22 मई, 2019

गलीचा



अर्श से फर्श तक
निगाहें नहीं ठहर पातीं
 प्रकृति नटी   ने गलीचा बिछाया
मन मोहक रंगों से  भरा|
निगाहें  नहीं ठहरती  जिस पर |
बहुत महनत लगी होगी
 उसे बनाने में
चुन चुन कर धागे रंगवाए थे
मन पसंद रंगों से सजाए थे |
प्यारा सा नमूना चुना था
इतना विशाल  गलीचा बनाने को
नीले ,हरे रंग के ऊपर उठते चटक रंग
देखते ही मन उसे पाना चाहता |
पर सब की ऐसी किस्मत कहाँ
 भाग्यशाली ही भोग पाते हैं
ऐसे गलीचे पर सुबह सबेरे
 घूमने  का   आनंद
कम को ही नसीब हो पाता है |
यह सुख वही पाते हैं
जो प्रकृति के बहुत करीब होते हैं
उसे सहेज कर रख पाते हैं |
आशा



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