09 नवंबर, 2012

कुछ दोहे


चौक पुराऊँ अंगना ,दीप जलाऊँ द्वार |
खुशियों की सौगात लिए ,आया यह त्यौहार ||

है स्वागत आज तेरा ,पर मन में अवसाद |
मंहगाई की मार से ,होने लगी उदास  ||

दीपक तेरी रौशनी, फीकी लगती आज  |
परम्परा निभा रही है  ,भूली सभी मिठास ||    

पूजन अर्चन के लिए ,पहने वस्त्र सम्हाल  |
खूब चलाई चकरी ,फटाके और अनार ||

नन्ही के आई हिस्से ,फुलझड़ी का तार |
प्रेम बांटने आगया ,मनभावन त्यौहार || 

रंग बिरंगी रौशनी ,बिखरी चारों ओर |
दीपक तेरी रौशनी फीकी सी क्यूँ होय ||





दीप मालिकाएं सजी   ,सभी घरों के पास |
क्यूँ फिर भी लगती कमीं ,दीप जलाऊँ द्वार ||






 

07 नवंबर, 2012

सोच नहीं पाती


भाव आतुर मुखर होने को
दीखता वह सामने
फिर भी शब्द नहीं मिलते
अभिव्यक्ति को |
कोइ बाधा या दीवार नहीं
फिर भी हूँ उन्मना
कहीं कोई अदृश्य रोकता
कुछ कहने को |
यह भी स्पष्ट नहीं
भाव प्रधान हैं या उद्बोधन
उलझी हुई हूँ सुलझाने में
उठते विचारों के अंधड को |
बहुत कुछ है कहने को
पक्ष और विपक्ष में
पर लटक जाता है ताला अधरों पर |
उन्मुक्त भाव दुबक जाते हैं
बस रह जाता है मौन
मन समझाने को  |
कभी वह भी खो जाता है
घर के किसी कौने में
रह जाती हूँ मैं अकेली 
अहसासों में जीने को |
क्यूँ नहीं सदुपयोग
समय का कर पाती
रहती हूँ दूर -दूर
 जीवन की सच्चाई से |
बहुत दूर निकल जाती हूँ
सोच नहीं पाती मैं क्या चाहती हूँ
आग में हाथ जला कर
क्या साबित करना चाहती हूँ ?
आशा

04 नवंबर, 2012

आवागमन इनका



अहसास इनका
समस्त चेतन जगत में
आवागमन प्रक्रिया सचराचर में
अनुभव सभी करते
लाभ   भी लेते
गति इनकी होती अविराम
फिर भी एक सी नहीं होती
परिवर्तित होती रहती
कभी तीव्र तो कभी मंद
कभी अवरुद्ध भी होती
तभी तो कभी गर्म
तो कभी सर्द आहों का
जलवा नजर आता
इन पर नियंत्रण के लिए
अनेकों यत्न किये जाते
कितनी ही औषधियां लेते
ध्यान योग को अपनाते
पर ऐसा न हो पाता
गति ह्रदय की होती संचालित
इनके ही प्रताप से
इनका है क्या नाता मनुज से
किसी ने न जाना
श्वासों का आना जाना
किसी ने न पहचाना
प्राणों के संग हुई
जब भी बिदाई इनकी
किसी ने इस का अनुभव
यदि  किया भी  हो
उसे सब से बाँट नहीं पाया
क्यूं कि वह बापिस 
लौट कर ही नहीं आया |
आशा

02 नवंबर, 2012

दीवानापन



प्यार भरा दीवानापन
कहाँ नहीं खोजा उसने
जब भी हाथ आगे बढ़ाया
मृग तृष्णा में फंसा पाया
गुमनाम जिंदगी जीते जीते
अकुलाहट बेचैन करे
मन एकाकी विद्रोह करे
साथ उसके कोइ न चले
बाहर वर्षा की बूंदे
अंतस में भभकती ज्वाला
सब लगने लगा छलावा
कैसे ठंडक मिल पावे
मन चाहा सब हो  पाए
खोना बहुत सरल है
पर पाना आसान नहीं
है गहरी खाई दौनों में
जिसे पाटना सरल नहीं
फासले बढ़ते जाते
फलसफे बनते जाते
अपने भी गैर नजर आते
कभी लगती फितरत दिमागी
या छलना किसी अक्स की
दीवानापन या आवारगी
हद दर्जे की बेबसी
बारिश कीअति  हो गयी
दीवानगी भी गुम हो गयी
आँखें नम हो कर रह गईं |
आशा