25 नवंबर, 2009

मनोभाव


मनोभाव पिघल कर आ जाते
खुली किताब से चेहरे पे
अनचाही बातों का भी,
इजहार कराते चेहरे से |
ये राज कभी न समझ पाए
अपने बेगाने कहने से
अहसास तभी तक बाकी है
जो भाव समझ ले चेहरे से|
रहते जो दूर बसेरे से
सहते दूरी को गहरे से
मनोभाव सिमट कर रह जाते
अंतर्मन में धीरे से .........|


आशा

23 नवंबर, 2009

सुनामी

पहले मुझे समुन्दर बहुत भाता था ,
बार बार अपनी ओर खींच ले जाता था ,
देख लहरों का विकराल रूप
मैं भूल गई वह छटा अनूप ,
जो कभी खींच ले जाती थी ,
समुन्दरी लहर मुझे बहुत सुहाती थी |
पर एक दिन सुनामी का कहर ,
ले गया कितनों का सुख छीन कर ,
और भर गया मन में अजीब सा डर ,
अब नहीं मचलता मन उसे देख कर |

आशा

सरल सहज सजीले शब्द

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