07 अगस्त, 2015

रंग बेरंग


रंग भरा जीवन सुहाना
हरा भरा संगीत पुराना
जाने कब बेरंग हो गया
स्वर बेस्वर हो गया
मन में मलाल रहा
कारण जो छिपा हुआ था
अदृश्य ही रहा
ऐसा क्या घटित हुआ
उफान आया
छोटी सी तलैया में
ना ही कभी भ्रम पाला
ना दी तरजीह किसी शक को
दूरियां बढ़ती गईं
खाई और गहरी हुई
उलझने वहीं रहीं
द्रुत गति से बढ़ने लगीं
सारे रंग धूमिल हुए
जाने कहाँ खो गए
रह गया जीवन आधा अधूरा
 बेरंग बेजान सा
खोज न उसकी हो पाई
समय की भी  दी दुहाई
हाथ से फिसल गया
बापिस लौट नहीं पाया
 रंग भरे जीवन का साया |

05 अगस्त, 2015

अति अधिक ही हो गई

अति अधिक ही हो गई
वर्षा थम न पाई  
लहलहाते पौधे बेचारे
मार उसकी सह न पाए |
झुकने लगे जमीन छूने को
सो गए गहन निन्द्रा  में
कभी न उठने के लिए
मिट्टी में मिलने के लिए |
दी विचारों को हवा
उड़ान भरी विचारों ने
कोई तो साम्य देख पाए  
पौधे और मानव में |
क्षण भर का जीवन दौनों का
समस्त कार्यों के लिए
पूरे हों या अधूरे रहें
है निर्भर वातावरण पर |
अनुकूल या विपरीत
सभी कार्य निर्धारित होते  
प्रारब्ध से संचालित होते
सुख दुःख के झूले में झूलते |
डोर उनकी प्रभु के हाथों में
वही नियंता उनका
अच्छा हो या बुरा कार्य
कोई नहीं रुकता |
आशा

04 अगस्त, 2015

यारी

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जब थल से थी यारी जल की
तब कभी उंगली न उठी
जलती थी जब धरा
वर्षा लगी बहुत प्यारी
अब अचानक क्या हुआ
किस नज़र का जुल्म हुआ
न रही चिंता धरती की
ना ही फिक्र जल प्लावन की
हुए व्यस्त अपनी दुनिया में
ना ही रात की खुमारी गई
अभी तक बिस्तर नहीं छूटा
उससे बहुत यारी रही |
आशा

02 अगस्त, 2015

तेरे रंग में रंगी

 

सावरे तेरे रंग में रंगी
बरसाने की गोरी
मोर मुकुट पर वारी जाए
चंचल चपल चकोरी |
 हुई कान्हां की दीवानी
पर प्रीत की रीत न पहचानी 
कठिन डगर कंटकों से भरी
यही बात ना जानी |
पीछे पीछे चली चंचला
भाव विभोर हो  की आराधना
संग संग चलते चलते
वह कान्हां की होली |
वह कान्हां की कान्हां उसका
एकाधिकार चाहती
बांसुरी  तक सौतन लगती
अपना सुख न खोना चाहती |
प्रीत का प्रगाढ़ रंग
भीग भीग जाता तन मन
जमुना तट पर करे रास
राधा मन की भोली |
आशा

सरल सहज सजीले शब्द

  सुलभ सहज सजीले शब्द जब करते अनहद नाद मन चंचल करते जाते अनोखा सुकून दे जाते कर जाते उसे निहाल | प्रीत की रीत निभा दिल से   जीने...