12 अगस्त, 2011

नौनिहाल


लो आया पन्द्रह अगस्त

त्योहार स्वतंत्रता दिवस का

याद दिलाने उन शहीदों की

जो प्राण न्योछावर कर गए

देश की आजादी के लिए |

खुशियों से भरे नौनिहाल

सोच कैसे मनाएं त्यौहार

तैयारी में जुट गए

भाषण ,कविता और नाटिका

सब में भाग लेने के लिए |

नए कपड़ों में सजे

एकत्र हुए तिरंगे की छाँव तले

देश भक्ति में ओतप्रोत

गीत गाते नारे लगाते

सही कर्णधार नजर आते

स्वतंत्र भारत के |

देख उनकी कर्मठता लगता

है सारा भार

उन नन्हें कन्धों पर

आने वाले कल का |

हर बार की तरह

शपत भी ली है

उन नन्हें बच्चों ने

कोइ एक कार्य पूर्ण करने की |

वे पूर्ण श्रद्धा से करते नमन

उन आजादी के परवानों को

जो आहुति अपनी दे गए

स्वतंत्रता का मीठा फल

भेट देश को कर गए |

09 अगस्त, 2011

रक्षा बंधन बचपन का

जाने कितनी रिक्तता
है आज ह्रदय में
आँखें धुंधलाने लगी हैं
बीते दिन खोजने में |
प्रति वर्ष आता रक्षा बंधन
उसे खोजती रह जाती
फिर अधिक उदास हो जाती |
भूल नहीं पाती बीता कल
जाने कब बीत गया बचपन
वह उल्लास वह उत्साह
जाने कहाँ गया |
जब रंगबिरंगी राखी की
दुकानों पर पडती नजर
याद आती हैं वे गुमटियां
जो पहले सजा करती थीं |
घंटों बीत जाते थे
एक राखी खोजने में खरीदने में
जो भैया के मन भाए
पा कर खुशी से झूम जाए |
सुबह जल्दी उठ जाती
नए कपडे पहन तैयार होती
थाली सजाती दिया लगाती
घेवर और फैनी लाती |
टीका लगा आरती करती
राखी बाँध मुंह मीठा कराती
जैसे ही वह पैर छूता
मन मयूर दुआ देता |
जब एक रुपया
उपहार मिलता
बड़े जतन से उसे सहेजती
आज यह सब कहाँ |
ना भाई है न स्नेह उसका
बस रह गयी
यादें सिमिट कर
हृदय के इक कौने में |

आशा



07 अगस्त, 2011

वह और उसकी तन्हाई


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है पुरानी नैया
नया है खिवैया
आगे बढ़ना न चाहे
साँसें तक रुकती जाएँ |
हिचकोले खाए डगमगाए
रुकना चाहे
आगे बढ़ ना पाए
लगता नहीं आसान
उस पार जाना |
देख पवन का वेग
मस्तूल खींचना चाहे
पर पतवार का वार
उसे लौटा लाए |
है अजब संयोग
सरिता के संग
वो जाने का मन बनाए |
नहीं चाहती कोइ खिवैया
ना ही मस्तूल कोइ
बस चाहती है
मुक्त होना बंधन से |
काट कर सारे बंधन
जाना चाहती दूर बहुत
जहां कोइ खिवैया न हो
बस वह हो और उसकी तन्हाई |
आशा

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