एक गाँव में तुलसी नाम की एक महिला रहती थी | वह रोज अपने आँगन में लगी तुलसी पर जल चढ़ाती थी |
जब वह पूजन करती थी तब वह भगवान से प्रार्थना करती थी कि यदि वह मरे तब उसे भगवान विष्णु का
कन्धा मिले |
एक रात वह अचानक चल बसी | आसपास के सभी लोग एकत्र हो कर उसे चक्रतीर्थ ले जाने की तैयारी
करने लगे | जब उसकी अर्थी तैयार की जा रही थी लागों ने पाया कि उसे उठाना असम्भव है | वह पत्थर
कि तरह भारी हो गई थी |
उधर विष्णु लोक में जोर जोर से घंटे बजने लगे | उस समय विष्णु जी शेष शैया पर विश्राम कर रहे थे |
लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रहीं थीं | घंटों की आवाज से विष्णु जी विचलित हो उठे | लक्ष्मी जी ने परेशानी का
कारण जानना चाहा | भगवान ने कहा मुझे मेरा कोई भक्त बुला रहा है |मुझे अभी वहाँ जाना होगा |
हरी ने एक बालक का रूप धरा व वहाँ जा पहुँचे | वहाँ जा कर उसे अपना कन्धा दिया |जैसे ही भगबान
का स्पर्श हुआ अर्थी एकदम हल्की हो गयी और महिला की मुक्ति हो गई |
30 नवंबर, 2009
25 नवंबर, 2009
मनोभाव
23 नवंबर, 2009
सुनामी
पहले मुझे समुन्दर बहुत भाता था ,
बार बार अपनी ओर खींच ले जाता था ,
देख लहरों का विकराल रूप
मैं भूल गई वह छटा अनूप ,
जो कभी खींच ले जाती थी ,
समुन्दरी लहर मुझे बहुत सुहाती थी |
पर एक दिन सुनामी का कहर ,
ले गया कितनों का सुख छीन कर ,
और भर गया मन में अजीब सा डर ,
अब नहीं मचलता मन उसे देख कर |
आशा
बार बार अपनी ओर खींच ले जाता था ,
देख लहरों का विकराल रूप
मैं भूल गई वह छटा अनूप ,
जो कभी खींच ले जाती थी ,
समुन्दरी लहर मुझे बहुत सुहाती थी |
पर एक दिन सुनामी का कहर ,
ले गया कितनों का सुख छीन कर ,
और भर गया मन में अजीब सा डर ,
अब नहीं मचलता मन उसे देख कर |
आशा
21 नवंबर, 2009
दूरियाँ
16 नवंबर, 2009
अवनि
15 नवंबर, 2009
दीपक
13 नवंबर, 2009
दिया
कण कण रौशन किया दीये ने ,
घर का तम हर लिया दीये ने
अपना जलना भूल दीये ने,
किये न्यौछावर प्राण दीये ने |
आशा
घर का तम हर लिया दीये ने
अपना जलना भूल दीये ने,
किये न्यौछावर प्राण दीये ने |
आशा
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