06 नवंबर, 2010

मेरी यादो में ---

मेरी यादों में तू भी,
कभी रोया होगा ,
मेरी तस्वीर को,
आँसुओं से भिगोया होगा ,
पुरानी बातों का जिक्र ,
हर बार हुआ करता था ,
दिल की बातों का इज़हार ,
हो कैसे मालूम न था ,
यूँ बिछुड़ जायेंगे ,
यह सोचा न था ,
कभी ना मिल पायेंगे ,
इसका अन्दाज़ा न था ,
जब भी तेरे साये से ,
लिपट कर रोया मैं ,
सीने में उठे दर्द को ,
सम्हाल ना पाया मैं |


आशा

05 नवंबर, 2010

मन खिन्न हुआ








                                                               मन खिन्न हुआ दिल टूट गया
थी  जो अपेक्षा   उस पर खरे न उतरे 
जाने कितने अहसान किये
पर जताना कभी नहीं भूले
संख्या इतनी बढ़ी कि
 भार सहन ना हो पाया
बेरंग ज़िंदगी का एक और रूप नज़र आया
कहने को  सब कुछ है पर कहीं न कहीं अंतर है
छोटी-छोटी बातों से
 किरच-किरच हो दिल बिखर गया
गहरे सोच में डूब गया
 वेदना ने दिये ज़ख्म ऐसे
नासूर बनते देर न लगी
अब कोई दवा काम नहीं करती
अश्रु भी सूख गये अब तो
पर आँखे विश्राम नहीं करतीं 
वेदना इतनी गहरी कि
रूठा मन शांत नहीं होता
है इन्तजार उस परम सत्य का
जब काया पञ्च तत्व में विलीन होगी
झूठी माया व्यर्थ का मोह
 सभी से मुक्ति मिल पायेगी
वेदना तभी समाप्त हो पाएगी |

                                                                           आशा

04 नवंबर, 2010

और तुलना कैसी

तारों से दमकता आकाश
दीपावली की रात
और सतत टिमटिमाते
माटी के दीपक
घर रोशनी से चमकने लगे
मंद हवा के स्पर्श से
दिये भी धीरे-धीरे
बहकने लगे
ख़ुद पर ही
मोहित होने लगे
तारों से तुलना करने लगे |
जो बात हम में है
उन तारों में कहां
हैं मीलों दूर
हमारी चमक दमक से
और वंचित
सब के प्रेम से
प्यार हमें सब करते हैं
स्नेह से सजाते हैं
तारे तोअपने आप ही
टिमटिमाते हैं !
तारे चुप कैसे रहते
पलट वार किया बोले
है जीवन तुम्हारा
बस एक रात का
जल्दी ही बुझ जाते हो
फिर आते होअगले बरस
हम तो समस्त सृष्टि के दुलारे
रोज यहाँ आते हैं
अमावस की रात्रि को
कुछ अधिक ही सजा जाते हैं
झिलमिलाती चुनरी पहन
जब वह जाती है
बहुत आल्हादित करती है
तभी तो हमारा वर्णन
चाहे जब होने लगता है
माना कविता
तुम पर भी बनती है
पर छाए तो हम रहते हैं
रचनाकार के
मन मस्तिष्क पर |
तुम याद किये जाते
वर्ष में एक बार
हम तो जाने अनजाने
हर दिन याद किये जाते हैं |
विदीर्ण हृदय लिये दीपक
बहुत उदास हो गये
सारी रात जल ना सके
भोर से पहले ही बुझ गये |
जुगनू यह सब सुन रहे थे
बारम्बार सोच रहे थे
हम भी तो चमकते हैं
वीरानों तक को
करते गुलजार
अल्प आयु भी रखते हैं
हैं दीपक जैसे ही
अच्छा है हमसे
कोई ईर्ष्या नहीं रखता
हमारे क्षणिक जीवन का
कोई हिसाब नहीं रखता |
 तारों से है  क्या बराबरी
जो पूरे अम्बर पर
अधिकार जमाए बैठे हैं
उनसे हो क्यूँ तुलना
वे  अपने आप में खोये रहते हैं |
सब में हैं गुण दोष कई
फिर आपस में बराबरी क्यूँ ?
और तुलना कैसी ?


आशा

02 नवंबर, 2010

हो स्वागत कैसे लक्ष्मी का

हो स्वागत कैसे लक्ष्मी का ,
अन्धकार ने घेरा है ,
तेल बाती लायें कहाँ से ,
महँगाई ने घेरा है ,
हर ओर उदासी छाई है ,
कमर तोड़ महँगाई है ,
बाजार भरा पड़ा सामान से ,
पर धन परिसीमित करना है ,
चंद लोगों ने ही त्यौहार पर,
कुछ नया खरीदा है ,
बाकी तो रस्म निभा रहे हैं ,
बेमन से पटाखे ला रहे हैं ,
बच्चों का मन रखने के लिए ,
गुजिया पपड़ी बने कैसे ,
मँहगाई की मार पड़ी है ,
खील बताशे तक मँहगे हैं ,
क्रेता का मुँह चिढ़ा रहे हैं ,
शक्कर की मिठास भी,
कम से कमतर होने लगी है ,
हर चीज फीकी लगती है ,
जब भाव उसका पूछते हैं ,
मन को कैसे समझायें ,
देना लेना सब करना है ,
कहाँ-कहाँ हाथ रोकें ,
हर बात है समझ से परे ,
पसरे पैर मँहगाई के ,
गहरा घना अंधेरा है ,
फिर भी सब कुछ करना है ,
क्योंकि यहीं रहना है ,
हर त्यौहार की तरह ,
दीपावली भी ,
मन ही जायेगी ,
पर आने वाले दो माह का ,
बजट बिगाड़ कर जायेगी |


आशा

01 नवंबर, 2010

ऐ दिल तुझे क्या हो गया है

ऐ दिल तुझे क्या हो गया है
गलत कदम उठाया क्यूँ
रिश्ता ऐसा बनाया क्यूँ
जो निभाना संभव न था
था नियम विरुद्ध समाज के
लोगों ने रोकना चाहा 
कुछ ने तो टोका भी 
तब भी सचेत ना हो पाया
और गर्त में फँसता गया
वापिस लौट नहीं पाया
बहुत व्यस्त किया स्वयं को
फिर भी भूल नहीं पाया
बार-बार वही बात, वही रोना
उसमें ही खोये रहना
अब तो दर्द भी
दिखने लगा है चेहरे पर
यह कितने दिन यूँ ही रहेगा
ना कोई दवा इसकी
और ना कोई असर इस पर
भूले से जो भूल हुई थी
यदि उसे सुधारा होता
पूरी तरह भुला दिया होता
नियंत्रण खुद पर रखा होता
तब तू यूँ बेचैन ना होता |


आशा

31 अक्टूबर, 2010

मैं लिखती हूँ तेरे लिये

सब लिखते हैं स्वयं के लिये ,
आत्म संतुष्टि के लिये ,
पर मैं लिखती हूँ तेरे लिये ,
कहीं तेरा लगाया यह पौधा ,
मुरझा ना जाये ,
तू उदास ना हो जाये ,
रोज पानी देती हूँ ,
खाद देती हूँ ,
तेरे उगाए पौधे को ,
बहुत प्यार करती हूँ ,
मुरझाये पीले पत्तों की ,
काट छाँट करती हूँ ,
बस रह जाते हैं ,
हरे-हरे नर्म-नर्म,
कोमल मखमली पत्ते ,
अब तो फूल भी आ गये हैं ,
फल की आशा रखती हूँ ,
जिस दिन पहला फल आयेगा ,
तुझे ही समाचार दूँगी ,
तेरी देखरेख बगिया की ,
व्यर्थ नहीं जाने दूँगी ,
मेहनत से नहीं डरती ,
पूरी शक्ति लगा दूँगी ,
यह पेड़ फलफूल रहा है ,
दूसरा बोने की इच्छा है ,
उन्नत बीज तुझी से मिलेगा ,
खाद पानी की जुगत करूँगी ,
तभी वह चेत पायेगा ,
दिन रात बड़े जतन से ,
उसकी भी सेवा करूँगी ,
सबसे रक्षा करूँगी ,
सुगन्धित पुष्पों से जब ,
वह भी लड़ जायेगा ,
तुझे और उन सब को ,
जो प्रोत्साहित करते हैं ,
दिल से साधुवाद दूँगी !


आशा

है यह कैसा व्यवसाय

है कैसा व्यवसाय
जो फल फूल रहा
कुकर मुत्ते सा 
चाहे जहां दिख जाता 
रहते लिप्त सभी जिसमें
ऊपर से नीचे तक |
बिना बजन के
कोई फाइल नहीं हिलती
कितनी भी आवश्यकता हो
अनुमति नहीं मिलती
हें सजी कई दुकानें
यह व्यवसाय जहां होता |
देने वाला भी प्रसन्न
लेने वाला अति प्रसन्न
पहला सोचता है
कोई व्यवधान ना आए
दूसरा इसलिए कि
नव धनाड्य हो जाए |
हें जितने लोग लिप्त इसमें
ढोल में पोल की
कड़ी बने हें
धन अधिक पा जाने पर
हर संभव पूर्ती करते हें
दबी हुई आकांक्षा की
जब भय होता
पकडे जाने का
मुंह छिपाए फिरते हें
ले कर सहारा इसका ही
बेदाग़ छूट भी जाते हें
है यह विज्ञान या कला
विश्लेषण करना है  कठिन
विज्ञान में शोध होते हें
नियम सत्यापित भी होते हें
कला होती संगम भावनाओं का
मिलता नया रूप जिसे
भावनाओं से दूर बहुत
ना ही कोई नियम धरम
यह दौनों से मेल नहीं खाता
लगता सबसे अलग
इसे क्या कहें
घूसखोरी ,तोहफा या रिश्वत |
आशा

29 अक्टूबर, 2010

तुम हो एक सौदागर


तुम हो एक सौदागर
लुभाते अपने व्यक्तित्व से
अनजाने में कभी कभी
बातों को हवा देते 
भावनाओं को उभार कर
मन मस्तिष्क पर छाते गए
फिर कहीं चले गए
दर्द अजीब सा दे गए
नाम ह्रदय पर लिख गए |
यही सब यदि करना था
भुलाने की कोई विधि
तो बता कर जाते
या विस्मृति की
दवा ही दे जाते |
कभी किसी बात को
अधिक ही उछाल देते थे
पर किसी ने न जाना
कि तुम बेवफा थे |
तस्वीर जो दी तुमने
चैन से जीने नहीं देती
बहुत बेचैन करती है
अतीत याद दिलाती है |
लोग तुमसे जोड़ कर
मेरा नाम तक लेने लगे
जाने क्यूं ऐसा कहने लगे |
याद तो उन्हें किया जाता है
जो प्यार करते हों
या इस दुनिया में
अपना नाम कर गए हों |
जी चाहता है
कहीं तुम मिल जाओ
मेरी भावनाओं को
फिर से रंग जाओ
इन्तजार न रहे
ऐसा कुछ कर जाओ |
कहां तक सोचूं तुम्हारे लिए
कई ऋतुएं बीत गईं
अब तो लगता है
हर मौसम भी हरजाई |
आशा

28 अक्टूबर, 2010

हो शरद पूनम की रात

हो शरद पूनम की रात
और सर पर हो
माँ शारदे का हाथ
स्वर्णिम आभा होती है
होती है वर्षा अमृत की
उससे जो सुख मिलता है
कैसे विचारों में ढालूँ उसे
उस अदभुद दृश्य को
कैनवास पर उतारूं कैसे
चांद जब उतरता आंगन में
खुशियों से भर देता आंचल
उसे देख उत्पन्न भाव,
को कैसे अभिव्यक्ति दूं
शब्द नहीं मिलते
तब वाग देवी समक्ष होती है
कलम में लगी जंग दूर होती है
कुछ नया लिखने के लिए
अंतरद्वंद बढने लगता है
और जंग विचारों की
थमने का नाम नहीं लेती
कुछ नया सृजन होता है
 सुकून मन को मिलता है |

आशा

27 अक्टूबर, 2010

है अनूठा जलनिधि,

है अनूठा जल निधि
कभी शांत तो कभी रौद्र
जब भी शांत होता है
मन भावन दृश्य होता है
लहरों का आना जाना
फेनिल जल का तट छू जाना
सीपी घोंगे ,जाने क्या क्या
किनारों पर ही छोड़ जाना
उनका संचय अच्छा लगता है |
मछुआरों की नौकाएं
गहरे समुद्र तक जातीं हें
करती एकत्र सागर संपदा
देती संतुष्टि माझी को
जब शाम होने लगती है
सूरज अस्ताचल का
रुख करता है
तभी लौटती नौकाएं
जल पर तैरती उतरातीं
बार बार हिचकोले लेतीं
स्पर्धा करतीं लहरों से
दृश्य मनोहर लगता है |
बहुत दूर समुन्दर में
जहाज का मस्तूल
दिखाई देता है
मानो वह जहाज को
अपनी गोद में लिए बैठा है|
विश्रान्ति के पलों में माझी
खो जाता है सपनों में
तोयधि का गर्जन तर्जन
उसे विचलित नहीं करता ,
लहरों का साथ यदि न हो ,
उसे अच्छा नहीं लगता |
जब होता सागर अशांत
बड़ी बड़ी ऊंची लहरें
टकरातीं जब चट्टानों से
,वह अट्टहास करता है
जब कोई उत्तंग लहर
टकरा कर तट से
लौट रही होती
और एक अन्य लहर
उस पर से गुजरती है
दृश्य जलप्रपात सा दिखता है |
नाव समुन्दर में डालना
तब सरल नहीं होता
यदि टकरा जाए लहर से
फिरसे आ लगती है तट पर
कई बार प्रयत्न करते माझी
सफलता तभी मिल पाती है
नौका समुद्र में जा पाती है |
जब समुद्र उग्र होता है
अपना आपा खो देता है
तभी कहर टूटता है
हानि होती जन धन की |
फिरभी विशालता उसकी
,कई रहस्य समेटे रहती है |
उस अथाह जल राशी में
है अनूठा आकर्षण
बार बार खींच ले जाता
है विपरीत भावों का संगम
कभी शांत तो कभी उग्र |
छिपी अपार संपदा इसमें
कई लोगों को जीवन देता है
पर यदि आपा खो बैठे
कई जीवन हर लेता है |
आशा







,

26 अक्टूबर, 2010

है माँ तेरी


वह चाहती नहीं कि
कोई तुझसे कुछ कहे
है बस अधिकार उसी का
जो भी कहे वही कहे
तू भी कुछ न कहे
केवल सुने
और उसी से जुड़ा रहे
कोई अन्य अपना
वर्चस्व न जता पाए
ना ही तुझे भरमाए
तू है दूर मीलों उससे
फिर भी हर आहट
तेरी ही लगती है
तुझे अगर ठोकर लगे
वह जान लेती है
कुछ कर तो नहीं सकती
पर सचेत कर देती है
है माँ तेरी
 भला चाहती है तेरा
उसे स्वीकार नहीं
तू मनमानी करे
कठिन परिस्थिति से गुजरे
यदि कुछ उसकी सुने
विचार करे
सलाह का सत्कार करे
तभी शायद तुझे
सही राह मिल पाएगी
तेरी दशा सुधर पाएगी |
आशा

25 अक्टूबर, 2010

व्रत

एक दिन एक व्रत लिया
दिन भर खड़े रहने का
सारे दिन मौन रहने का
सोचा दिन भर चुप रहूंगी
एक भी शब्द ना कहूंगी
पर जैसे ही सुबह हुई
आवाजों का क्रम शुरू हो गया
और मौन टूट गया
उस पर भी  था उल्हाना 
जबाब क्यूं नहीं देतीं
कब से पुकार रहे हें
तुम ध्यान नहीं देतीं
इतना शुब्ध मन हुआ
बैठने का मन हुआ
और प्रण टूट गया
फिर सोचा पूजा करू
निर्जला व्रत रखूं
आधा दिन तो बीत गया
फिर सहनशक्ति ने कूच किया
और उपवास टूट गया
जब भी व्रत रखती हूं
कई व्यवधान आते हें
कारण चाहे जो भी हो
हो जाता है मन विचलित
सोच रही हूं अब मैं
कोई उपवास नहीं रखूं
आस्थाओं पर टिक न पाती
सारी महानत व्यर्थ जाती
ऐसे व्रत से लाभ क्या 
जो पूर्ण नहीं हो पाता
मन असंतुलित कर जाता
सत् कर्म से अच्छा
शायद ही कोई व्रत होता हो
मन चाहता उसी पर अडिग रहूं
आस्था उसी पर रखूं |
आशा

24 अक्टूबर, 2010

एक गज़ल लिखूं

दिल से आवाज आई है ,
कि एक गज़ल लिखूं
वीरान फ़िजाओं पर,
कुछ न कुछ कहूं ,
मंजर उदास लम्हों का ,
कैसे बयां करू,
लफ्ज़ों का कोई ,
ज़खीरा नहीं मिलता ,
दिल में उठे गुबार का ,
कोई हमराज नहीं मिलता ,
रहता हूं तन्हां तन्हां ,
अपना वजूद खोजता हूं ,
गर तेरे दामन की हवा ,
तनिक छू गई होती ,
शायद कोई सितम ,
और ना सहा होता ,
सिलसिला गज़ल का ,
शुरू हुआ होता ,
जलती शमा कि रोशनी में ,
परवाने की तरह ,
शब् भर रहा होता ,
नज्म यूँ ही न बनी होती ,
गर मेरे दिल से ,
आह न निकली होती |
आशा

23 अक्टूबर, 2010

पर्वत पर बिछी सफेद चादर

पर्वत पर बिछी श्वेत चादर
  और धवल धरा सारी  
लगती बेदाग़ सफेद चादर सी 
 है सिंधु उदगम यहीं पर 
 यह है रेगिस्तान बर्फ का
  दुनिया की सबसे ऊँची सड़क
 जिस पर गुजरते वाहन 
 नहीं वह भी अछूती बर्फ से 
 यदि विहंगम द्रष्टि डालें 
 दिखती है बिछी सफेद चादर सी 
 जाड़ा कम ही लगता है 
 जब गुजरते सड़क से 
 फिर भी भय रहता है 
 कहीं फिसल ना जाएं 
 कोई हादसा ना हो जाए 
, गाड़ी पिघलती बर्फ 
 और बर्फीला द्रश्य 
 कहीं कहीं पानी सड़क पर 
धीमी गति से गाडी बढ़ना 
 लगता है पैदल चल रहे हें 
एक ओर दीवार बर्फ की 
दूसरी ओर गहरी खाई 
रूह कांप जाती है 
जब दृष्टि पडती खाई पर 
वहाँ बने बंकरों में 
 रहते देश के रक्षक 
 होता जीवन कठिन उनका 
 पर सच्चे निगहवान देश के 
 सदा प्रसन्न होते हें 
 जब मिलते किसी भारत वासी से 
 देख उनकी कठिन तपस्या 
 श्रद्धा से नत होता मस्तक | 
आशा

22 अक्टूबर, 2010

है जीवन काँटों की बस्ती ,

है जीवन काँटों की बस्ती ,
जो भी इस में रहता है
,बच नहीं पाता उनसे ,
एक ना एक चुभ ही जाता है ,
सहन करना है बहुत कठिन ,
मिलता दंश जो उससे ,
कभी नहीं मिट पाता |
है जीवन दुखों का समुन्दर ,
यदि तैरना नहीं आता ,
कोई बाहर निकल नहीं पाता ,
तब डूब ही जाना है ,
व्यर्थ है हाथ पैर मारना |
हर ओर निराशा ही हो ,
आशा की किरण,
न दिखाई दे ,
हो छुपी कहीं गहरे में ,
उसकी एक झलक पा कर ,
जीवन हरा भरा होता है ,
पर है वह क्षणिक ,
उसमे यदि खो जाओ ,
स्वयं को भी भूल जाओ ,
ढेरों खुशियाँ आ सकती हें |
पर जीना केवल अपने लिए ,
है नहीं उचित किसी के लिए ,
है परोपकार भी आवश्यक ,
थोड़ा हित किसी का हो ,
तब उसमे है बुराई क्या |
जो कुछ भी करोगे,
वह यादों में रह जाएगा ,
जो किया अपने लिए,
उसे ना कोई जानेगा ,
ना ही तुम्हें पहचानेगा ,
तुम कृपण समझे जाओगे ,
यदि काम किसी के ना आओगे |
विहंगम द्रष्टि डाल कर देखो ,
जिसने भी परोपकार किया ,
छोड़ कर दुनिया भी चल दिया ,
पर दुनिया ने उसे,
बारम्बार याद किया ,
यथोचित सम्मान दिया |
आशा

21 अक्टूबर, 2010

उन यादों में खो जायें



यहां आओ पास बैठो हम उन यादों में खो जाएं
वे गीत गुनगुनाएं जो कभी गाया करते थे
उन्हें रचते थे एक दुसरे को सुनाया करते थे
मुझसे कहीं दूर न जा सकोगे

अटूट प्यार के बंधन को यूं ठुकरा न सकोगे
कैसे भुला पाओगे
जब भी यह मौसम आएगा उन यादों को साथ लाएगा
बार बार वहीँ ले जाएगा
जहां कभी हम मिलते थे अपनी रचनाएं गाते थे
कई धुनें बनाते थे
जब भी आँखें बंद करोगे याद आएंगे वे लम्हें
आखें नम हो जाएगीं
उन्हें विदा ना कर पाओगे
ऐसा कुछ भी तो नहीं था जिसे सच समझ बैठे
कुछ ऐसा कर गए
जिसे सोचना भी कठिन था
अब सीख लिया है वह चर्चा कभी ना हो
जो दिल में चुभ जाए
 घाव कर जाए हमें दुखी कर जाए
कभी लव पर वे बातें नहीं आएंगी
गैरों के समक्ष चर्चा का विषय ना बन पाएंगी
चिंता नहीं है कि लोग क्या कहेंगे
पर बंधन यदि टूटा
मुझे मिटा कर रख देगा जीवन वीरान कर देगा
है मेरी इच्छा बस इतनी
हम दौनों फिर से गीत लिखें पहले से प्यार मैं खो जाएं
मेरी  अधूरी चाह छोड़
तुम कहीं भी ना जा सकोगे
यदि भूले से हुआ ऐसा मुझे कभी ना पा सकोगे
फिर एकाकी कैसे रह पाओगे |
आशा

19 अक्टूबर, 2010

है कितना आकर्षण

तुम नहीं जानतीं ,
है कितना आकर्षण,
समझो या ना समझो ,
मैं कुछ कहना चाहता हूं ,
तुम्हें मांगना चाहता हूं ,
हूं बहुत उलझन में ,
क्या करूं ,किससे कहूं ?
दिन तो कट ही जाता है ,
पर रात काटना बहुत कठिन है ,
मैं तुम्ही में खोया रहता हूं ,
सपनों में तुम्हें देख,
नींद भी धोख दे जाती है ,
तुम्हारी कही हर बात ,
बार बार याद आती है ,
है कारण इसका क्या ,
मुझे नहीं मालूम ,
दिन में याद कहां जाती है ,
रात में ही क्यूं आती है ,
मैं नहीं जानता ,
मेरे लिए क्या सोचा तुमने ,
क्या विचार तुम्हारे मन में ?
पर है इतना अवश्य ,
आकर्षण प्रेम नहीं होता ,
उसे पाने के लिए ,
होता आवश्यक,
मध्यस्त का होना ,
अभी तक सोच नहीं पाया ,
आखिर वह होगा कौन ,
जो तुम तक पहुंचाएगा ,
तुम से संबंध जुड़वाएगा,
यदि तुम भी चाहो ,
और तुम्हारी इच्छा हो,
तभी कोई बात होगी ,
मेरी चाहत पूर्ण होगी ,
अनचाहा रिश्ता नहीं चाहता ,
हो कोई बोझ ह्रदय पर ,
मैं ऐसा भी नहीं चाहता ,
हो संबंध ऐसा,
जिसमें सहमत दौनों हों ,
खुशियां ही खुशियां हों ,
तभी सार्थक होता है ,
सफलता की,
प्रथम सीड़ी होता है |
आशा

17 अक्टूबर, 2010

हुई सुबह सूरज निकला

हुई सुबह सूरज निकला ,
हुआ रथ पर सबार ,
धीमी गति से आगे बढ़ा ,
दोपहर में कुछ स्फूर्ति आई ,
फिर अस्ताचल को चला ,
और शाम होगई ,
मन की बेचैनी और बढ़ गई ,
एकाकी सदासे रहता आया ,
ना कोई संगी नाकोई साथी ,
सूना घर सूना चौराहा ,
था बस तेरा इन्तजार ,
पर तू भी ना आया ,
सुबह से शाम यूंही होगी ,
बिना बात की सजा होगई ,
राह देख थक गई आँखें ,
मन पत्थर सा होने लगा ,
पर आशा की एक किरण ,
कहीं छिपी मन के अंदर ,
उसकी एक झलक नजर आई ,
जब दस्तक दी दरवाजे पर ,
होने लगा स्पंदित मन ,
देख तुझे अरमान जगे ,
मन को कुछ सुकून मिला ,
पत्थर पिघला मोम हुआ ,
सारी बेचैनी सारा गुस्सा ,
जाने कहां गुम हो गया ,
मेरी बगिया गुलजार कर गया |
आशा







,

16 अक्टूबर, 2010

बस एक आस

बस एक आस ,
ओर आत्म विश्वास ,
जीवन में भरते प्रकाश ,
होती इतनी गहराई ,
ओर सच्चाई,
अटूट ह्रदय मै ,
तभी टिक पाता है,
कोइ विचार ह्रदय मै ,
कोइ झूमे वह झूमता है ,
गीतों के साथ गुनगुनाता ,
नहीं चाहता ,
अवसाद कोइ ,
मंथर गति से चलता है ,
गतिमान उसे,
करने के लिए ,
बस काफी है,
एक आस ,
ओर यदि मिल जाए ,
साथ आत्म बिश्वास का ,
तब कोइ नहीं,
रोक पाता ,
विचारों मै,
व्यवधान न आता,
चिंतन मनन,
सतत चलता है ,
निरंतरता उसमे होती है
,जीवन भी,
अस्थिर नहीं रहता ,
बहुत सरल हो जाता है ,
कोइ भी बंधन तब ,
उसे बांध नहीं पाता ,
बहता निर्मल जल सा ,
विचलित ना हो पाता ,
सदा प्रफुल्लित रहता |
आशा

15 अक्टूबर, 2010

है आखिर ऐसा क्या

प्रकाश सदा सोचता था ,
है आखिर ऐसा क्या ,
आते ही उसके ,
अन्धकार कहीं छिप जाता है ,
हर बार विचार आता था ,
ऐसा क्यूँ करता है ,
कमरे में एक दिन ,
अचानक प्रकाश जा पहुंचा ,
उसे देख अन्धकार ,
पिछले कमरे में दुबक गया ,
प्रकाश चुप ना रह पाया ,
बोला इतना क्यूँ डरते हो ,
मैं जब भी आता हूँ ,
मिलना भी नहीं चाहते ,
चल देते हो |
धीरे से झाँक कर ,
तम सहमा सा बोला ,
मैं तुमसे डरता हूँ ,
ओर तुम्हारी आभा से |
उन लोगों की बातों से ,
जो कहते हें ,
जब तुम होते हो ,
हर और उजाला होता है ,
वे तभी कार्य करपाते हें ,
उन्हें तुम्हारा ही,
इन्तजार रहता है |
मेरे कदम पड़ते ही ,
भूत पिशाच नजर आते हें ,
तांत्रिक जाल बिछाते हें ,
कुछ शमशान जगाते हें ,
कई गुनाह पलते हें ,
बदनाम मुझे कर देते हें ,
साए में मेरे ,
काम भी काले होते हें |
यह सत्य नहीं है भाई ,
तुममे हें गुण इतने ,
क्या कभी विचार किया तुमने ,
यदि छत्र छाया,
तुम्हारी ना होती ,
विश्राम सभी कैसे करते ,
चाँद तारे स्वागतार्थ तुम्हारे ,
सदा तत्पर कैसे रहते |
अन्धकार फिर मुखर हुआ ,
कई रंग छिपे हें तुममे ,
कभी अलग तो कभी साथ ,
दिखता रंगों का चमत्कार ,
मेरा है बस एक रंग ,
वह भी सौंदर्य से कोसों दूर ,
उन्हीं को साथ लिए फिरता हूं ,
हें जो खानअवगुणों की ,
मैं तुमसा कभी ना हो पाउँगा ,
इसी लिए दूर रहता हूं |
प्रकाश चुप ना रह पाया ,बोला
सब सर्वगुण संपन्न हीं होते ,
कई बार मेरे क्रोध की तीव्रता ,
बहुतों को कष्ट देजाती है ,
ना तुम पूर्ण हो और नाही मैं ,
साथ यदि रहना भी चाहें ,
प्रकृति साथ नहीं देती ,
इसी लिए हें हम तुम अलग ,
पर दुश्मन नहीं हें |
आशा

12 अक्टूबर, 2010

सादर वंदन

हे सुमन ,तुम हो शिव ,हो मंगल ,
तुम्हें मेरी सादर वंदन ,
जब तुम थे बाल सुमन ,
लोग बहुत प्यार देते थे ,
तुम्हें अनवरत देखा करते थे ,
जैसे जैसे वय बढ़ती गई ,
सौंदर्य बोध ने बहकाया ,
मदिरा का प्याला भी छलकाया,
पर कर्तव्यों से पीछे न हटे ,
हर चुनौती की स्वीकार ,
कहीं भी असफल ना रहे ,
नियमित जीवन संयत आचरण ,
जीवन के थे मूल मंत्र ,
अध्ययन ,मनन और चिंतन ,
में थी गहन पैंठ ,
मूर्धन्य साहित्यकार हुए ,
तुम्हारी कृतियों की,
कोई सानी नहीं है ,
प्रशंसकों की भी कमी नहीं है ,
इस दुनिया से दूर बहुत हो ,
पर कण कण में बसे हुए हो ,
साँसों का हिसाब किया करते थे ,
आज हो बहुत दूर उनसे ,
पहचान यहाँ की है तुमसे ,
हो वटवृक्ष ऐसे ,
जिसके आश्रय में आ कर ,
कई हस्तियाँ पनप गईं हें ,
आकाश की उचाई छू रही हें ,
है मेरा तुमको सादर नमन |
आशा

11 अक्टूबर, 2010

वे बेवफा नहीं हें

उदास होते हुए भी ,
दुखी नहीं हूं ,
है विश्वास खुद पर ,
लाचार नहीं हूं ,
सताया बहुत दुनिया ने ,
पर दोषी नहीं हूं ,
ना चाहते हुए भी ,
चुप हूं ,
कहना बहुत है ,
पर मौन हूं ,
जोड़ा है नाता,
ग़मों से ,
हाथ मिलाया,
है उनसे ,
क्यूँ कि वे ,
बेवफा नहीं हें,
है दुनिया उनकी भी ,
अब उसी में,
खो गई हूं ,
पर बातें कल की,
याद जब आतीं हें ,
जग की,
निष्ठुरता की ,
पहचान कराती हें ,
जान गई हूं ,
समझ गई हूं ,
है क्या अर्थ,
निष्ठुरता का ,
साहस भी है,
कहने का ,
पर शब्द होंटों तक ,
आकर लौट जाते हें ,
परिणीति है यह ,
ग़मों के साथ जीने की ,
उन्हीं में,
डूबे रहने की ,
उनसे सीखी,
सहनशीलता ,
और सीमाएं उसकी ,
वे सदा,
साथ निभाते है ,
जब भी हाथ बढाया ,
साथ खड़े,
हो जाते हें ,
मित्रता निभाते हें ,
कितनी भी विषम ,
परिस्थिती हो ,
मैं उन्हीं में,
डूबी रहती हूं ,
तभी अपने को ,
सम्हाल पाती हूं |
आशा

10 अक्टूबर, 2010

हे शक्ति दायनी


हे शक्तिदायानी वर दायनी ,
हे कल्याणी ,हे दुर्गे ,
तुम्हारे द्वार पर जो भी आता ,
खाली हाथ नहीं जाता ,
पूर्ण कामना होती उसकी ,
जो भी तुम्हें मन से ध्याता ,
है उसकी झोली खाली क्यों?
उसने तो सभी यत्न किये ,
तुम्हें पूरी तरह मनाने के ,
भक्ति भाव में डूबा था ,
फिर रही कहाँ कमी ,
यदि इसका भान करा देतीं,
कठिन परीक्षा ना लेतीं ,
वह भव सागर से तर जाता ,
इस जीवन से मुक्ति पाता ,
उसकी झोली खाली थी ,
आज तक भी भरी नहीं है ,
कोई उपाय सुझाया होता ,
वह ठोकर नहीं खाता ,
यदि गिरता भी तो सम्हल जाता ,
बड़े अरमान थे बेटी के ,
तुम बेटी बन कर आजातीं ,
वह तुम्हारे और निकट होता ,
तुम में ही खोता जाता ,
यश गान तुम्हारा सदा करता ,
संतुष्टि का अनुभव करता |
आशा

कुछ ना कुछ सीख देती है ,

आदित्य की प्रथम कीं ,
भरती है जीवन ऊर्जा से ,
कलकल बहता जल सरिता मै ,
सिखाता सतत आगे बढना ,
जल स्त्रोत सिखाता है ,
कपट ह्रदय मै कभी न रखना ,
निर्मल जल से सदा रहना ,
कोकिला की कुहुक कुहुक ,
देती सन्देश मीठी वाणी का ,
हरी भरी वादी कहती ,
सदा विहसते रहना ,
शाम ढले पक्षी समूह ,
जब आसमान मै करते विचरण ,
लगते बहुत अधीर ,
गंतव्य तक पहुंचने के लिए ,
उन्हीं दीख लगता है ,
द्वार पर बैठ राह कोइ देख रहा ,
उसके भी धर लौटने की ,
चाँद चांदनी ओर आकाश ,
जिसमे दिखती आकाश गंगा ,
उसमे चमकते तारे अनेक ,
होता परिचय प्राकृतिक सौंदर्य का ,
प्रकृति की अनुपम छटा ,
हर और दिखाई देती है ,
कुछ न कुछ सीख देती है ,
जो होती है बहुत अमूल्य ,
प्रकृति से छेड़छाड ,
दुःख से भर देती है ,
पर्यावरण का संकल्प ।
बहुत महत्व रखता है ,
जो भागीदार होता इसका ,
वृहद कार्य करता है |
आशा

09 अक्टूबर, 2010

लक्ष्मण रेखा

क्यूं बंद किया
लक्ष्मण रेखा के घेरे मै
कारण तक नहीं समझाया
ओर वन को प्रस्थान किया
यह भी नहीं सोचा
मैं हूँ   एक मनुष्य 
स्वतन्त्रता है अधिकार
यदि आवश्कता हुई
अपने को बचाना जानती
पर शायद यहीं मै गलत थी
अपनी रक्षा कर न सकी
 बचा न सकी खुद को रावण से
मैं कमजोर थी अब समझ गयी हूं
यदि तुम्हारा कहा सुन लिया होता
अनर्गल बातों से दुखित तुम्हें न किया होता
दहलीज पार न करती
हा राम हा राम कि आवाज सुन
राम तक पहुंचने के लिए
कष्ट मैं उन को  देख
सहायतार्थ जाने के लिए
तुम्हें बाध्य ना किया होता
मैं लक्ष्मण रेखा पार नहीं करती
रावण को भिक्षा देने के लिए
दहलीज  पार न करती
यह दुर्दशा नहीं होती
विछोह भी न सहना पड़ता
अग्नि परीक्षा से न गुजरना पड़ता
धोबी के कटु वचनों से
मन भी छलनी ना होता
क्या था सही ओर क्या गलत
अब समझ पा रही हूं
इसी दुःख का निदान कर रही हूं
धरती से जन्मी थी
फिर धरती में समा रही हूं |
आशा