25 दिसंबर, 2013

गुणों की टोकरी


Photo: ღ A World of Flowers for You ღ

वह नाजुक नन्ही कली
लगती गुणों की टोकरी
हर पुष्प जिसका
सुरभि चहु दिश फैलाता
है किसकी सुगंध अधिक
मन सोच नहीं पाता
और विशिष्ट उसे बनाता |
माता पिता उसे सवारते
विकास में सहयोग करते
रूप रंग गुणों का
बखान करते नहीं थकते |
जो भी संपर्क में आता
बिना कहे न रह पाता
हैं कितने भाग्यशाली
ऐसी सुशीला  को पाया
है धन्य उसकी जननी
गुण संपन्न उसे बनाया
जिस घर की वह शोभा होगी
बड़े  जतन से सहेजेगा
फूलों की टोकरी को
बिखरने नहीं देगा |
आशा |

22 दिसंबर, 2013

हाइकू (३)

(१)
शिक्षा की देन
अभिनव  अनूप 
वह है  यहीं   |
(2)
थे जब साथ
कितना सुहाना था
यह मौसम |
(३)
 मौसम यहाँ
एकसा न रहता
बदल जाता |
(४)
सुर व साज 
मधु रस में घुली 
मीठी आवाज|
(५)
आवाज तुम
हो साज की मिठास
हैं श्रोता हम |
(६)
बहती जाती
नौका मझधार में
पार हो कैसे |
(7)
कैसे मनाऊँ
मैं दिल को अपने
जाना ही नहीं |



21 दिसंबर, 2013

फूल और ओस

(१)
 फूल क्या जिसने
 ओस से प्यार न किया हो
भावों में बह कर उसे
बाहों में न लिया हो |
(२)
टपकती  ओस
ठिठुरन भरी सुबह की धुप
देखे बिना चैन नहींआता
ओस में नहाया पुष्प
अनुपम नजर आता |
(३)
फूलों की फूलों से बातें
 कितनी अच्छी लगती हैं
प्यार भरी ये सौगातें
मन को सच्ची लगती हैं |

19 दिसंबर, 2013

यह क्या हुआ



हरे भरे इस वृक्ष को
यह क्या हुआ
पत्ते सारे झरने लगे
सूनी होती डालियाँ |
अपने आप कुछ पत्ते
पीले भूरे हो जाते
हल्की सी हवा भी
सहन न कर पाते झर जाते
डालियों से बिछुड़ जाते |
डालें दीखती सूनी सूनी
उनके बिना
जैसे लगती खाली कलाई
चूड़ियों बिना |
अब दीखने लगा
पतझड़ का असर
मन पर भी
तुम बिन |
यह उपज मन की नहीं
सत्य झुटला नहीं पाती
उसे रोक भी
नहीं पाती |
बस सोचती रहती
कब जाएगा पतझड़
नव किशलय आएँगे
लौटेगा बैभव इस वृक्ष का |
हरी भरी बगिया होगी
और लौटोगे तुम
उसी के साथ
मेरे सूने जीवन में |

आशा

18 दिसंबर, 2013

हाइकू (२)


(१)
सपने कभी
नही होते अपने
हरते चैन |
(२)
की मनमानी
उलझी सपनों की
दीवानगी में |.
(३)
बड़ों की सीख 
मान स्वप्न  दीवानी
मैं मैं न रही |
(4)
चेहरा तेरा
दर्प से चमकता
सच्चे मोती सा |
(५)
रिश्ता प्यार का
निभाना है कठिन
आज ही जाना |
(६)
यूं न देखते
सोचते समझते
तुझे निभाते |
(७)
किया अर्पण
पूरा जीवन तुझे
तूने जाना ना |

आशा

16 दिसंबर, 2013

हाइकू

  1. -(१)
ना दो आघात
बेबात की बातमें
उलझना ना |
(२)
उलझना ना
किसी से कभी यूंही
बंध रहना |