25 मार्च, 2020

मन का कहा


मन का कहा स्वीकार किया है
उसने  दिल का दामन बचाया कहाँ है
प्रभू से कुछ भी नहीं चाहा है
मोहब्बत का फलसफा सुलझाया  कहाँ है |
अभी तो हाथ जोड़े हैं नमन किया है
मंदिर में भोग लगाया कहाँ है
अभी तो स्वच्छता की है मंदिर  की    
बुझते दीपक को जलाया कहाँ है |
दी है परीक्षा प्रभु के समक्ष
नतीजे की अपक्षा को छिपाया कहाँ है
  वह भी राह देख रहा है  
ईश्वर को भोग चढ़ाया कहाँ है |
 है मन के भावों की  पारदर्शिता  आवश्यक
उसने  किसी को झुटलाया कहाँ है
प्यार प्रेम वह  नहीं जानती
उसने मन के भावों को छिपाया कहाँ है |
आशा 

24 मार्च, 2020

कोठरी काजल की


  है सियासत की दुनिया चमक दमक की
बड़े बड़े प्रलोभन फैले यहाँ वहां
जिसने भी दूरी रखी इससे
 बहुत बेचैनी हुई उसे
मन ही मन दुख से हुआ संतप्त
क्या लाभ ऐसी दुनिया का
भीतर कुछ और बाहर कुछ हो 
सत्य कहीं दुबका हुआ हो
हर चहरे पर मुखौटा लगा हो
स्वयं की पहचान कहीं गुम हो जाए
है वहां एक बड़े दलदल का नजारा
जो पंक में घुसता गया लौट नहीं पाया
ऐसे क्या उपहार मिल गए
 राजनीति की दौड़ में
छोटे बड़े का लिहाज नहीं रहा यहाँ 
 शालीन वार्तालाप के लिए तरसे
दूरदर्शन पर भी बहस ऐसे दीखती है
मानो शेर अभी  झपटेगा  शिकार पर
दूसरा मैमने सा गिडगिडा रहा हो
बच्चे तक कहने लगते हैं
क्या इन में तमीज नहीं
इनकी मम्मीं ने क्या
 कुछ नहीं सिखाया इनको
सियासत का गलियारा
 काई से भरा हुआ है
जितना भी सम्हल कर चलो
 पैर फिसल ही जाते हैं
गिरने पर सहारा दे कर
उठाने वाला कोई नहीं होता
सियासत है कोठारी काजल की
 कोई न बचा इससे
जो भी भीतर  गया
बच  न पाया  कालिख  से | 
आशा

जब भी कोरा कागज़ देखा

 
जब भी कोरा कागज़ देखा

23 मार्च, 2020

स्वर्णकार




 
 वह है  पूरी तरह खरा सोना
कोई मिलावट नहीं उसमें
तभी तो गहने  गढना उससे
है कठिन बिना मिलावत के |
किसी सीमा तक मिलावट में
कोई हर्ज नहीं होता पर
अधिक मिलावट होने से
 चमक नहीं रहती  उसकी |
सारा सौन्दर्य कहीं खो जाता है
उसे दो चार बार पहनने से
पीतल सा दिखाई देता है
मन बहुत उदास हो जाता है |
  समाप्त हुई चाह अब तो नवीन फरमाइश की
नया जेवर तो बना नहीं सकते
पर पुराना गहना भी तुड़वा कर
 बरबाद करने का मन नहीं होता |
 जाने कितनी मिलावट स्वर्णकार करेगा
दो गुने पैसे चाहेगा अलग से
 सोच भी कुंद हो गया अब तो  
किसकी बात मानूं दिल की या दिमाग की
उलझन में फंसी हूँ  कैसे उभरूं  |
आशा

22 मार्च, 2020

सामंजस्य







किससे कहें किसको सुने
सभी खुद को समझते
बहुत सिद्धहस्त  विद्वान
 उनसा कोई नहीं है
खुद को सर्वोपरी जान
कुछ अलग विचार रखते हैं
 वे  हर बार अपनी
 बात पर सही होते हैं
किसी का तर्क भी
 उन्हें रास नहीं आता
उसे कुतर्क में बदलते
देर नहीं लगती उनको
पूरे जोश से बहस करते हैं
 खुद ही ठहाके लगाते हैं
यह तक नहीं सोच पाते कि 
तर्क कुतर्क में कब बदला
मेरी स्थिति बहुत विचित्र
 हो जाती है तब  
मौन की शरण में जाना होता है
 या नकली मुस्कान से बातों को
 वहीं विराम देना पड़ता  
नहीं तो क्या लाभ 
बातों को बतंगड़ में बदलने का
कहीं भी शान्ति स्थापित करने के लिए
इससे अच्छा विकाल्प कोई नहीं होता
 बहस वहीं रह जाती है
 शान्ति चारो और फैल कर
 असीम आनंद से भर देती है
है न यह  कितना सरल उपाय
 सब से सामंजस्य स्थापित करने का |
आशा

18 मार्च, 2020

कोरोना

कोरोना फैला
आई बिपदा घोर
डरना कैसा

थामें दामन
स्वच्छता अपनाएं
भय है कैसा

कोई तो होता
सही मार्ग दर्शक
बीमारी फैली

कैसी बीमारी 
क्यूँ पसार रही है 
 अपने पैर 

निगल गई 
बड़ा भाग बीमारी 
मास्क न मिला 

है वायरस 
बहुत  जानलेवा 
प्रभु बचाए

है महामारी
सावधानी जरूरी
 ना कि बीमारी


आशा