02 जनवरी, 2017

गत्यावरोध




जिन्दगी की उड़ान में 
अचानक विराम आया है 
इतने विस्तृतआसमान में 
कैसा व्यवधान आया है |
बहती नदिया के जल में 
ठहराव सा आगया है 
संध्या कीस्याही उतरआई है 
निशा का अन्धेरा छाने लगा है |
छलकने लगा है घट का जल 
रिसने लगा है उससे जल 
कहीं कोई हादसा हुआ है 
शायद उसी का सन्देश लाया है |
दीपक रीता हो चला है
 पर रात अभी बहुत बाक़ी है 
महक हरश्रंगार की बता रही है 
श्वेत चादर बिछाना बाक़ी है |
तम यदि ना छट पाया 
उड़ान अधूरी रह जाएगी 
बहती नदिया मार्ग बदलेगी 
अस्थिरता बढ़ती जाएगी |
स्थिर मन होने के लिए 
कई पडाव पार करने हैं 
यदि यही पड़ाव अंतिम हो 
कई कार्य अधूरे पड़े हैं |
इस पार से उस पार तक 
मार्ग दुरूह होगा पता है 
अचानक आए विराम का 
अर्थ समझ आने लगा है |
पर कार्य के विस्तार को
 कहीं तो रोकना होगा
आनेवाले कल में स्वयं ही 
अवरोधों से बचना होगा |
यही बातें यदाकदा मुझे 
परेशान करती रहती हैं 
मझधार में नैया
उसमें में अकेली मैं |
 जैसेभी हो पार तो जाना है
यहाँ भी जगह नहीं है
नाही कोई ठिकाना है
आशा |