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जुलाई 13, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरा देश

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(१) स्वर्ण चिड़िया था कहलाता कभी भारत मेरा है बदहाल आज वही जीवन यहाँ | (२) हुआ स्वाधीन परतंत्र नहीं है देश है  मेरा फिर भी बदहाल यहाँ जिंदगी आज | (३) हैं नौनिहाल देश के कर्णधार  भविष्य दृष्टा आशा जुड़ी उनसे सब को बेशुमार | (४) हर वर्ष सा झंडा वंदन किया मिठाई बटी तिरंगा फहराया पर मन उदास  | सधन्यवाद आशा लता सक्सेना

झील सी गहरी आँखें

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झील सी गहरी नीली आँखें खोज रहीं खुद को ही नीलाम्बर में धरा पर रात में आकाश गंगा में | उन पर नजर नहीं टिकती कोई उपमा नहीं मिलती पर झुकी हुई निगाएं कई सवाल करतीं | कितनी बातें अनकही रहतीं प्रश्न हो कर ही रह जाते उत्तर नहीं मिलते अनुत्तरित ही रहते | यदि कभी संकेत मिलते आधे अधूरे होते अर्थ न निकल पाता कोशिश व्यर्थ होती  पढने की | पर मैं खो जाता   ख्यालों की दुनिया में मैं क्यूं न डुबकी लगाऊँ उनकी गहराई में | पर यह मेरा भ्रम न हो मेरा श्रम व्यर्थ न हो मुझे पनाह मिल ही जाएगी नीली झील सी  गहराई में | आशा

नौका डूबती

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नौका डूबती मझधार में उर्मियों से जूझ रही है समक्ष भवर की बिछात उससे बचना चाह रही | जल ही जल आस पास जीवन की कोई न आस मस्तिष्क भाव शून्य हुआ सोच को ग्रहण लगा | हुआ दूभर तर पाना भव बाधा से बच पाना मेरी नैया पार करो   भावांजलि स्वीकार करो | इस पार या उस पार मझधार में ना कोई सार यदि पार लग पाऊँ श्रद्धा सुमन अर्पित करूं | आशा