04 जून, 2022

वर्तमान मेरा


 

मेरी आस्था

 तुम्हारा वरद हस्त

यही पाया है मैंने 

बड़े प्रयत्नों से |

सफलता भी पाई है इसमें

किन्तु एक सीमा तक 

ब भी चाहा  वही पाया

मैंने बिना किसी बाधा के

फिर भी संतुष्टि नहीं मिल् पाई

न जाने कहाँ  कमी रही अरदास में |

मन को टटोला आत्ममंथन किया

फिर भी तुमसे दूरी रही

 यह हुआ कैसे

कोई सुराग न मिला

 सोच में डूबी रही

मन में विद्रूप हुआ 

कहाँ भूल हुई खोज न पाई |

यही उलझने 

मुझे सताती रहीं

 कोई निराकरण

 नहीं निकला |

मुझे तरसाता रहा 

रहने लगी उदास

 थकी थकी सी 

जीवन बेरंग हुआ |

अब चाह नहीं 

और जीने की

 मन बुझा बुझा सा रहा 

है यही वर्तमान मेरा |

आशा   

01 जून, 2022

मंजिलें मिले न मिलें


 

                मंजिलें मिले न मिलें

यह अलग बात है

कोशिश में कमी हो

यह तो सही नहीं  |

प्रयत्न इतने हों जब

दूरी कभी तो कम हो

है यही गंतव्य मेरा

उस तक पहुँच पाने का |

सफलता पाने के लिए

वहां तक पहुँचाने के लिए

दिन रात कम पड़ जाएं

पर हार का मोंह न देखूं |

यही है अरदास तुमसे

मेरा मनोबल न कम हो

जिससे हो लगाव गहरा

 वही पास हो मेरे |

मेरी चाहत है यही

और उद्देश्य मेरा यही

बस वहां तक पहुंचूं

यह है अधिकार मेरा |

दृढ संकल्प पाने के लिए

हर कार्य में सफल रहूँ

यही आशीष देनी मुझे

 मनोबल मेरा  बढ़ाना

यही है आश मेरी |

31 मई, 2022

जीवन जीने की कला


 


माना तुम हो हसीन

 किसी से कम नहीं

पर यह खूबसूरती जाने कब बीत जाएगी

यह भी तो पता नहीं |

 तुम सोचती ही रह जाओगी  

जब दर्पण में अपना बदला हुआ रूप देखोगी

मन को बड़ा झटका लगेगा   

कहाँ गया  यह  रूप योवन  

जान तक न पाओगी |

एक दिन तो बुढापा आना ही है

कोई न बच पाया इससे

तुम यह भी न  जान पाओगी |

योवन तो क्षणिक होता है

कब आता है जीवन से विदा हो जाता है

कुछ दिन ही टिक पाता है |

यही हाल है बचपन का

जीवन में ये दिन बड़ी मस्ती के होते हैं

कई बातें तो भूल भी जाते हैं

 पर जितनी यादे रह जाती है

ताउम्र बनी रहतीं है

 यादों की धरोहर में सिमट कर 

जीवन का रंगीन पहलू दिखाई देता है उनमें |  सबसे कठिन  है वृद्धावस्था में जीवन व्यापन  

अपने को जीवित समझना उसके अनुकूल ही समझते रहना सदा खुश रहना

मन में किसी को झांकने न देना

अपने दुःख सुख किसी से न बांटना

यही है इस काल में जीने की कला | 

आशा