11 जून, 2021

यदि बरखा न आई


 


  बढ़ेगी  उमस बेचैनी होगी 

    यदि मौसम विभाग सफल नहीं  

आने वाले मौसम की

जानकारी देने में |

अब तक न आए बदरा

 काले कजराते  जल से भरे

तेज वायु बेग  उड़ा ले चला  

दूसरी दिशा में उन्हें  |  

  इस बार भी यदि 

 वर्षा कम  होगी

                   लोग तरसेंगे भटकेंगे यहाँ वहां  

कैसे कमी सहन करेंगे

खेती  सूख जाएंगी

 दाम बढ़ेंगे दलहन के |

हे परम पिता परमात्मा  

 कैसा है  न्याय तुम्हारा

क्या तुम्हें दया

 नहीं आती तनिक भी  

 आम आदमियों की

जल की आवश्यकताओं पर |  

प्रभु तुम क्यूँ ध्यान रखोगे

 इतनी छोटी बातों का

तुम्हें तो समय नहीं होगा ना  

क्यूँ कि बड़ी समस्याओं में उलझे हो |

बाढ़ तूफान से कैसे हो  निपटारा

शायद हो इसी  सोच में व्यस्त

कभी आम आदमी पर भी

 रहमोंकरम करो |

 तभी याद तुम्हारी आएगी उनको

हाथ जोड़ कर साष्टांग

 झुक कर तुम्हें  प्रणाम  करेंगे

तुम्हारे गुणगान से पीछे न हटेंगे |

आशा

  

07 जून, 2021

है मेरी उलझन

 

तुम्हारा प्यार

 दुलार  कमतर

किसी से  हो

मैं सह नहीं पाती  

तुमसे आगे

निकल जाए कोई

 कहर ढाए

मुझे   स्वीकार नहीं

है मेरा प्यार

बहुत अनमोल

किसी से बाटा  जाए

सहन नहीं

हूँ बहुत कंजूस

तुम्हें भान है

है मेरी उलझन 

                          तुम जान लो 

                         मुझे पहचान लो  |

                             आशा   






06 जून, 2021

जिन्दगी चली ट्रेन सी


 

जिन्दगी  चली  ट्रेन सी  

  पटरियों पर जैसे ट्रेन चली 

कभी चलती सरपट

तो कभी रुक जाती स्टेशन पर |

चाय वाले की आवाज सुनाई देती

कभी आज की ताजा खबर

सुनाने को बेचैन अखवार वाले का

 स्वर मुखर होता |

तभी धीरे से एक  स्टेशन से

अगले पर जाने को

 खिसकती ट्रेन सी जिन्दगी

गति पकड़ती |

स्टेशन से आगे जाने के लिए

कुछ कर्तव्य निभाने के लिए

जहां तक संभव हो कोई कार्य अधूरा

 नहीं छोड़ना चाहती जिन्दगी |

एक समय ऐसा आता

अंतिम स्टेशन पर  पहुँच कर

 थम जाती जिन्दगी रुकी ट्रेन की तरह

 है कमाल की जिन्दगी |

कितने भी व्यवधान आएं

आगे बढ़ती जाती

 गंतव्य तक पहुँच कर ही 

 दम लेती जिन्दगी |

आशा