29 अक्तूबर, 2017

दीपक और बाती



चौराहे पर चौमुख दीया 
दिग्दिगंत रौशन करता 
अपार प्रसन्नता होती 
जब यायावरों को राह दिखाता 
वायु के झोंके करते जब प्रहार 
झकझोर कर रख देते उसे 
बाती काँप जाती 
अपने को अक्षम पाती 
कभी तो घटती कभी बढ़ जाती 
वह दीपक से शिकायत करती 
अपने नीचे झाँको
है कितना अंधेरा तुम्हारे तले
है तुम्हारा कार्य 
भटकों को राह दिखाना 
परोपकार करते रहना 
पर क्या मिला बदले में तुम्हें ? 
दीपक ने सोचा क्षण भर के लिए 
कुछ मिला हो या न मिला हो 
जीता हूँ आत्म संतुष्टि के लिए 
किसी पर अहसान नहीं करता 
जब तुम हो मेरे साथ 
स्नेह से भरपूर ! 


आशा सक्सेना 


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