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24 अक्तूबर, 2015

बदलाव


daalon ke bhaav के लिए चित्र परिणाम
पहले कहा जाता था
दाल दलिया से
 काम चल जाता है
सस्ते में गुजारा हो जाता है
सब्जी भाजी मिले न मिले
दाल रोटी से
 पेट भर जाता है
बच्चों को माँ कहती थी
अरहर दाल यदि खाओगे
 प्रोटीन प्रचुर पाओगे
साथ ही गुनगुनाती थी
दाल रोटी खाओ
 प्रभु के गुण गाओ
अब बदलाव भारी आया है
जब से उछाल
 भावों में आया है
भाषा बदल गई है
अब कहा जाता है
लौकी पालक से
 काम चल जाएगा
मंहगी दाल कौन खाएगा
जंक फूड से काम चलाओ
यूं ही मझे ना सताओ
दाल बनाना नहीं जरूरी 
समझो मेरी मजबूरी 
सब्जी आलू की खाने से
मन तो भर ही जाएगा
दाल की कमी
 तब न खलेगी
जेब अधिक खाली ना होगी |
आशा

22 अक्तूबर, 2015

प्रतीक बुराई का


 RAAVAN के लिए चित्र परिणाम
रावण  प्रतीक बुराई का
जन मन के कलुष का
 हर वर्ष होता घायल
राम जी के वाण से |
कुरीतियों भस्म होतीं
दसशीश को धराशाही  कर
तब भी कम न होता कलुष
आज के समाज का |
दिनदूना  रात चौगुना
अत्याचार बढ़ता जाता
नित नए रूप रावण लेता
कलुषित समाज को करता |
आखिर कितने
 राम जन्म लेंगे उसके विनाश को
समाज के आत्याचारों के
परिशोधन  को 
बुराई मुक्त उसे करने को |
कहीं भी सुरक्षित नहीं
महिलाएं ,बालक आम आदमी  
कब कलुष का निस्तार होगा
स्वच्छ मन मस्तिष्क होगा  |
कहीं कुछ तो अच्छाई होगी 
जो बुराई पर हावी होगी 
फिर दशहरा मनाया जाएगा 
राम विजय का जश्न होगा |


आशा  |

21 अक्तूबर, 2015

आगे न जाने क्या होगा

प्राकृतिक हादसे के लिए चित्र परिणाम
हादसों पर हादसे 
हद से गुजरे हादसे 
दहला जाते दिल 
बेरहमीं की मिसाल हादसे |
प्रकृति की या मनुष्य की 
या मिली जुली
 साजिश दौनों की |
मशीनीकरण के युग में 
संवेदना विहीन इंसान 
भौंचक्का हो देखता 
हादसों का मंजर |
पर कुछ नहीं कर पाता
कारण भी अस्पष्ट नहीं 
है फल उसी की करनी का
प्रकृति पर विजय के  अहंकार का |
पल पल छेड़ छाड़  उससे 
रहता सान्निध्य में जिसके 
विज्ञान के नाम पर अब
 देने लगा दुःख अथाह |
किसी ने माना प्रकोप 
प्रकृति से छेड़ छाड़ का 
उसके अनवरत 
विदोहन का |
नाम किसी ने दिया 
प्राकृतिक आपदा 
किसी ने कहा 
मनुष्य जन्य आपदा |
हारा हुआ लुटा पिटा 
सोच एक व्यथित का यह भी 
है कलयुग का प्रारम्भ 
मनुष्य चरित्र का विघटन 
आगे न जाने क्या होगा |
आशा








18 अक्तूबर, 2015

घर या अखाड़ा


चाह नहीं ऐसे दर जाने की
जहां सदा होती मनमानी
वे अपना राग अलापते
साथ चलने से कतराते
घर बना रहता सदा ही
भानुमती के कुनबे सा
चाहे जब आपा खो देते
दूसरे को सुनना न चाहते
स्वनिर्णय सर्वोपरी जान
उस पर ही चलना चाहते
मार्ग चाहे हो अवरुद्ध
बिना विचारे  बढ़ते जाते
जब भी घर में होते 
दृश्य अखाड़े जैसा होता
पहले बातें फिर वाक युद्ध
और बाद में लाठियां भांजते
हर व्यक्ति दाव अपना लगाता
अपने को सर्वोच्च मानता
पेंतरे पर पेंतरे चलता
अहंकार से भरता जाता 
बच्चे बेचारे  सहमें से 
पहले  कौने में दुबकते 
फिर पूर्ण शक्ति से रोते चिल्लाते 
बिना बात मोहल्ला जगाते
जब शोर चर्म सीमा पर होता
दर्शक भी  जुड़ते जाते
बिना टिकिट होती कुश्ती का
मजा उठाने से  कैसे चूकते 
जब अति होने लगती
 सर थामें  अपने घर जाते
सर दर्द की गोली खा
फिर  से वहां जाना न चाहते |
आशा