01 अगस्त, 2012

उड़ चला पंछी


उड़ चला पंछी कटी पतंग सा
अपनी यादें छोड

समस्त बंधनों से हो  मुक्त 
उस अनंत आकाश में
छोड़ा सब कुछ यहीं
यूँ ही इसी लोक में
बंद मुट्ठी ले कर आया था
आते वक्त भी रोया था
इस दुनिया के
प्रपंच में फँस कर
जाने कितना सह कर
इसी लोक में रहना था
आज मुट्ठी खुली हुई थी
जो पाया यहीं छोड़ा
पुरवासी परिजन छूटे
वे रोए याद किया
अच्छे कर्मों का बखान किया
पर बंद आँखें  न खुलीं
वह चिर निद्रा में सो गया
वारिध ने भी दी जलांजलि
वह बंधन मुक्त  हो गया
पञ्च तत्व से बना पिंजरा
अग्नि में विलीन हो गया |
आशा















30 जुलाई, 2012

कैसा है सम्बन्ध


मैं दीपक तुम बाती
मिट्टी मेरी माँ
हूँ कठोर
नष्ट तो हो सकता हूँ
पर जल कर राख नहीं
तुम बाती
जन्मीं कपास से
आहार जिसे मिला
मेरी ही माँ से
तुम कोमलांगी गौर वर्ण
स्नेह से भरपूर
ज्वाला सी जलतीं
कर्तव्य समझ अपना
तम हरतीं
अपनी आहुति देतीं
पर हितार्थ
है सम्बन्ध अटूट
मेरा तुम्हारा
मैं कठोर पर तुम कोमल
यह कैसा संयोग
गहरी श्वास ले
तुम तो चली जाती हो
एक अमिट काली लकीर
यादों की मुझ पर
छोड़ जाती हो
जब रह जाता एकल
कभी तोड़ दिया जाता
या फैक दिया जाता हूँ
है  कैसा सम्बन्ध
परस्पर हम दौनों में
मैं सोच नहीं पाता |
आशा 

27 जुलाई, 2012

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद


उपन्यास सम्राट श्री प्रेमचन्द (1880-1936) का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था |हिन्दी और उर्दू दौनों ही भाषा पर उनका  सामान अधिकार था |अपने लेखन के लिए दौनों ही भाषाओं का उपयोग किया प्रारम्भ में उर्दू नें लिखा फिर बाद में हिन्दी में |साहित्य में यथार्थवादी परम्परा की नीव रखी |उन्हें हिन्दी कहानी का पितामह माना गया है |उस समय की परिस्थितियों का इतना सजीव वर्णन उनकी रचनाओं में है कि आज भी उनका उतना ही महत्त्व है जो पहले था |३३ वर्ष के रचनात्मक जीवन में वे साहित्य की ऐसी विरासत छोड़ गए जो गुणात्मक दृष्टि से अमूल्य है |अपने साहित्य में जीवन के विभिन्न रूपों को बहुत मनोयोग से उकेरा है |उन्हें शत शत नमन |
यह छोटी सी रचना है :-
जिसने जन्म लिया
उसे तो जाना ही है
लंबा सफर जीवन का
जो पीछे छूट गया
आने वाली पीढ़ी  के लिए
खजाने सा छोड़ जाना है
सशक्त लेखिनी के उदगारों से
गहराई तक रची बसी
कालजई रचनाएँ
हैं महत्त्व पूर्ण  आज भी
बीता कल तो रीत गया
पर वर्तमान में भी
जीवंत उसे कर जाता है |
आशा


25 जुलाई, 2012

आदत सी हो गयी है

कुछ बड़े कुछ छोटे छोटे 
 समेटे हुए बहुत कुछ
 कल आज या भविष्य की 
या कल्पना जगत की 
 कुछ कहते कुछ छिपा जाते 
रंगीन या श्वेत श्याम
 चित्रों से सजाए जाते 
 विश्वसनीय दिखाई देते
 पर सारे सच भी नहीं होते
 होते स्वतंत्र विचारों के पक्षघर
 फिर भी प्रभावित किसी न किसी
से कुछ उपयोगी कुछ अनुपयोगी
 सामिग्री परोसते सजा कर
 विभिन्न कौनों में तस्वीरें भी लुभातीं
 बहुत कुछ कहना चाहतीं 
आदत सी हो गयी है
 सर्व प्रथम प्रातः
 उसे हाथ में थामने की 
 उससे चिपके रहने की
 सरसरी नजर से उसे टटोलने की
 यदि किसी दिन ना मिल पाए
 चाय में चीनी भी कम लगती 
 आदत जो पड़ गयी है
 हाथ में कप चाय का ले
 सुबह अखबार पढने की |

23 जुलाई, 2012

था उसका कैसा बचपन


 जाने कब बचपन बीता
यादें भर शेष रह गईं
थी न कोई चिंता
ना ही जिम्मेदारी कोई
खेलना खाना और सो जाना
चुपके से नजर बचा कर
गली के  बच्चों में खेलना
पकडे जाने पर घर बुलाया जाना
कभी प्यार से कभी डपट कर
जाने से वहाँ रोका जाना
तरसी निगाहों से देखना
उन खेलते बच्चों को
मिट्टी के घर बनाते
सजाते सवारते
कभी तोड़ कर पुनः बनाते
किसी से कुट्टी किसी से दोस्ती
अधिक समय तक वह भी न रहती
लड़ते झगड़ते दौड़ते भागते
बैर मन में कोई न पालते
ना फिक्र खाने की ना ही चिंता घर की
ना सोच छोटे बड़े का
ना भेद भाव ऊँच नीच का
सब साथ ही खेलते 
साथ  साथ रहते
वह बेचारा अकेला
कब तक खेले
उन बेजान खिलौनों से
ऊपर से अनुशासन झेले
यह करो यह न करो
वह सोच नहीं पाता
मन मसोस कर रह जाता
ललचाई निगाहों से ताकता
उन गली के बच्चों को
अकेलापन उसे सालता
था उसका कैसा बचपन |
आशा

20 जुलाई, 2012

ध्येय मेरा

नहीं आसान इस लोक में 
दुर्गम मार्ग से जाना 
सकरी बीथिका में 
कंटकों से बच पाना 
पर  एक लक्ष्य एक ध्येय 
देता संबल मुझे 
तुझ तक पहुँचने का 
तुझ में रमें रहने का 
मन में व्याप्त आतुरता 
खोजती तुझे 
दीखता जब पहुँच मार्ग 
कोई बंधन, कोई आकर्षण 
या  हो मोह ममता
सब बोझ से लगते
 उन् सब से तोड़ा नाता 
श्याम सलौने तुझसे 
जब से जोड़ लिया नाता 
खुद  को भी भूल गया
तुझ  में मन खोया ऐसा 
तेरी  मूरत में डूबा 
साक्षात्कार हो तुझसे 
है बस यही ध्येय मेरा |
आशा




18 जुलाई, 2012

मैं मनमौजी


मैं मनमौजी रहता मगन
अपनी ही दुनिया में 
भावनाओं में बहता 
कल्पना की उड़ान भरता 
उड़ान जितनी ऊंची होती 
कुछ नई  अनुभूति होती 
वन उपवन में जब घूमता 
वृक्षों  का हमजोली होता 
पशु पक्षियों को दुलराता 
कहीं  साम्य उनमें पाता 
जब  बयार पुरवाई बहती 
जीवन में रंग भर देती 
बैठ कर सरोवर के किनारे
जल की ठंडक महसूस कर
किनारे  की गीली रेत पर
कई आकृतियाँ उकेरता 
रेती से घर बनाना 
फूलों से उसे सजाना 
मन  को आल्हादित करता
नौका  में बैठ कर अकेले 
उस पार  आने जाने में 
जल में क्रीड़ा करने में 
मन मगन होता जाता 
जाने कब चुपके से 
बचपन  पास आ खडा होता 
कागज़ की नौका बना 
जल में प्रवाहित करता 
बढती नौका के साथ साथ 
दौड लगाना चाहता 
रूमाल  से मछली  पकडने का 
आनंद भी कुछ कम नहीं 
खुद को रोक नहीं पाता 
बचपन में ही खो जाता |
आशा








16 जुलाई, 2012

प्यासा मन


प्यासी धरती प्यासा सावन
प्यासा पपीहे का तन मन
घिर आई काली बदरिया
पर वह न आए आज तक
आगमन काली घटाओं का
नन्हीं जल की बूंदों  का
हरना चाहता ताप तन मन का
पर यह हो नहीं पाता
अब है हरियाली ही हरियाली
जहाँ तक नजर डाली
भीगे भीगे से सनोवर
उल्लसित होते सरोवर
फिर भी विरहणी की उदासी
कम होने का नाम न लेती
जब पिया का साथ न होगा
प्यासा मन प्यासा ही रहेगा |
आशा


14 जुलाई, 2012

बढ़ते चरण महगाई के

सुरसा राक्षसी

बढ़ते चरण मंहगाई के
जीना दुश्वार कर रहे
आज है यह हाल जब
कल की खबर किसे रहे
यादें सताती है
कल के खुशनुमा दिनों की
मन पर अंकुश तब भी था
पर हर वस्तु लेना संभव था |
बात आज की क्या करें
ना तो  नियंत्रण मन पर
ना ही चिंता भविष्य की
‘बस इस पल में जी लें ‘
है अवधारणा आज की
 है हाल बुरा मंहगाई का
अंत नजर ना आता इसका
सुरसा का मुँह भी लगता छोटा
इसका कोई हल ना होता |

आशा









12 जुलाई, 2012

जज्बा प्यार का



भावनाएं हो तरंगित
लेती हिलोरें मन में
जल में उठती लहरों सी
होती तरंगित दौनों ओर
सामान रूप से
जब होती आंदोलित
बांधती उन्हें
अगाध प्रेम के बंधन में
छोड़ती अमित छाप
अग्रसर होते जीवन में
यही है जज्बा प्यार का
बंधन होता इतना प्रगाढ़
कोई प्रलोभन
कोई आकर्षण
या यत्न इसे डिगाने के
बंधन तोड़ नहीं पाते
सभी विफल हो जाते
सरल नहीं इसे भुलाना
छिप जाता है
अंतस के किसी कौनेमें
हो यदि अलगाव
उससे उत्पन्न वेदना
असहनीय होती
मन में कसक पैदा करती
यही बेचैनी यही कसक
सदैव ही बनी रहती
कहानी प्यार की
अधूरी ही रह जाती |
आशा


10 जुलाई, 2012

कैसी संस्कृति


आलीशान अट्टालिकाएं
गगनचुम्बी इमारतें बहुमंजिली
विभिन्न वर्ग यहाँ पलते
साथ साथ रहते
भूल् गए  कहाँ से आए ?
हैं कौन ?क्या थे?
और क्या संसकृति उनकी ?
बस एक ही संसकृति महानगर की
दिखाई देती यहाँ वहाँ |
हैं व्यस्त इतने कि
घर पर ध्यान नहीं देते
छोटे मोटे काम भी
स्वयंनहीं करते  |
इन्हीं के बल पल रही
पास ही झोंपड़पट्टी
नारकीय जीवन जीते
 यहाँ के रहवासी |




कचरे के अम्बार में से
कुछ खोजते एकत्र करते
सहेजत बच्चे
पौलीथीन के थैले में |
कर्मठता से खुश हो
शाम पड़े जाते
पाते कुछ पैसे कवाड़ी से
उस कवाड़ के बदले में |
महिलाएं प्रातः रुख करतीं
नगर की ओर
और हो जातीं हिस्सा
उसी संसकृति का |
पैसा हर काम का मिलता
पर जीवन सत्व निचोड़ लेता
जब शाम पड़े बापिस आतीं
फटी टूटी कथरी ही
सबसे बड़ी नियामत लगती
थकी हारी वे सो जातीं
गहरी नींद के आगोश में
तभी वहाँ एक वर्ग जागता रहता
कभी नशे में धुत्त रहता
किसी गुनाह को अंजाम देता
उसे ही अपना कर्म समझता
आय का स्त्रोत समझता
यहाँ पनपते कई गुनाह
साए में अन्धकार के
आकंठ डूबे वे नहीं जानते
क्या होगा अंजाम ?
बस आज में जीते हैं
कल की चिंता नहीं  पालते |


आशा

08 जुलाई, 2012

यूं ही नहीं जीता

यूँही नहीं जीता
पीता हूँ ग़म भुलाने के लिए
जीता हूँ पीने के लिए
 दर्देदिल छिपाने के लिए |
मदहोश कदम आगे जाते
वहीँ जा कर रुक जाते
होते अधीर अतृप्त अधर
और अधिक की चाहत रखते
ग़म भुलाने की लालसा
यहाँ तक खींच लाई
 ना हाला हलक तर कर पाई
ना ही साकी बाला आई |
लहराता झूमता झामता
नितांत अकेला
निढाल सा गिरता सम्हलता
पर सहारा किसी का न पाता |
फबतियां कानों में पडतीं
आदतन है शराबी
घर फूँक वहीँ आता
जहाँ अपने जैसे पाता |
सच कोई नहीं जानता
हालेदिल नहीं पहचानता
 छींटाकशी शूल सी चुभती 
फिर भी उसी ओर जाता
आशा 



07 जुलाई, 2012

शासन की डोर न सम्हाल सके


शासन की डोर न सम्हाल सके
सारे यत्न असफल रहे
मोह न छूटा कुर्सी का
 क्यूंकि लोग सलाम कर रहे |
ना रुकी मंहगाई
ना ही आगे रुक पाएगी
अर्थ शास्त्र के नियम भी
सारे  ताख में रख दिए |
अर्थशास्त्री बने रहने की लालसा
फिर भी बनी रही
जहाँ भी कोशिश की
पूरी तरह विफल रहे |
सत्ता से चिपके रहने की
भूख फिर भी न मिटी
कुर्सी से चिपके रहे
बस नेता हो कर रह गए |
आशा

02 जुलाई, 2012

पहली फुहार


टपकता पसीना
सूखे नदी नाले
सूखे सरोवर सारे
पिघलते हिम खंड
कराते अहसास गर्मीं का
हैं बेहाल सभी
बेसब्री से करते
इन्तजार जल प्लावन का
छाई घन घोर  घटाएं
वारिध भर लाए जल के घट
उनसे बोझिल वे आपस में टकराते
गरज गरज जल बरसाते
दामिनी दमकती
 हो सम्मिलित खुशी में
नभ में आतिशबाजी होती
झिमिर झिमिर बूँदें झरतीं |
मौसम की पहली बारिश से
धरती भीगी अंचल भीगा
मिट्टी की सौंधी खुशबू से
मन का कौना कौना महका |


 दादुर मोर पपीहा बोले
वन हरियाए उपवन सरसे
गर्मीं की हुई विदाई
चारों ओर हरियाली छाई |




आशा




28 जून, 2012

सुरूर

वही दिन वही रात 
वही सारी कायनात 
कुछ भी नया नहीं 
फिर  भी कुछ सोच 
कुछ दृश्य अदृश्य
दिखाई दे जाते 
कुछ खास कर 
गुजर जाते
फिर शब्दों की हेराफेरी 
जो  भी लिखा जाता 
नया ही नजर आता 
खाली आसव की बोतल में
भर कर उसे परोसा जाता 
बोतल बदलती 
साकी बदलती
पर हाला का प्रभाव
  बदल  नहीं पाता 
उससे उत्पन्न सुरूर में
कुछ कहता 
कुछ छुपा जाता 
जो कहना चाहता 
बेखौफ़ कहता
होगा क्या परिणाम 
वह सोच नहीं पाता |

आशा



26 जून, 2012

उलझन सुलझे ना


यह कैसा सुख  कैसी शान्ति
कहाँ नहीं खोजा इनको
मन नियंत्रित करना चाहा
 भटकाव कम न हो पाया
यत्न अनेकों किये
पर दूरी कम ना हुई इनसे
किये कई अनुष्ठान
पूजन अर्चन
दिया दान मुक्त हस्त से
फिर भी दूर न रह पाया
पूर्वाग्रहों की चुभन से 
प्रकृति का आँचल थामा
उनसे बचने के लिए
घंटों नदी किनारे बैठा
आनंद ठंडी बयार का
तब भी उठा नहीं पाया
देखे पाखी अर्श में
कलरव करते उड़ाते फिरते
कहीं कहीं दाना चुगते
चूंचूं  चीं चीं में उनकी
मन रम नहीं पाया
देखा नभ आच्छादित
चाँद और सितारों से
शान्ति तब भी न मिली
खोया रहा विचारों में
प्रसन्न वदन खेलते बच्चे
बातों से आकर्षित करते 
पर वह  तब भी न मिला
जिस की तलाश में भटक रहा
अंतस में चुभे शूल
चाहे जब जाने अनजाने
दे जाते दर्द ऐसा
जिसकी दवा नहीं कोई
बोझ दिल का बढ़ जाता
उलझन भरी दुनिया में
सफलता   या असफलता
या सुख दुःख की नौक झोंक
दिखाई दे जाती चहरे पर
तब है पूर्ण सुखी की अवधारणा
कल्पना ही नजर आई 
उलझन सुलझ नहीं पाई |
आशा


24 जून, 2012

पाषाण ह्रदय

कई बार सुने किस्से
 सास बहू के बिगडते
बनते तालमेल के 
विश्लेषण का अवसर न मिला
जब बहुत करीब से देखा 
अंदर झांकने की कोशिश की 
बात बड़ी स्पष्ट लगी 
यह कटुता या गलत ब्यवहार 
इस रिश्ते की देन नहीं 
है  यह पूर्णरूपेण व्यक्तिगत
जो जैसा सहता है देखता है 
वैसा ही व्यवहार करता है 
मन की कठोरता निर्ममता 
करती असंतुलित इसे 
सास यह भूल जाती है 
बेटी उसकी भी 
किसी की तो बहू बनेगी 
जो  हाथ बेटी पर न उठे 
वे कैसे बहू पर उठते है 
क्या यह दूषित सोच नहीं 
है अंतर बहू और बेटी में 
क्यूं फर्क फिर व्यवहार में 
वह  भी तो किसी की बेटी है 
प्यार पाने का हक रखती है ||
आशा




21 जून, 2012

है कितना अकिंचन

एक नन्हां सा तिनका
समूह से बिछड़ा हुआ
राह में भटक गया
 बारम्बार सोच रहा
 जाने कहाँ जाएगा
होगा क्या हश्र उसका
 और कहाँ ठौर उसका
 यदि पास दरिया के गया  
बहा ले जाएगी उसे
उर्मियाँ अनेक होंगी 
उनके प्रहार से हर बार
क्या खुद को बचा पाएगा
यदि फलक पर
वजूद अपना खोजेगा


चक्रवात में फंसते ही
घूमता ही रह जाएगा
आगे बढ़ना तो दूर रहा
वहीँ फंसा रह जाएगा




   लगती उसे धरा सुरक्षित
पर अरे यह क्या हुआ 
 मनुज के पग तले आते ही
 जीवन उसका तमाम हुआ 
है कितना अकिंचन
कितना असहाय
सोचने के लिए अब 
 कुछ भी बाकी नहीं  रहा |
आशा













                                                                                                                                                                                              

19 जून, 2012

जकड़ा चारों ने ऐसा




बीत गया बचपन
ना कोई चिंता ना कोई झंझट
समय का पंछी कब उड़ा
 याद नहीं आता
 बढ़ी उम्र दर्पण देखा
देखे  परिवर्तन
मोह जागृत हुआ
अभीलाषा ने सर उठाया
कुछ कर गुजरने की चाह ने
चैन सारा हर लिया
मन चाही कुर्सी जब पाई
मद ने दी दस्तक दरवाजे पर
नशा उसका सर चढ़ बोला
अहंकार का द्वार खुला
चुपके से उसने कदम बढ़ाया
मन में अपना डेरा जमाया
जीवन के तृतीय चरण में
माया आना ना भूली
मन मस्तिष्क पर अधिकार किया
उम्र बढ़ी मुक्ति चाही
सारी दुनियादारी से
पर माया ने हाथ मिलाया
मोह, मद, मत्सर से
सब ने मिल कर ऐसा जकड़ा
छूट न पाया उनसे
अंतिम समय तक |
आशा


17 जून, 2012

वहीँ आशियाना बनाया


थी राह बाधित कहीं न कहीं
कैसे आगे बढ़ पाती

जीवन कहीं खो गया
उसे कहाँ खोज पाती
जब भी कदम बढाने चाहे
कई बार रुके बढ़ न सके
वर्जनाओं के भार से
खुद को मुक्त ना कर सके 
जितनी बार किसी ने टोका
सही दिशा न मिल पाई
भटकाव की अति हो गयी
अंतस ने भी साथ छोड़ा
विश्वास डगमगाने लगा
आँखें धुंधलाने लगीं
 कुछ भी नजर नहीं आया
थकी हारी एक दिन
रुकी ठहरी आत्मस्थ हुई
विचार मग्न निहार रही
दूर दिखी छोटी सी गली
देख कर पक्षियों की उड़ान
और ललक आगे जाने की
इससे संबल मिला
जीवन का उत्साह बढ़ा
तभी हो कर मगन
वहीँ आशियाना बनाया
चिर प्रतीक्षा थी जिसकी
उसी को अपनाया  |

आशा