Akanksha -asha blog spot.com

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30 अप्रैल, 2016

तन्हाई

28 अप्रैल, 2016

चंद विचार बिखरे बिखरे

धीरज धरती सा के लिए चित्र परिणाम

बेचैन न हो धर धीरज धरा की तरह
सब कष्ट सहन करना धरती की तरह
गुण सहनशीलता का होगा विकसित
महक जिसकी होगी हरीतिमा की तरह |

दीन  दुनिया से है दूर तो क्या
अंतस की आवाज तो सुन सकता है
उस पर ही यदि अडिग रहा
उसका ही अनुकरण किया
तब आत्म विश्वास जाग्रत होगा
वही सफलता की कुंजी होगा |
ममता माता पिता की के लिए चित्र परिणाम
मां की ममता पिता का दुलार
है अद्भुद ममता का संसार
हूँ बहुत भाग्यशाली देखो ना
भरपूर पाया मैंने दौनों का ही प्यार |

अरे मूर्ख मां की शक्ति को जान
अरे नादान  भक्ति की शक्ति को पहचान
जाने कब मां प्रसन्न हो तुझ पर
निर्मल मन से उसे ही अपना मान |

क्यारी फूलों की के लिए चित्र परिणाम
हूँ उदास कि गम से की है यारी
पर मनवा वहां  हो जाता भारी
जो  आती सुगंध मंद मलय के संग
वही क्यारी हो जाती प्यारी |

विरासत अपनी भूले आज भी परतंत्र हैं
कोई परिवर्तन नहीं भीड़ में फंसे हैं
शासन भीअसफल रहा उसे सहेजाने में
कर्तव्य बोध सुप्त ही रहा अधिकार मांग रहे हैं |

आशा








शा

26 अप्रैल, 2016

हम किसी से कम नहीं


कथनी और करनी में,
 कभी भेद न करेंगे
जो भी कहेंगे,
कर के दिखा देंगे
धरती से जुड़े हैं ,
जुड़े ही रहेंगे
चिंदी यदि मिली ,
बजाज न बनेंगे
हर हाल में हम ,
सदा प्रसन्न ही रहेंगे
कुछ आये या ना आये ,
कोशिश तो करेंगे
असंभव कुछ नहीं है ,
पीछे न हटेंगे
परचम सफलता का ,
फैला कर दम लेंगे
सफलता कदम चूमेंगी ,
हम आगे बढ़ेंगे
हम किसी से कम नहीं ,
जता कर ही रहेंगे |
आशा

25 अप्रैल, 2016

हाईकू ही हाईकू


१-
श्वेत वसन
तेरे मां सरस्वती
हो मन शांत |
२-
हरा रंग है
सम्रद्ध धरणी का
कृषक खुश |
३-
भगुआ रंग
छू रहा आसमान
कुम्भ क्षेत्र में |


४-

रवि प्रखर 

झुलसा तन मन 

मन उदास |
५ -
है एक नैया 
/अकेला है खिवैया 
/नैया डोले ना |
६-
ढलता सूर्य 
 रंग हुआ सिंदूरी
जल में दिखा |

७-

 एकांत पल 
तेरी छाया जल में 
प्यारी सी लगे |
८ - 
 हुआ अकेला 
केवल साथ तेरा
अच्छा लगता |
९-
शाम हो गई 
छाया तेरी डूबती 
जल रहा मैं |
१0-                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   
बहता जल 
संध्या का नजारा 
कहे रुक जा |
१२-
उमसबढ़ी
वारिद छितराए 
चल जल्दी से |
१३-
मेरे बचवा 
ढलने को है शाम 
कदम बढ़ा 
आशा
 

24 अप्रैल, 2016

कृषक



सूखा खेत
फसल कट गई
थका कृषक ताक रहा
अपने आशियाने को
कच्चा छोटा सा टापरा
खिड़की पर लटकता
फटा परदा
उसमें से कोई झाँक रहा
यहाँ वहां फिरते कुटकुट
अपनी उपस्थिति दर्ज कराते
बच्चे देख देख मुस्काते
द्वारे पर मूंज की मचिया
महमानों के लिए बिछाई
दरी उस पर डाली ऐसे
सोफे का कवर हो जैसे
मधुर आवाज कोयल की
जब तब सुनाई देती
आगाज होने लगता
अमवा पे आए बौर का
मुंह पर हलकी सी
चमक आजाती
कैरियों को बेच कर
कुछ तो पैसे मिले जाएंगे
यही सोच विचार में डूबा
वह देखता उस पेड़ को
आर्थिक रूप से कमजोर
पर मन का धन है उसके पास
है कृषक आशा पर जीता है
ऐसे ही खुश हो लेता है
आशा