नहीं है ,
और ना कोई अनुभव है ,
जो भाग्य अजमाऊं व्यापार में ,
सोचता हूं सोचता ही रहता हूं ,
ना जाने क्या लिखा है प्रारब्ध में |
आशा

07 सितंबर, 2010

क्या उचित क्या अनुचित

संबंध बनाए ऐसे लोगों से ,
कभी दूर रहते थे जिनसे ,
की चर्चा जिन बातों की ,
क्या विश्वास किया था पहले ,
धर्म ,जाति , भाषा ,प्रान्त ,
जाने क्या सोच लिया तुमने ,
पहले भी बहुत सोचते थे ,
पर अन्याय ना सह पाते थे ,
करते थे विरोध ,
हर असंगत बात का ,
उससे नफरत भी करते थे ,
तुम्हारी यही बातें और विचार ,
लाये मुझे निकट तुम्हारे ,
पर अचानक यह बदलाव ,
मेरी समझ से बहुत परे है ,
है किसका दबाव तुम पर ,
समाज का या परिवार का ,
कहने को बाध्य नहीं करूंगी ,
पर इतना अवश्य कहूंगी ,
अंतरात्मा की अनसुनी कर ,
दूसरों के अनुसार चल कर ,
प्राप्त तुम्हें कुछ ना होगा ,
कभी इस पर दृष्टिपात करना ,
गहराई से विचार करना ,
समाज उसी पर शासन करता है ,
कमजोर जिसे समझता है ,
साहस और शक्ति है जिसमें ,
उससे किनारा कर लेता है ,
साहस है भर पूर तुममें ,
शक्ति की भी कमी नहीं है ,
पर कुछ ऐसा है अवश्य ,
जो तुम्हें बाध्य करता है,
वही सब करने के लिए ,
अनुमति जिसकी नहीं देता ,
मन या मस्तिष्क तुम्हारा ,
सामाजिक होना बुरा नहीं है ,
परम्पराएं निभाना भी हैं ,
पर सारे नियमऔर परम्पराएं ,
न्यायोचित नहीं होतीं ,
और सही भी नहीं होतीं ,
जब विकृत रूप ले लेती हैं ,
उचित यही होता है ,
मुक्ति पा लेना उनसे ,
अन्यथा संकुचित विचार ,
मन मैं घर करते जाते हैं ,
चाहे जब परिलक्षित होते हैं ,
कूप मण्डूक बना देते हैं |

आशा

06 सितंबर, 2010

वीणा के स्वर कहीं खो गए हैं

वीणा के स्वर कहीं खो गए हैं ,
मुझसे हैं नाराज ,
जाने कहाँ गुम हो गए हैं ,
उनके बिना रिक्तता ,
अनजाने ही मुझमें,
घर कर गई है ,
जब चाहे अपना,
आभास करा जाती है ,
उसे भरना बहुत मुश्किल है ,
जो कुछ भी हुआ था ,
उसकी याद दिला जाती है ,
अनेकों यत्न किये मैने ,
फिर भी उसे,
बिसरा नहीं पाती ,
बेचैनी और बढ़ती जाती ,
पहले जब वीणा बजती थी ,
तार मन के झंकृत होते थे ,
मन जीवंत हो जाता था ,
दुनिया से दूर बहुत ,
अपने में खो जाता था ,
इस बार तार जो टूटा है ,
उसे जोड़ना बहुत कठिन है ,
यदि जुड भी गया ,
तो वह मधुरता ,
शायद ही आ पायेगी ,
फिर भी हूं प्रयत्न रत ,
शायद इसे जोड़ पाऊं ,
स्वर वीणा के खोज पाऊं ,
उन में ही रम जाऊं |
आशा

05 सितंबर, 2010

है जिंदगी क्या

अंधेरी रात में ,
जब ना हो कोई साथ में ,
कटती है रात तारे गिन गिन ,
तारे का टूटना और विलुप्त हो जाना ,
किसी अपने की याद दिलाता ,
कामना पूर्ती की आस जगाता ,
आशा निराशा में डूबती उतराती ,
एकाकी जीवन नैया ,
उलझनों से बाहर निकल नहीं पाती ,
गहरे भंवर में फंसती जाती ,
लुकाछिपी करते जुगनू ,
कभी चमकते कभी छिप जाते ,
चमक दमक जिंदगी की,
नजदीक आ दिखला जाते ,
है जिंदगी क्या समझा जाते ,
असली रूप दिखा जाते ,
एक तो अंधेरी रात ,
और दूर से आती आवाज ,
डरावनी सी लगती है ,
बहुत अनजानी लगती है ,
है जिंदगी एक भूल भुलैया ,
सभी इस में खो जाते हैं ,
राह कभी तो दिखती है ,
फिर जाने कंहाँ खो जाती है ,
जब राह नहीं खोज पाते ,
अधिक भटकते जाते हैं ,
और निराश हो जाते हैं ,
यह कैसी संरचना सृष्टि की ,
कोई नहीं समझ पाया ,
ना ही कभी समझ पाएगा ,
मैं हूं एक भटका राही ,
खोजते खोजते राह ,
किसी दिन विलुप्त हो जाना है ,
भूल भुलैया मैं फस कर ,
वहीं कहीं रुक जाना है ,
पर मेरा प्रयत्न विफल ना हो ,
कोई निशान छोड़ जाना है ,
कुछ तो करके जाना है |
आशा

04 सितंबर, 2010

प्रेरणा एक शिक्षक से

आसपास के अनाचार से ,
खुद को बचाकर रखा ,
पंक में खिले कमल की तरह ,
कीचड से स्वम् को बचाया तुमने ,
सागर में सीपी बहुत थी ,
अनगिनत मोती छिपे थे जिनमे ,
उनमे से कुछ को खोजा ,
बड़े यत्न से तराशा तुमने,
आज जब आभा उनकी दिखती है ,
प्रगति दिग दिगंत में फैलती है ,
लगता है जाने कितने,
प्यार से तराशा गया है ,
उनकी प्रज्ञा को जगाया गया है ,
काश सभी तुम जैसे होते ,
कच्ची माटी जैसे बच्चों को ,
इसी प्रकीर सुसंस्कृत करते ,
अच्छे संस्कार देते ,
स्वच्छ और स्वस्थ मनोबल देते ,
अपने बहुमूल्य समय में से ,
कुछ तो समय निकाल लेते ,
फूल से कोमल बच्चों को ,
विकसित करते सक्षम करते ,
जो कर्तव्य तुमने निभाया है ,
सन्देश है उन सब को ,
तुम से कुछ सीख पाएं ,
नई पौध विकसित कर पाएं ,
खिलाएं नन्हीं कलियों को ,
कई वैज्ञानिक जन्म लेंगे ,
अपनी प्रतिभा से सब को ,
गौरान्वित करेंगे ,
जीवन में भी सफल रहेंगे ,
अन्य विधाओं में भी ,
अपनी योग्यता सिद्ध करेंगे ,
जब रत्नों की मंजूषा खुलेगी ,
कई अनमोल रत्न निकलेंगे |
आशा

03 सितंबर, 2010

आभास क्षमता का

है खंजन नयन ,चंचल चपल ,
मद मस्त चाल हिरणी सी ,
कभी लगती ठंडी बयार सी ,
फिर भी है विरोधाभास ,
तू है उदास विरहणी सी ,
वेदना के स्त्रोत क्यूँ,
साथ लिए रहती है ,
है जीवन की भरपूर आस ,
ना हो उदास ,
उससे दूर क्यूँ रहती है ,
तू नहीं जानती ,
है कितनी अमूल्य तू ,
है तुझ में ऐसी तपिश ,
जो चाहे कर सकती है ,
कभी ठंडी हिम पिंड सी ,
दावानल की तरह ,
कभी उग्र भी हो सकती है ,
अपनी क्षमता को पहचान ,
ना रह इससे अनजान ,
दृढता से उठे कदम ,
ऊँचाई तक पहुंचाएंगे ,
तेरी पहचान बनापाएंगे ,
मत भूल अपनी क्षमता को ,
ना ही सीमित कर क्षेत्र को ,
जब लोग तुझे जानेंगे ,
तेरी पहचान पुष्ट होगी ,
दुनिया तब बैरी ना होगी ,
जिस भी क्षेत्र में कदम रखेगी ,
सफलता के उत्तंग शिखर पर ,
तू सहज ही चढ़ पाएगी |
आशा

02 सितंबर, 2010

कविता में परिवर्तन क्यूँ

सदा से ही प्रशंसक रहा ,
तुम्हारे कृतित्व का ,
इसको और बल मिला ,
जब मनोयोग से तुम्हें पढ़ा ,
इतना कुछ तुमने लिखा है ,
थाह पाना मुश्किल है ,
इच्छा तुमसे मिलने की ,
अधिक बलवती होती गई ,
जब भी अवसर मिला ,
तुमसे मिला ,
कुछ अधिक ही संपर्क रहा ,
मित्रता प्रगाढ़ होती गई ,
मैने जो कुछ भी लिखा ,
त्रुटियों को क्षम्य मान ,
मुझे सराहा,
प्रोत्साहित किया ,
कई बार साथ बैठा करते थे ,
भिन्न विषयों पर चर्चा करते हें ,
उनमे गहरे पैठ जाते थे ,
आत्मसात करते जाते थे ,
कई खंड काव्य रचे तुमने ,
वे अमर तुम्हें कर गए ,
दिलाया स्थान ,
इतिहास और साहित्य में ,
कई लोगों की प्रेरणा बन गए,
पहले कविता बहुरंगी थी ,
कई विधाएं छूती थी ,
फिर न जाने क्या हुआ ,
वह विद्रोह से भरती गई ,
यह कैसा परिवर्तन आया ,
क्रांतिकारी विचारक बन गए ,
जब भी कारण जानना चाहा ,
हर बार हंस कर टाल गए ,
मैं आज भी तुम्हारे जाने के बाद ,
रचनाएँ समेटे बैठा हूं ,
कारण विद्रोह का खोज रहा हूं ,
लेखन में यह बदलाव,
अचानक आया कैसे ,
कलम ने स्वयं को ,
विद्रोही बनाया कैसे |
आशा

31 अगस्त, 2010

सूखी डाली

है आज वह सूखी डाली ,
जो शोभा बढाया करती थी ,
कभी किसी हरे वृक्ष की ,
फल फूलों से लदी हुई वह ,
आकर्षित सब को करती थी ,
उस डाली पर बैठे बैठे ,
पक्षियोंकी चहचहाहट,
फुर्र से उड़ना उनका ,
बापिस वही लौट आना ,
घंटों बैठ चोंच लड़ाना ,
बहुत अच्छा लगता था ,
जाने कितना आकर्षण ,
उसमे होता था,
पथ से गुजरते राही ,
जब उसे निहारते थे ,
आत्म विभोर हो जाते थे ,
फल प्राप्ति की चाहत में ,
कई प्रयत्न किया करते थे ,
जब फल पकते और टपकते थे ,
कई जीव पेट अपना भरते थे ,
जीवन में हरियाली छाई थी ,
नामोंनिशां उदासी का न था ,
पर अब वह सूख गई है ,
उस पर उल्लू बैठा करते है ,
उसकी अवहेलना सभी करते हैं ,
ध्यान कहीं और रहता है ,
शिकार कई खोज में रहते हैं ,
जब लकड़हारा देख उसे ,
काटने के लिए चुन रहा है ,
वह और उदास हो जाती है ,
वृद्धावस्था की तरह ,
उसकी कमर झुक जाती है ,
एक दिन काटी जाएगी ,
अग्नि को समर्पित की जाएगी ,
उसकी जीवन लीला की ,
ऐसे ही समाप्ति हो जाएगी ,
वह सूख गई है ,
कभी हरी ना हो पाएगी ,
सोचती हूं ,विचारती हूं ,
इस क्षणभंगुर जीवन की ,
और कहानी क्या होगी |
आशा

30 अगस्त, 2010

मैं कुछ लिखना चाहती हूं

इच्छा कुछ लिखने की ,
बचपन से थी ,
रहती थी अध्यन रत,
तब भी चाहे जब ,
अंदर छिपे कवि की ,
छबि दिखाई देती थी ,
कभी कभी लिखती थी ,
साहित्यकार बनने की ,
अभिलाषा भी रखती थी ,
पर था दायरा सीमित ,
जब भी कुछ लिखा ,
केवल पत्रिका के लिए ,
उसमे छप भी जाता था ,
तब लेखन से ,
इतना ही मेरा नाता था ,
जब अध्यापन का क्षेत्र चुना ,
समय की कोई कमी न थी ,
अध्ययन में मन लगता था ,
वही विचारों में प्रस्फुटित होता था ,
मंच पर आने की चाहत ,
मन में घर करने लगी ,
और निखार आया लेखन में ,
सपने सच्चे होने लगे ,
विचारों का झरना बहने लगा ,
दामन खुशियों से भरने लगा ,
देख पल्लवित होती आकांक्षा ,
मन मुक्त आकाश में उड़ने लगा ,
अब मैं लिखना चाहती हूं ,
आने वाली पीढ़ी के लिए ,
बीता कल ना लौट पाएगा ,
पर संदेश कविताओं का ,
मन में घर करता जाएगा ,
मैं क्रांतिकारी तो नहीं ,
पर सम्यक क्रांति चाहती हूं ,
हूं एक बुद्धिजीवी ,
प्रगति देश की चाहती हूं |
आशा

29 अगस्त, 2010

कोई साथ नहीं देगा

प्रतिस्पर्धा के इस युग में ,
सभी  व्यस्त अपने अपने में
जब कोई कठिन समस्या हो
या सहायता की आवश्यकता
देख कर भी अनदेखा कर देते है
उससे किनारा के लेते हैं |
समस्या में ना उलझ कर
बच कर निकल आने पर
बहुत प्रसन्न हो जाते हैं
निजी स्वार्थ में लिप्त हो
आत्म केंद्रित हो जाते हैं
समाज से भी कटते जाते 
यदि ऐसा ही चलता रहा
आने वाले समय में
यह दुःख का कारण होगा
जब खुद पर मुसीबत आएगी
तब कोई साथ नहीं देगा
सहायता के लिए गुहार करोगे
आसपास कोई ना होगा
हर व्यक्ति मुंह मोड लेगा
समाज भी आइना दिखा देगा |
आशा

28 अगस्त, 2010

एक झलक

है नई जगह अनजाने लोग ,
फिर भी अपने से लगते हैं ,
हैं भिन्न भिन्न जीवन शैली ,
भाषा भी हैं अलग अलग ,
पर सब समझा जा सकता है ,
उनकी आत्मीयता और स्नेह ,
गति अवरोध दूर करते हैं ,
आसपास नए चेहरे ,
पर गहराई उनके स्नेह में,
उस ओर आकर्षित करती है,
हैं वे सब भारतवासी ,
साहचर्य भाव रखते हैं ,
भेद भाव से दूर बहुत ,
सब से प्रेम रखते हैं ,
अनेकता में एकता की ,
झलक यदि देखना है ,
तो आओ इस देश में ,
इतना प्यार तुम्हें मिलेगा ,
डूब जाओगे अपनेपन में ,
गर्व करोगे अतिथि हो कर ,
और जब बापिस जाओगे ,
जल्दी फिर लौटना चाहोगे |
आशा

26 अगस्त, 2010

स्मृतियां


सुरम्य वादियों में
दौनों ओर वृक्षों से घिरी ,
है एक पगडंडी ,
फूल पत्तियों से लदी डालियाँ ,
हिलती डुलती हैं ऐसे ,
जैसे करती हों स्वागत किसी का ,
चारों ओर हरियाली ,
सकरी सी सफेद सर्पिनी सी ,
दिखाई देती पगडंडी ,
जाती है बहुत दूर टीले तक ,
एक परिचिता सी ,
पहुंचते ही उस तक ,
गति आ जाती है पैरों में ,
टीले तक खींच ले जाती है ,
कई यादें ताजी कर जाती है ,
लगता है टीला,
किसी स्वर्ग के कौने सा ,
और यादों के रथ पर सवार ,
हो कर कई तस्वीरें ,
सामने से गुजरने लगती हैं ,
याद आता है वह बीता बचपन ,
जब अक्सर यहाँ आ जाते थे ,
घंटों खेला करते थे ,
बड़े छोटे का भेद न था ,
केवल प्यार ही पलता था ,
कभी न्यायाधीश बन ,
विक्रमादित्य की तरह ,
कई फैसले करते थे ,
न्याय सभी को देते थे ,
जब दिखते आसमान में ,
भूरे काले सुनहरे बादल ,
उनमे कई आकृतियाँ खोज , ,
कल्पना की उड़ान भरते थे ,
बढ़ चढ कर वर्णन उनका ,
कई बार किया करते थे ,
छोटे बड़े रंग बिरंगे पत्थर,
जब भी इकठ्ठा करते थे ,
अनमोल खजाना उन्हें समझ ,
गौरान्वित अनुभव करते थे ,
खजाने में संचित रत्नों की ,
अदला बदली भी करते थे ,
बचपन बीत गया ,
वह लौट कर ना आएगा ,
वे पुराने दिन ,
चल चित्र से साकार हो ,
स्मृतियों में छा जाते हैं ,
वे आज भी याद आते हैं |
आशा

23 अगस्त, 2010

घुँघरू

बंधी किंकिणी कमर पर
पहने पैरों में पैजनिया
जब ठुमक ठुमक चलता
सुनाई देती ध्वनि घुंघरूओं की
थामना चाहती उंगलियां
कहीं चोट न लगाजाए |
चाहती हूं थामूं उंगली उसकी ,
कहीं चोट ना लग जाए |
कारे कजरारे नयनो वाली
है अवगुंठन चहरे पर
चूड़ियों की खनक से
पैरों में सजी पायलों से
देती है झलक अपने आगमन की
पायलें भी ऐसी जो बोलती हैं
मन के भेद खोलती हैं
हैं हमजोली नूपुर की |
मीरा ने घुँघरू बांधे थे
वह कृष्ण प्रिया हो गयी
सुध बुध खो नृत्य करती
थी भक्ति भाव में सराबोर
आती है मधुर ध्वनि घुँघरू की
आज भी मीरा मंदिर से |
है मंदिर प्रांगण में आयोजन
सजधज कर आई बालाएं
हो विभोर नृत्य कर रहीं
उनका पद संचालन
और झंकार घुंघरूओं की
पहुंचती है दूर तक
प्रसन्न होता मन
वह मधुर झंकार सुन |
है पंडाल सजा सजाया
मंच पर पड़ती थाप
नर्तकियों के पैरों की
घुँघरूओं के बजाते ही
सब उसी रंग में रंगते जाते |
है घुंघरुओं की खनक सब मैं
पर हर बार भिन्न लगती है
पैरों के घुँघरू बचपन के
तो कभी हैं अभिसारिका के
कभी नाइका की पदचाप
तो कभी चंचल मोरनी की
थिरकन से लगते हैं |
घुँघरू हैं वही पर
हर बार भाव भिन्न और
बजने का अंदाज भिन्न
एक घुंगरू भी यदि अलग हो जाए
असहाय सा हो जाता है
अपना अस्तित्व
खोजता रहा जाता है |
है घुँघरू आधार नृत्य का
वह उसके बिना अधूरा है ,
बिना घुँघरू की मधुर धुन के ,
जीवन भी सूना सूना है |
आशा

22 अगस्त, 2010

जब रात होती है

जब रात होती है ,
नींद अपने बाहों में लेना चाहती है ,
तभी एक अनजानी शक्ति ,
अपनी ओर खिचती है ,
आत्म चिंतन के लिए बाध्य करती है ,
दिन भर जो कुछ होता है ,
चल चित्र की तरह आता है ,
आँखों के समक्ष ,
दिन भर क्या किया ?
विचार करती हूं ,
कभी विचारों में ठहराव भी आता है ,
गंभीर चिंतन और मनन
मन नियंत्रित कर पाता है ,
जो उचित होता है ,
कुछ खुशियाँ दे जाता है ,
पर जब त्रुति कोई होती है ,
पश्चाताप होता है ,
कैसे उसे सुधार पाऊं ,
बारम्बार बिचारती हूं ,
जाने कब आँख लग जाती है ,
कब सुबह हो जाती है ,
यह भी पता नहीं चलता ,
कभी अहम बीच में आता है ,
क्षमा याचना मुश्किल होती है ,
कहाँ गलत हूं जानती हूं ,
फिर भी स्वीकर नहीं करती ,
सोचती अवश्य हूं ,
भूल तुरंत सुधार लूं ,
एक निश्प्रह व्यक्ति की तरह ,
जब सोच पाउंगी ,
तभी अपने अंदर झांक पाउंगी ,
है यह कठिन परीक्षा की घड़ी,
फिर भी आशा रखती हूं ,
आत्म नियंत्रण कैसे हो ,
इसका पूरा ध्यान रखूंगी |
आशा

20 अगस्त, 2010

पहले तुम ऐसी न थीं ,

पहले तुम ऐसी ना थीं
मेरी बैरी ना थीं
मैं आज भी तुम्हें
अपना शत्रु नहीं मानता |
ऐसा क्या हुआ कि
अब पीछे से वार करती हो
कहीं दुश्मन से तो
हाथ नहीं मिला बैठी हो |
वार ही यदि करना है
पीछे से नहीं सामने से करो
पर पहले सच्चाई जान लो
दृष्टि उस पर डाल लो |
कोई लाभ नहीं होगा
अन्धेरे में तीर चलाने से
मेरे समीप आओ
मुझे समझने का यत्न करो |
मेरे पास बैठो
मैं अभी भी ना
समझ पाया हूं तुम्हें
क्यूँ दुखों का सामान
इकट्ठा करती हो |
मेरी भावनाओं से खेलती हो
बिना बात नाराज होती हो
कुछ तो बात को समझो
अभी भी देर नहीं हुई है |
आओ दिल की बात करो
बैमनस्य दूर करने के लिए
सामंजस्य स्थापित करने के लिए
कुछ तो मुझसे कहो |
ह्रदय पर रखा हुआ बोझ
कुछ तो कम होगा
जब सच्चाई जान जाओगी
मुझे समझ पाओगी
तभी शांति का अनुभव होगा|
आशा

छिपा हुआ

मन मैं छिपी भावनाओं के ,
इस अनमोल खजाने को ,
क्यूँ अब तक अनछुआ रखा ,
आखिर ऐसी क्या बात थी ,
सब की नजरों से दूर रखा ,
मन में उठी भावनाओं को ,
पहले तो लिपिबद्भ किया ,
फिर क्यूँ सुप्त प्रतिभा को ,
फलने फूलने का अवसर ना दिया ,
सब की नजरों से दूर किसी कोने में ,
इसे छिपा कर रखा,
हर बात जो मन को अच्छी लगती है ,
जीवन में अपना स्थान रखती है ,
यह अधिकार किसी को नहीं है ,
कि उसे अपने साथ ले जाए ,
कोई सपना अधूरा रह जाए ,
साथ ही चला जाए ,
जीने का यह अंदाज ऐसा भी बुरा नहीं है ,
किसी भावना से जुड़ जाएं ,
यह कोई गुनाह नहीं है ,
जो बीत गया कल फिर ना आएगा ,
आनेवाले कल का भी कोई पता नहीं ,
वर्तमान में संचित पूंजी का ,
क्यूँ ना पूर्ण उपयोग करूं ,
इस अनमोल खजाने का,
जी भर कर उपभोग करूं |
आशा


,

19 अगस्त, 2010

राखी आई राखी आई


राखी आई राखी आई
भाई बहन के स्नेह बंध का
यह त्यौहार अनोखा लाई
राखी आई राखी आई
पहन चुनरी ,मंहदी चूड़ी
बहना भी सजधज कर आई
राधा और रुकमा को लाई
राखी आई राखी आई
फैनी घेवर और मिठाई
फल और राखी बहना लाई
रंग बिरंगी राखी ला कर
अपने भैया को पहनाई
केवल धागा नहीं है राखी
रक्षा का बंधन है राखी
बांध कलाई पर राखी को
बहना देती दुआ भाई को |
आशा

18 अगस्त, 2010

क्या खोया क्या पाया मैंने


क्या खोया क्या पाया मैने
 आकलन जब भी किया 
सच्चाई जानना चाही 
मैं और उदास हो गयी 
बहुत खोया कुछ ना पाया
जब भी पीछे मुड़ कर देखा
लुटा हुआ खुद को पाया 
जाने कितने लोग मिले
केवल सतही संबंधों से
जिनके चहरे खूब खिले
यह सब मैने नहीं चाहा
अपनों को ही अपनाया
मन से सब का अच्छा चाहा
पर आत्मीय कोई ना पाया
जूझ रही हूं जिंदगी से
कुछ अच्छा नहीं लगता
चारों और  अन्धेरा लगता 
और उदासी छा जाती है
सोचती हूं ,विचारती हूं
लंबी उम्र बनी ही क्यूँ
यदि निरोगी काया होती
शायद तब अच्छा लगता
पर इससे हूं दूर बहुत
हर ओर वीराना लगता है
फिर भी मन को छलती हूं
देती हूँ झूटी सांत्वना
कभी तो समय बदलेगा
कोई अपना होगा
निराशा नहीं होगी
आशा का दीप जलेगा 
आशा

17 अगस्त, 2010

डायरी का हर पन्ना


मेरी डायरी का,
हर पन्ना खाली नहीं है ,
सब पर कुछ न कुछ लिखा है ,
जो भी लिखा है असत्य नहीं है ,
पर पढ़ा जाए जरूरी भी नहीं है ,
कुछ पन्नों पर पेन्सिल से लिखा है ,
जिसे मिटाया जा सकता है ,
कुछ नया लिख कर ,
सजाया सवारा भी जा सकता है ,
कुछ ऐसा जब भी होता है ,
जो मन के विपरीत होता है ,
डायरी में वह भी ,
होता है अंकित,
मन को लगी ठेस,
करती है बहुत व्यथित .
पर पल दो पल की खुशियाँ ,
बन जाती हैं यादगार पल ,
और दे जाती हैं शक्ति ,
उन पन्नों को भरने की ,
पेन्सिल से जो लिखा था ,
रबर से मिट भी गया ,
पर मन के पन्नों पर ,
है जो अंकित ,
उसे मिटाऊं कैसे ,
सारे प्रयत्न व्यर्थ हुए ,
उनसे छुटकारा पाऊं कैसे |
आशा

15 अगस्त, 2010

गलती उसकी इतनी सी थी

कई बार सड़क पर चौराहों पर ,
झगडों टंटों को पैर पसारे देखा है ,
अन्याय करता तो एक होता है ,
पर दृष्टाओं को उग्र होते देखा है ,
ऐसे उदाहरण अच्छा सन्देश नहीं देते ,
उलटा भय औरअसुरक्षा से ,
भर देते हैं सब को ,
बीते कल का एक दृष्य ,
जब भी सामने आता है ,
बार बार विचार आता है ,
ऐसा क्या किया था उसने ,
जो उस पर कहर टूट रहा था ,
वहां जमा जन समूह ,
उसे समूचा निगलना चाह रहा था ,
सच्चाई जब सामने आई ,
मन मैं झंझावात उठा ,
उस निरीह प्राणी के लिया ,
एक दया का भाव उठा ,
गलती उसकी इतनी सी थी ,
वह चार दिनों से भूखा था ,
जब भूख सहन ना कर पाया ,
अपने को चौराहे पर पाया ,
पहले भीख मांगना चाही ,
पर वह भी जब नहीं मिली ,
चोरी का रास्ता अपनाया ,
जैसे ही दुकान पर पहुंचा ,
रोटी के लिए हाथ बढाया ,
दुकानदार ने देख लिया ,
बहुत मारा बेदम किया ,
जन समूह भी उग्र हुआ ,
और उसे निढाल किया ,
वह टूट गया था ,
फूट फूट कर रोता था ,
वह तो काम चाहता था ,
पर कोई ऐसा नहीं था ,
जो उसे अपना लेता ,
काम के बदले रोटी देता |
आशा

14 अगस्त, 2010

तुम मेरे बिना अधूरे हो

जब हम होंगे सागर के ऊपर ,
मैं तरंग बन लहरों के संग,
मीठे गीत गुनागुनाऊंगी ,
बस तुम मेरे साथ रहना ,
मैं कोई व्यवधान नहीं बनूंगी ,
यह चाहती हूं जग देखूं ,
हिलूं मिलूँ और स्नेह बटोरूँ ,
जब वन उपवन से गुजारें ,
कुछ कदम पहले पहुंच कर ,
पंख फैलाए मोरों के संग ,
घूम घूम कर ,
थिरक थिरक कर नाचूंगी ,
तुम्हारे आगमन पर,
स्वागत मैं तुम्हारा करूंगी ,
मैं हवा हूं ,
कोमल पौधों के संग,
खेलूंगी अठखेली करूंगी ,
महानगरीय संस्कृति ,
मुझे अच्छी नहीं लगती ,
मेरे साथ गाँव चलना ,
सुरम्य वादियों से गुजरना ,
रमणीय दृश्य देख वहां के ,
उनमें कहीं ना खो जाना ,
वारिध तुम यह भूल न जाना ,
तुम मेरे बिना अधूरे हो ,
जब तक साथ तुम्हारा दूंगी ,
तुम आगे बढते जाओगे ,
मैं मंद हवा का झोंका हूं ,
अस्तित्व मेरा भुला ना पाओगे ,
मेरा साथ यदि छोड़ा,
तुम कहीं भी खो जाओगे |
आशा

13 अगस्त, 2010

मन की स्थिति

इस मस्तिष्क की भी ,
एक निराली कहानी है ,
कभी स्थिर रह नहीं पाता,
विचारों का भार लिए है ,
शांत कभी न हो पाता ,
कई विचारों का सागर है ,
कुछ प्रसन्न कर देते हैं ,
पर उदास कई कर जाते हैं ,
जब उदासी छाती है ,
संसार छलावा लगता है ,
इस में कुछ भी नहीं रखा है ,
यह विचार बार बार आता है ,
विरक्त भाव घर कर जाता है ,
पर अगले ही क्षण,
कुछ ऐसा होता है ,
दबे पांव प्रसन्नता आती है ,
आनन पर छा जाती है ,
दिन में दिवास्वप्न ,
और रात्रि में स्वप्न,
आते जाते रहते हैं ,
अपने मन की स्थिति देखती हूं ,
सोचती हूं किससे क्या कहूँ ,
जब अधिक व्यस्त रहती हूं ,
कुछ कमी सपनों मैं होती है ,
कार्य करते करते ,
जाने कहाँ खो जाती हूं
पर कुछ समय बाद ,
फिर से व्यस्त हो जाती हूं ,
ऐसा क्यूँ होता है ,
मैं स्वयं समझ नहीं पाती ,
ना ही कोई असंतोष जीवन में ,
और ना अवसाद कोई ,
फिर भी सोचती हूं ,
खुद को कैसे इतना व्यस्त रखूं,
मन की बातें किससे कहूं,
मन के जो अधिक निकट हो ,
यदि यह सब उससे कहूं ,
शायद कुछ बोझ तो हल्का हो ,
मस्तिष्क और ना भटके ,
मनोविज्ञान पढ़ा है फिर भी ,
विचारों में होते बदलाव का,
कारण जान नहीं जान पाई ,
कोई हल् निकाल नहीं पाई ,
शायद संसार मैं यही होता है ,
जो मस्तिष्क पर छाया रहता है |
आशा



,

11 अगस्त, 2010

इस तिरंगे की छाँव में

पन्द्रह अगस्त स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर विशेष रूप से लिखी गई रचना |शायद पसंद आए |
इस तिरंगे की छाँव में ,
जाने कितने वर्ष बीत गए
फिर भी रहता है इन्तजार
हर वर्ष पन्द्रह अगस्त के आने का
स्वतंत्रता दिवस मनाने का |
इस तिरंगे के नीचे
हर वर्ष नया प्रण लेते हैं
है मात्र यह औपचारिकता
जिसे निभाना होता है |
जैसे ही दिन बीत जाता
रात होती फिर आता दूसरा दिन
बीते कल की तरह
प्रण भी भुला दिया जाता |
अब भी हम जैसे थे
वैसे ही हैं ,वहीँ खड़े हैं
कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ
पंक में और अधिक धंसे हैं |
कभी मन मैं दुःख होता है
वह उद्विग्न भी होता है
फिर सोच कर रह जाते हैं
अकेला चना भाड़ नहीं फोड सकता
जीवन के प्रवाह को रोक नहीं सकता |
शायद अगले पन्द्रह अगस्त तक
कोई चमत्कार हो जाए
हम में कुछ परिवर्तन आए
अधिक नहीं पर यह तो हो
प्रण किया ही ऐसा जाए
जिसे निभाना मुश्किल ना हो |
फिर यदि इस प्रण पर अटल रहे
उसे पूरा करने में सफल रहे
तब यह दुःख तो ना होगा
जो प्रण हमने किया था
उसे निभा नहीं पाए
देश के प्रतिकुछ तो निष्ठा रख पाए
अपना प्रण पूरा कर पाए |
आशा

10 अगस्त, 2010

तुम क्यूँ मेरा पीछा करती हो

सुबह हो या दोपहर हो ,
जब मैं बाहर जाती हूँ ,
कभी आगे चलती हो ,
कभी पीछे ,
पर सदा साथ साथ चलती हो ,
मुझे कारण पता नहीं होता ,
तुम क्यूँ मेरा पीछा करती हो ,
तुम क्या चाहती हो
मौनव्रत लिए रहती हो ,
बार बार मुझे छलती हो ,
हो तुम आखिर कौन ,
जो मेरा पीछा करती हो ,
मेरी जासूसी करती हो ,
मैं झुकती हूं तुम झुकती हो ,
मैं रुकती हूं तुम रुकती हो ,
मेरा साथ तब भी न छोड़तीं ,
जब भी बादल होते हैं ,
या घना अंधकार होता है ,
मुझे डर भी लगता है ,
तभी साथ छोड़ जाती हो ,
तुम ऐसा क्यूँ करती हो ,
हर बार मुझे छलती हो ,
क्या रात में भी साथ रहती हो ,
मेरी सारी बातों को ,
चुपके से जान लेती हो ,
क्या तुम मेरी प्रतिच्छाया हो ,
या हो और कोई ,
तुमको मैं क्या नाम दूँ ,
यह तो बताती जाओ |
आशा