19 फ़रवरी, 2012
है कैसी दुविधा
16 फ़रवरी, 2012
दोषी कौन
और खलनायक
सोच न पाया
वही दीखता
प्रसन्नता छलकने लगेगी
13 फ़रवरी, 2012
अब अनजान नहीं
एक नई राह पर
अजनवी राह चुनी
गहन आत्मविश्वास से
आशा
11 फ़रवरी, 2012
कह जाती कुछ और कहानी
बंधन में पहले भी न था
08 फ़रवरी, 2012
क्षणिकाएं
07 फ़रवरी, 2012
साथ चला साये सा
अशांत मन लिए
05 फ़रवरी, 2012
प्रतीक्षा
वह नहीं मिल पाई
03 फ़रवरी, 2012
पहाड़ उसे बुला रहे
31 जनवरी, 2012
भटकाव
28 जनवरी, 2012
स्वर नहीं मिलते
26 जनवरी, 2012
बेटी
24 जनवरी, 2012
अपेक्षा
19 जनवरी, 2012
आशा अभी बाकी है
15 जनवरी, 2012
क्यूँ न वर्तमान में जी लें
12 जनवरी, 2012
मृग तृष्णा
नजरें टिकाए द्वार पर|
तेरी राह देखने में
10 जनवरी, 2012
गहन विचार
है गहराई कितनी उनमें
07 जनवरी, 2012
स्याही रात की
सूना जीवन उदास शाम
04 जनवरी, 2012
अफवाहें
ना कभी आँखें हुईं चार
ना ही उपजा कभी प्यार |
फिर भी ऐसा क्यूँ ?
मनचलों बेरोजगारों की
शायद फितरत है यही
कटाक्ष कर प्रसन्न होने की |
मन ही मन ग्लानी होती है
उनकी सोच कितनी छोटी है
यदि अफवाहें तुम तक पहुंची
तुम भी क्या वही सोचोगी
जो मैं सोच रहा हूँ ?
आशा
01 जनवरी, 2012
शब्द
अनेक शब्द अनेक अर्थ
कैसे ध्यान सब का रहे
हैं अनेक तारे अर्श में
गिनने की कोशिश कौन करे |
आशा
29 दिसंबर, 2011
आने को है नया साल
27 दिसंबर, 2011
सुगंधित बयार
25 दिसंबर, 2011
सांता क्लाज

कहाँ से आए
बच्चों से तुम्हारा कैसा नाता
वे पूरे वर्ष राह देखते
मिलने को उत्सुक रहते |
क्या नया उपहार लाये
झोली में झांकना चाहते
बहुत प्रेम उनसे करते हो
वर्ष में बस एक ही बार
आने का सबब क्यूं न बताते |
बहुत कुछ दिया तुमने
प्यार दुलार और उपहार
सभी कुछ ला दिया तुमने
सन्देश प्रेम का दिया तुमंने |
तभी तो हर वर्ष तुम्हारा
इन्तजार सभी करते हैं
आवाज चर्च की घंटी की सुन
खुशी से झूम उठते हैं |
हैप्पी क्रिसमस ,मैरी क्रिसमस
बोल गले मिलते हैं
तुम्हारे आगमन की खुशी में
गाते नाचते झूमते झामते
केक काट खाते मिल बाँट
मन से जश्न खूब मनाते |
आशा
23 दिसंबर, 2011
अंदाज अलग जीने का
हूँ स्वप्नों की राज कुमारी
या कल्पना की लाल परी
पंख फैलाए उडाती फिरती
कभी किसी से नहीं डरी |
पास मेरे एक जादू की छड़ी
छू लेता जो भी उसे
प्रस्तर प्रतिमा बन जाता
मुझ में आत्म विशवास जगाता |
हूँ दृढ प्रतिज्ञ कर्तव्यनिष्ठ
हाथ डालती हूँ जहां
कदम चूमती सफलता वहाँ |
स्वतंत्र हो विचरण करती
छली न जाती कभी
बुराइयों से सदा लड़ी
हर मानक पर उतारी खरी |
पर दूर न रह पाई स्वप्नों से
भला लगता उनमें खोने में
यदि कोइ अधूरा रह जाता
समय लगता उसे भूलने में |
दिन हो या रात
यदि हो कल्पना साथ
होता अंदाज अलग जीने का
अपने मनोभाव बुनने का |
आशा
20 दिसंबर, 2011
सुकून
जब भी मैंने मिलना चाहा
सदा ही तुम्हें व्यस्त पाया
समाचार भी पहुंचाया
फिर भी उत्तर ना आया |
ऐसा क्या कह दिया
या की कोइ गुस्ताखी
मिल रही जिसकी सजा
हो इतने क्यूँ ख़फा |
है इन्तजार जबाव का
फैसला तुम पर छोड़ा
हैं दूरियां फिर भी
यूँ न बढ़ाओ उत्सुकता
कुछ तो कम होने दो
है मन में क्या तुम्हारे
मौन छोड़ मुखरित हो जाओ |
हूँ बेचैन इतना कि
राह देखते नहीं थकता
जब खुशिया लौटेंगी
तभी सुकून मिल पाएगा |
आशा




















