24 अप्रैल, 2016

कृषक



सूखा खेत
फसल कट गई
थका कृषक ताक रहा
अपने आशियाने को
कच्चा छोटा सा टापरा
खिड़की पर लटकता
फटा परदा
उसमें से कोई झाँक रहा
यहाँ वहां फिरते कुटकुट
अपनी उपस्थिति दर्ज कराते
बच्चे देख देख मुस्काते
द्वारे पर मूंज की मचिया
महमानों के लिए बिछाई
दरी उस पर डाली ऐसे
सोफे का कवर हो जैसे
मधुर आवाज कोयल की
जब तब सुनाई देती
आगाज होने लगता
अमवा पे आए बौर का
मुंह पर हलकी सी
चमक आजाती
कैरियों को बेच कर
कुछ तो पैसे मिले जाएंगे
यही सोच विचार में डूबा
वह देखता उस पेड़ को
आर्थिक रूप से कमजोर
पर मन का धन है उसके पास
है कृषक आशा पर जीता है
ऐसे ही खुश हो लेता है
आशा


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