03 दिसंबर, 2015

छलना


तू ही तू नजर आती है के लिए चित्र परिणाम

दृष्टि जहां तक जाती है
तू ही  नज़र आती है
पलकें बंद करते ही
तू मन में उतर जाती है
छवि है या कोई परी
जो आँख मिचौनी खेल रही
 दृष्टि से ओझल होते ही  
मन  अस्थिर कर रही
है ऐसा क्या तुझ में विशेष
जग सूना सूना लगता है
जब तू नहीं होती
जीना दूभर होता है
अब तो सुनिश्चित करना होगा
तू सच में है
 या कोई छलना  
या भ्रम मेरे मन का
बहुत हुई  लुका छिपी
मेरे पास अब समय नहीं
तुझे खोज कर लाने का
मनुहार में समय गवाने का
मैं यदि तुझसे रूठा
फिर लौट कर न आऊंगा
भ्रम मेरा टूट गया है 
है धरा मेरे नीचे
अब तुझे सोचना है
क्या करना है कैसे करना है
या अभी भी मुझे छलना है |
आशा

30 नवंबर, 2015

यादें सज ही जातीं हैं


 
मेरी डायरी के कागज़
  लिखे गए  या रहे अघूरे  
कुछ कोरे रहे  भी तो क्या 
यादों की बयार  साथ लाये 
र्रूपहली यादों की महक 
सुनहरी धूप  की गमक 
मन को बहकाए
वह अनियंत्रित हुआ जाए
रची बसी खुशबू गुलाब की 
यादों को दोहराने लगी 
किसी की याद सताने लगी 
बीता कल अब समक्ष था
दिया गुलाब का फूल था
मनोभाव जताने को 
बड़े प्यार से जिसे सहेजा 
अपनी डायरी के बीच में
व्यस्तता इतनी रही
 वह  याद न आई
यादें विस्मृत होने लगी 
वर्तमान में खोने लगीं
आज अचानक हाथ आई 
वही पुरानी डायरी
गुलाब का फूल तो सूख गया  
पर महक अभी तक बाक़ी है
पन्नों में रच बस गई है
यादों में धुलमिल गई  है
मंथर गति से मुझ तक आकर 
यादें सज ही जाती हैं
 दिल में जगह बनाती हैं |
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आशा

27 नवंबर, 2015

रोटी बेटी

 rotii के लिए चित्र परिणाम

रोटी ताती चाहिए ,ठंडी नहीं सुहाय |
नखरे क्यूं  करता भला ,बात समझ ना आय ||

बात समझ ना आय ,अरे तू कैसा मूरख |
खाले अब चुपचाप ,उतारी है क्यूं सूरत ||

सच्चाई को मान ,रोटी  होती है रोटी 
क्यूं पीछे है पडा ,चाहिए ताती रोटी ||

रोटी मीठी ही लगे ,चाहे जब लो खाय |
प्यार से पाया टुकड़ा ,मन को सदा सुहाय ||


प्रेम भाव मन में बसा ,झुटला सका न कोय |
दूरी दिखती जब इससे ,यही दिखावा होय ||

जब से बेटी के कदम पड़े , घर में आई बहार |
देखी जब उसकी अदाएं ,मन में रहा न खार ||




आशा

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24 नवंबर, 2015

अंतर कल व आज में

कलम के लिए चित्र परिणाम
एक वह भी लेखनी थी
था वजन जिस में इतना 
लिखा हुआ मिटता न था
लाग लपेट न थी जिसमें
वह बिकाऊ कभी न थी
किसी का दबाव नहीं सहती
थी स्वतंत्र सत्य लेखन को
अटल सदा रहती थी
एक लेखनी यह है
बिना दबाव चलती नहीं
यदि धन का लालच हो साथ
कुछ भी लिखने से
हिचकती नहीं
अंजाम कोई भी हो
इसकी तनिक चिंता नहीं
यही तो है अंतर
कल व आज के सोचा का
कल था सत्य प्रधान
आज सब कुछ चलता है 

पहले भी स्याही का 
रंग स्याह हुआ करता था 
आज भी बदला नहीं है 
फिर यह परिवर्तन क्यूं 
आधुनिकता का है प्रभाव 
या कलियुग का प्रादुर्भाव
क्या नियति उसकी यही है 
या सोच हो गया भिन्न |

आशा

22 नवंबर, 2015

मुक्तक

तारे  आसमान में के लिए चित्र परिणाम
 टिमटिमाते तारे देखे खुले आसमान में
देख उन्हें दीपक जलाए मानव ने जहान में
सृष्टि के कण कण में छिपे कई सन्देश
हम शिक्षा लेते उन्हीं से जीते नहीं अनुमान में |


मौसम बीता गरमीं गई 
ठंडा दिन और रात हुई 
मिन्नतें हजार करते रहे 
गर्म मिजाज़ी कम न हुई |

मुक्त आकाश में उड़ती हुई 
स्वतंत्रता की  ध्योतक वही 
चिड़िया जैसा उड़ना चाहूँ 
रहा मेरा अरमान यही |


आशा