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फ़रवरी 21, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अपशब्द

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अपशब्दों का प्रहार इतना गहरा होता घाव प्रगाढ़ कर जाता घावों से रिसाव जब होता अपशब्द कर्णभेदी हो जाते मन मस्तिष्क पर बादल से मडराते छम छम जब बरसते नदी नाले उफान पर आते अश्रु धारा थम न पाती अनुगूंज अपशब्दों की वेगवती उसे कर जाती तभी तो कहा जाता है जब भी बोलो मधुर ही बोलो कटु बचन से दूर रहो मन में कटुता ना घोलो    आशा

श्याम सलोने

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श्यामल गात सुदर्शन सुन्दर मनमोहक छवि तेरी रोम रोम में बसी भाव भंगिमा तेरी तेरा मुकुट तेरी बाँसुरी सब से अलग हैं केवल  तेरे ही  श्याम सलोने  मां के दुलारे        वह जाए तुझ पर वारी  जब माखन खाए गिराए  मनवा को भा जाए नयनों में आ बसी  अनमोल भंगिमा तेरी  श्याम सलोने तेरी कमली तेरी लाठी तेरी धैनूं तेरे सखा मुझको बहुत सुहाय  तू सबसे अलग लगे  मन से छवि न जाय | आशा s

चंद हाईकू

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देह दीवानी हुई रूप गर्विता सत्य न जानी| कर्मठ जीव व्यस्त बना रहता सब पा जाता | प्यारी बिटिया जल से तृप्त करे बृद्ध जनों को | ईंट उठाती मेहनत करती झोली में बच्चा | प्यार जताता भोला सा बचपन चतुष्पद से | रिसते जख्म प्यार का मलहम दिल को छुए | दो नन्हें चूजे माता की पनाह में हैं सुरक्षित | आशा

है रीत यही इस जग की

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है रीत कैसी  इस जग की  परिवर्तन में देर नहीं लगती  बचपन जाने कहाँ खो जाता  यौवन की दहलीज पर आ  वह भी न टिक पाता  उम्र यौवन की अधिक नहीं होती  जल्द ही दस्तक  वानप्रस्थ की होती  यह भी विदा ले लेती  अंतिम पड़ाव आते ही  मोह भंग होने लगता  और जाने कहाँआत्मा  देह त्याग भ्रमण करती  देह विलीन हो जाती  पञ्च तत्व में मिल जाती  केवल यादें रह जातीं  जाने वाला चला जाता  बीता कल पीछे छोड़ जाता  आगमन गमन का  क्रम निरंतर चलता  संसार की चक्की में  सभीको पिसना होता इससे कोई न बचता  जन्म मरण दोनो ही  पूर्व निर्धारित होते  जन्म का पता होता  पर मृत्यु कहाँ से कैसे कब वार करेगी  नियंता ही जानता   पर अपने कर्मों का हिसाब  सभी को देना होता  इस लोक में या परलोक में  है रीत यही इस जग की  कुछ भी नया नहीं है आशा