29 जनवरी, 2024

खुद को बदल ना पाई


 

जब याद आई तुम्हारी

जी भर कर रोई

तब भी मन न भरा

फिर क्या करती |

कोई नहीं था

दो बोल मीठे बोलने को

थी  असहाय अकेली

खोजती राह भी कैसे |

सोचा जब अकेले ही जाना है

फिर आशा किसी से क्यों ?

अपने को बदल न पाई 

आज तक फिर खुद में

 परिवर्तन की आशा क्यों ?

यही हाल रहा यदि

कुछ न कर पाऊँगी

सफलता की देहरी

तक न छू पाऊंगी |

हूँ अकेली उदास

किसी का साथ नहीं है

कोई हमसफर नहीं है

जिसका हाथ हो सर पर |

आशा सक्सेना