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मार्च 25, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्षमा

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क्षमा भाव अपनाइए इसे   अनमोल जान ज़रा सी बात बढ़ जाती न किया यदि क्षमा दान बहुत कुछ खोना पड़ता है यदि अहम रहे  मन में छोटी छोटी बातों पर मन के   विचलन से   बनता है बातों का बतंगड़   यदि की लापरवाही इन से बच कर जो चले उसने ही सफलता पाई क्षमा करने के लिए  होता दिल दरिया सा  छोटी मोटी बातों को  नजर अंदाज करते ही मन का कलुष  जब  छट जाता तभी मन क्षमा कर पात़ा  जिसने किया नियंत्रित अपनी भावनाओं को   उसने सब को क्षमा किया खुद पर संयम से ही पाया   इस अनमोल क्षमा भाव को क्षमा भाव है अति आवश्यक सब के लिए समाज में | आशा

बंधी मुठ्ठी

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रोज साथ रहते रहते जाने क्यों मन मुटाव हुआ आपस में बोलना छोड़ा एक पूरब एक पश्चिम एक ही घर में   रहें पर   संवाद हीनता की स्थिति में इससे परेशानी हुई बहुत   बीच बचाव भी बेअसर रहा मध्यमा ने थोड़ी की पहल कहा चलो एक ही काम अलग अलग करो पहले अवसर छोटी को मिला वह पूर्ण रूप से असफल रही अनामिका ने भी जोर अजमाया वह भी कुछ कर न सकी मध्यमा ने कुछ कुछ हिलाया पर वह भी सफल न हो पाई सब के बुरे हाल देख तर्जनी ने हार मानली तब अंगूठे ने मिलाया हाथ सब से     मुठ्ठी बनाई करने को कार्य बहुत सरलता से सम्पन्न हुआ वह   कार्य की पूर्ण आहुति हुई सब ने कसम खाई सदा हिलमिल कर रहने की| आशा

भवसागर में नौका

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काली अंधेरी रात में    डाली अपनी नौका मैंने इस भवसागर में पहले वायु   ने बरजा पर एक न मानी फिर गति उसकी बढ़ने लगी मनमानी जल यात्रा लगी बड़ी सुहानी नौका ने गति पकड़ी   लहरों से स्पर्द्धा की ठानी                         साथ हवा के   दूर बहुत निकल आए वायु ने अब रुख बदला हुआ सीमित चक्रवात में नाव ने अनुसरण किया  घूमने लगी भवर में आसपास कोई न था प्रभु तेरा ही सहारा था तेरा नाम लब पर आया भूली सारी मन की माया   तुमने सुनी  अर्जी मेरी गति नाव की हुई धीमीं तब भी झूल रही   जीवन मृत्यु के बीच जीवन के लिए संघर्षरत न जाने किनारा कब मिलेगा | आशा

तन्हाई

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बचपन बीता खेल कूद में कोई काम न धाम फिर लगा किताबों का अम्बार वह   समय भी कब बीता नहीं रहा अब याद  समय पंख लगा उड़ने लगा ब्याह हुआ व्यस्तता बढ़ी   पहले तो थी कुछ सीखने की ललक   फिर एक व्यस्त दिनचर्या सुबह से शाम तक जिन्दगी हुई एकरस रात कब आती मैं स्वप्नों में खो जाती पर तब भी अपने लिए  रहा अभाव समय का यही आस रही  वह समय कभी तो आएगा जब अपने लिए भी समय होगा खोजती रहती उन पलों को जब मैं अकेली रह पाती और होती मैं और   मेरी तन्हाई पहले   मुझे चाह थी तन्हाई की अब जब मैं हूँ एक कमरे में बंद कुछ कर नहीं पाती केवल सोचती रह जाती हूँ ऐसी तन्हाई का क्या लाभ जब उसका उपयोग न कर पाऊँ जीवन भार सा लगता है अब स्वप्न भी यदाकदा ही याद रह पाते हैं भूली भटकी यादों का जखीरा रह गया है मेरे पास  समय काटने को तन्हाई की अब जरूरत नहीं किसी को समय नहीं है साथ बिताने को  न ही आवश्यकता तन्हाई की खुद के लिए कुछ करने को | आशा

आज के बच्चे कल के नेता

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समय भी क्या कमाल है चुनाव के मौसम में हो रही धमाल है  अब हाथापाई तक उतर आई है जबाबी बोलचाल  शर्म न लिहाज केबल बेसुरे नारों की भरमार पार की सारी मर्यादा फिर होने लगा धमाल शिक्षा दें भी तो कैसे किसे कभी अनुशासन जाना नहीं यही जब नेता बनेंगे सम्हालेंगे बागडोर देश की तब न जाने क्या होगा ? लोकसभा विधान सभा में काम तो नहीं पर केवल दंगल ही होगा कुश्ती का मंजार  होगा | आशा