
05 अक्टूबर, 2015
03 अक्टूबर, 2015
नानी
थकी हारी नानी बेचारी
टेक टेक लाठी चलती थी
राह में ही रुक जाती थी
बार बार थक जाती थी
नन्हां नाती साथ होता
ऊँगली उसकी थामें रहता
व्यस्त सड़क पर जाने न देता
बहुत ध्यान उसका रखता
था बहुत ही भोलाभाला
नन्हां सा प्यारा प्यारा
रोज एक कहानी सुनता
तभी स्वागत निंदिया का करता
रात जब गहराती
तभी नींद उसको आती
स्वप्न में भी नानी की यादें
कहानियों की सौगातें
अपने मित्रों में बांटता
नानी को बहुत याद करता
जब बाहर जाना पड़ता
मन साथ न देता उसका
अवसर पाते ही आ जाता
बचपन अपना भूल न पाता
अपने बच्चों में वही लगाव
जब न पाता सोचता
आखिर कहाँ कमी रह गई
उन्हें बड़ा करने में
परिवार से जुड़ न पाए
अपने अपने में खोये रहे
पाया भौतिक सुख संसाधन
पर प्यार से वंचित रहे
लगती बचपन की यादें
आधी अधूरी
नानी दादी बिना
नानी दादी बिना
धन धान्य ही मिल पाया
पर न मिला
प्यार दुलार का साया
आशा
30 सितंबर, 2015
तुझे खोजें कहाँ
जाने क्या बात हुई
उदासी ने ली अंगड़ाई
सबब क्या था
उसके आने का
वह राज क्या था
मन की बेचैनी का
खोज न पाई
चर्चे तेरे अक्सर
हुआ करते थे
कभी कम कभी बेशुमार
हुआ करते थे
ऐसा तो कुछ भी न था
जो चोटिल कर जाता
मन को ठेस पहुंचाता
तब भी मुठ्ठी भर खुशी
दामन में समेत न पाई
अस्ताचल को जाता सूरज
जब खोता प्रखरता अपनी
थका हारा बेचारा
पीतल की थाली सा दीखता
बादलों में मुंह छिपाता
आसमान सुनहरा हो जाता
जाने क्या क्या याद दिलाता
उदासी शाम के धुधलके सी
गहराई मन पर छाई
रंग उसका फीका न होता
पुरानी किताब के पन्नों सा
छूते ही बिखरने लगता
कैसे समेटें उन लम्हों को
दिल पर लिखे गए शब्दों को
ऐ मुठ्ठी भर खुशी
तुझे कहाँ खोजा जाए
परहेज़ उदासी से हो पाए |
आशा
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