22 मई, 2019

गलीचा



अर्श से फर्श तक
निगाहें नहीं ठहर पातीं
 प्रकृति नटी   ने गलीचा बिछाया
मन मोहक रंगों से  भरा|
निगाहें  नहीं ठहरती  जिस पर |
बहुत महनत लगी होगी
 उसे बनाने में
चुन चुन कर धागे रंगवाए थे
मन पसंद रंगों से सजाए थे |
प्यारा सा नमूना चुना था
इतना विशाल  गलीचा बनाने को
नीले ,हरे रंग के ऊपर उठते चटक रंग
देखते ही मन उसे पाना चाहता |
पर सब की ऐसी किस्मत कहाँ
 भाग्यशाली ही भोग पाते हैं
ऐसे गलीचे पर सुबह सबेरे
 घूमने  का   आनंद
कम को ही नसीब हो पाता है |
यह सुख वही पाते हैं
जो प्रकृति के बहुत करीब होते हैं
उसे सहेज कर रख पाते हैं |
आशा



20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना ! भाग्यशाली लोग ही कुदरत की इस खूबसूरती का आनंद उठा पाते हैं ! बहुत बढ़िया!

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरूवार 23 मई 2019 को साझा की गई है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 23-05-19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3344 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 22/05/2019 की बुलेटिन, " EVM पर निशाना किस लिए - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुप्रभात
      मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |

      हटाएं
  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (24-05-2019) को "आम होती बदजुबानी मुल्क में" (चर्चा अंक- 3345) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  6. सुप्रभात
    धन्यवाद टिप्पणी के लिए अनिता जी |

    जवाब देंहटाएं
  7. प्राकृतिक सौन्दर्य पर केन्द्रित सुन्दर कविता । सराहनीय अभिव्यक्ति । आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  8. टिप्पणी हेतु धन्यवाद |

    जवाब देंहटाएं
  9. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 27 मई 2019 को साझा की गई है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  10. सुप्रभात
    मेरी रचना शामिल करने की सूचना के लिए धन्यवाद यशोदा जी |

    जवाब देंहटाएं
  11. हम जैसे श्रमिक जन बस दूर से ही इन्हें देखा करते हैं।
    बहुत सुंदर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत खूब ....सादर नमस्कार दी

    जवाब देंहटाएं
  13. सचमुच आलसी लोगों के बस का नहीं ये सुंदर गलीचा निहारना | सुंदर रचना आदरणीय आशा जी | सादर आभार और नमन |

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: