13 नवंबर, 2021

मेरी बेटी


 

है गर्ब मुझे यह कहते हुए  

मैंने जन्म दिया था उसे 

 दोनो कुल का नाम बढाया उसने 

कभी नाम न डुबोया मेरा

मेरी सारी  अपेक्षा  पूरी की  उसने  |

कौन कहता है कि बेटी पराई होती है

कन्यादान के बाद उस पर आपका

कोई अधिकार नहीं रहता 

सच कुछ और ही होता है |

शिक्षित हो वह सभी मोर्चों पर

 खरी उतरती है  

बेटी मिलती है बड़े सौभाग्य से 

कोई पुन्य किया हो पूर्व जन्म में

तभी बेटी का सुख मिल पाता है |

वे हैं  हतभागी

 जिन्होंने बेटी न पाई

बेटी के बिना 

घर में बहार न आई |

घर का आँगन सूना ही रह गया

उसकी किलकारी बिना  

उसकी पायल की  झंकार बिना |

मुझे बहुत प्यारी है 

मेरी संस्कारी बेटी  

सब त्यौहार अधूरे लगते 

 उसके बिना|

उसके आते ही घर में 

 बहार आ जाती है

उसके जाने से रौनक

 कहीं खो जाती है|

घर की बगिया 

वीरान सी हो जाती  है

महक पुष्पों की भी 

कहीं खो जाती है |

बाग़ से  हरिया भी 

 मुंह फेर लेती है 

उदासी घर घेर लेती है 

सूनापन डसने लगता है उसके बिना | 

उसकी कमी का किसी को 

पता नहीं चलता पर खलता 

अनजाने में उदासी

 घर घेर लेती है |

आशा 

12 नवंबर, 2021

बंधन अनमोल



बंधे रहना किसी के साथ

जीवन में इतना सरल नहीं

अपने आप को किसी के

 अनुसार ढालना  पड़ता है |

यदि अड़े रहे अपनी बातों पर

मझधार में हाथ छूट जाता

कोई नहीं सोचता कि किनारा

कहाँ होगा मिलेगा या नहीं |

पर तब तक देर हो चुकी होगी

समय लौट कर न आएगा

मन चाह बहुत दूर छूट जाएगा

मन को भारी कर जाएगा |

बंधन समाज के हों

या खुद के मन के

होते हैं बड़े अनमोल

यदि टूट गए फिर से

जुड़ नहीं पाते |

कोशिश जोड़ने की भी की यदि

मन में गठान रह ही जाती है

यह इतना त्रास देती है कि

धीरे  धीरे नासूर बन जाती है |

जिसे सहना सरल नहीं होता

जीना तो पड़ता है पर

मर मर कर जीना भी

क्या जीना है |

आशा 

11 नवंबर, 2021

मन के भाव पिरोए एकांत में


 

गीत गाता रहा गुनगुनाता रहा 

  एकांत में 

मन के भाव पिरोए हैं 

बंद कमरे में |

झांका तक नहीं  बाहर

किसी अनजान को

मुझे किसी की दखलन्दाजी  

अच्छी  नहीं लगती 

किसी भी काम में |

जिस कार्य को पूर्ण करने का

 बीड़ा उठाया है

उसे पूरा करने की

क्षमता भी  है मुझ में |

अधूरा कार्य छोड़ना

 उससे पलायन करना

नहीं लगता

 न्यायसंगत मुझे |

उस के साथ अन्याय

मुझे पसंद नहीं

गीत कहाँ तक सफल हुआ

 कैसे जानूं

जब सुने कोई

 खुद को पहचानूं |

है अपेक्षा यही कि

 गीत  परिपूर्ण हो

यदि सफलता मिले उसमें  

और नया गीत बने |

अधिक उत्साह से

 कुछ और लिखूं

धुन बनाऊँ गुनगुनाऊँ 

जो मन को छुए ऐसा गीत रचूं|

आशा 


10 नवंबर, 2021

हाइकु


 

१- प्यारा संगीत  

बसा  मन में ऐसा  

  रहा ख्यालों में   


२-शोभा न देती 

प्यार न हो दिल से 

लाग लपेट 


३-कहना माना

क्या गलत न किया

क्षमा करना


४-तुम न आए

हर आहट पर

चौंक रही हूँ


५-छाया उजाला

 रात अमावस की

दीप्ति मान है


६- किया श्रृंगार

बाली उम्र में यह

किस के लिए


७-प्यार दुलार

भरा दिल में फूटा

गर्म लावे सा 


आशा

  

 

09 नवंबर, 2021

शमा जली सारी रात

 




शमा रात भर जलती रही
कब सुबह हुई जान न पाई
जब उनीदी आँखों से देखा
स्नेह अंत के कगार पर देखा |
मन को बड़ा संताप हुआ
क्या यह मेरी भूल न थी
अब जान गई हूँ
अपनी भूल पहचान गई हूँ |
यदि थोड़ा ध्यान धरा होता
तू भी जलती रहती रात भर
किसी को कुछ कहने का
अवसर न मिलता |
पतंगों के उत्सर्ग की व्यथा देखी
मन क्षोभ से भरा
अपनी व्यथा किससे कहूँ
समय बीता बात गई
कुछ करने का समय न रहा शेष
मैं क्या करू|


झूटे वादे


 

यूँ तो कोई

वादे नहीं करते

यदि वादे कर लिए

 पूरे नहीं करते |

 उनको निभाने का

 नाम न लेते  

यह झूटी बातें किसलिए

किसे बहकाने  के लिए |

होता  क्या लाभ

इन ऊंची नीची बातों का

क्या जानते नहीं

ऎसी बातें कभी छिपती नहीं |

जब उजागर होती हैं

सब की निगाहों से

 गिर जाते हैं

 इज्जत नहीं होती समाज में

 हो जाते हंसी के पात्र  |

तब मन को

बहुत कष्ट होता है

शर्म से नत मस्तक

 होने के सिवाय

कुछ भी प्राप्त नहीं होता |

 वादा करो कोई वादा किया यदि  

पूरी निष्ठा से निभाओ  

तभी तुम्हारी

बातों की कद्र होगी बातों के पक्के

 माने जाओगे |

आशा 

08 नवंबर, 2021

जीवन अधूरा



                       वह नहीं जानती 

 किसी की दुर्वलता पर हंसना क्या होता है

जिसने इसे भोगा नहीं  इसी जिन्दगी में |

जीवन कटुता से भरा हो

 जब हो हाल बेहाल  

हंसने का कोई कारण तो हो |

यही कुछ बीते जब खुद पर

सोचो जीवन कैसा होगा  |

न प्यार न इकरार

 ना  हीं मान मनुहार 

रूठना मनाना कुछ काल का

होता है शहादत 

प्यार के इजहार का  |

कभी शब्द नहीं होते

 क्षमा माँगने के लिए

इन प्रपंचों से बचकर निकलने के लिए 

 जीवन सुखमय करने के लिए  |

यही समस्या है आम आदमीं की

भूल करता नहीं हो जाती है 

 इससे कैसे बचे कोई तो उपाय हो|

कभी अहम् आड़े आता है  

क्षमा और शब्दों के बीच 

झुकने नहीं देता उसे |

  उसके अहम् को ठेस पहुँचती 

किसी भी समझोते पर विश्वास नहीं होता

प्रयत्न जब असफल ही रहते हैं 

 जीवन अधूरा रह जाता है | 

आशा