सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अप्रैल 17, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यह कैसा आचरण

आज मैं अपनी ३५१ बी पोस्ट डाल रही हूँ | आशा है एक सत्य कथा पर आधारित यह रचना आपको पसंद आएगी | थी आकर्षक अग्नि शिखा सी आई थी ऑफिस में नई सब का मन मोह लेती थी अपनी मनमोहक अदाओं से | दिखता था अधिकारी बहुत सौम्य था अनुभवी ओर धनी व्यक्तित्व का तथा स्वयं योग प्रशिक्षित | उसने प्रेरित किया योग की शिक्षा के लिये फिर प्रारम्भ हुआ सिलसिला सीखने ओर सिखाने का | भावुक क्षणों में वह बौस को गुरू बना बैठी ऑफिस आते ही नमन कुर्सी को कर चरण रज माथे लगाती तभी कार्य प्रारम्भ करती | सभी जानते थे क्या हों रहा था वह मर्यादा भी भूल चुकी थी आगे पीछे घूमती थी स्वविवेक भी खो बैठी थी | जब मन भर गया बौस का उससे दूरी रखने लगा वह मिलने को भी तरस गयी अपना आपा खो बैठी | पर एक दिन अति हो गयी गाडी रोक कर बोली मैं जाने नहीं दूंगी मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी | सभी यह दृश्य देख रहे थे मन ही मन में कुछ सोचा उसे धक्का दिया पागल कहा और चल दिया | जो कभी विहंसती रहती थी थी चंचल चपला सी अब बासी फूल सी दिखने लगी | फिर भी इतिश्री नहीं हुई करा दिया उसका स्थांतरण दूरस्थ एक शहर में केवल अपने प्रभाव से | मझा हुआ खिलाड़ी था जानता था

अब तक तलाश जारी है

कुछ भी अधिक नहीं चाहा जो मिला उसी को अपनाया फिर भी जब मन में झांका खुद को बहुत अकेला पाया | सामंजस्य परिस्थितियों से आज तक ना हो पाया अपनों ने जब भी ठुकराया गैरों ने अपना हाथ बढ़ाया | तब भी सोच नहीं पाया है कौन अपना कौन पराया कब कोई भीतर घात करेगा यह भी ना पहचान पाया | जब भी गुत्थी सुलझानी चाही कोई अपना नजर ना आया है स्वार्थी दुनिया सारी फिर भी स्वीकार ना कर पाया | कई बार विचार आता है सब एक से नहीं होते कोई तो ऐसा होगा जो निस्वार्थ भाव लिए होगा | अब तक तलाश जारी है जाने कब कौन किस रूप में आए पूर्ण रूप से अपनाए |

कई कंटक भी वहाँ होते हें

ना तो जानती थी ना ही जानना चाहती थी वह क्या चाहती थी थी दुनिया से दूर बहुत अपने में खोई रहती थी | कल क्या खोया ओर कल क्या होगा तनिक भी न सोचती थी वर्त्तमान में जीती थी | जो भी देखती थी पाने की लालसा रखती थी धरती पर रह कर भी चाँद पाना चाहती थी | क्या सही है वह क्या गलत उस तक की पहचान न थी अपनी जिद्द को ही सर्वोपरी मानती थी | हर बात उसकी पूरी करना संभव न हों पाता था अगर कहा नहीं माना चैन हराम होजाता था | जब कठोर धरातल पर कदम रखा थी बिंदास कुछ फिक्र न थी | जिन्दगी इतनी भी आसान न थी गर्म हवा के झोंकों ने उसे अन्दर तक हिला दिया | उठापटक झगडे झंझट अब रोज की बात हों गयी तब ही वह समझ पाई सहनशीलता क्या होती है | जब मन पर अंकुश लगाया बेहद बेबस ख़ुद को पाया तभी वह जान पाई माँ क्या कहना चाहती थी | जिन्दगी ने रुख ऐसा बदला पैरों के छाले भी अब विचलित नहीं करते ठोस धरा पर चलती है क्यूँ की वह समझ गयी है जीवन केवल फूलों की सेज नहीं कई कंटक भी वहाँ होते हें | आशा

चिंगारियां दबी रहने दो

आपस की बातों को बातों तक ही रहने दो जो भी छिपा है दिल में उजागर ना करो नाकाम मोहब्बत परदे में ही रहने दो | वक्त के साथ बहुत आगे निकल गये हें याद ना करें पिछली बातें सब भूल जाएं हम | कोशिश भुलाने की दिल में छिपी आग को ओर हवा देती है यादें बीते कल को भूलने भी नहीं देतीं | हें रास्ते अलग अपने जो कभी न मिल पाएंगे हमारे बीच जो भी था अब जग जाहिर न हों | बढ़ती बेचैनी को और न भड़कने दो हर बात को तूल न दो चिंगारियां दबी रहने दो | आशा