06 नवंबर, 2020


                                                               आओ मिल कर खेलें खेल

 जिन्दगी से क्या सीखा ? 

 आपस में बाँटें विचार सच्चे मन से 

केवल सतही नहीं |

 उत्तर जो मिले दिल से

 वही सही होंगे 

 इस लिए एक जज नियुक्त करें 

 जो सही राय दे पाए 

 अपना फैसला सुनाने में हो निष्पक्ष |

 जो सत्य का साथ दे

 हर बात जो कही जाए 

 कहानी का  अंश नजर ना आए

 उसे सत्य की कसौटी पर परख पाएं |

 खेल में कोई हार जीत नहीं होगी

 पर विचारों में मिलावट नहीं होगी

 तभी आनंद आएगा खेल का 

 जब जज फैसला सुनाएगा | 

आशा

05 नवंबर, 2020

ऐसा किस लिए -

चाँद तुम कहाँ सो गए थे

यह तक भूले कितने लोगों  को था इन्तजार तुम्हारा

भूखे प्यासे तरसी निगाहों से

तुम्हारे दरश को तरस रहे थे |

जब तुमने झांका व्योम से

तभी चैन की सांस आई

पर छोटी सी बदली ने तुम्हें

फिर  अपनी चूनर से ढांक लिया |

जिन लोगों ने  दर्शन नहीं किये फिर से तुम्हें बुलाने का यत्न किया |काफी समय लिया तुमने बापिस आने में  ऐसा किसलिए |

आशा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

04 नवंबर, 2020

आस,प्यास,भूख .नींद करवाचौथ की कहानी ४-

४-आस,प्यास,भूख .नींद
एक राजा था| उसका एक बेटा था |इकलौता बेटा
लाड़प्यार में बिगड़ने लगा |राजा ने बहुत परेशान हो कर अपने मंत्री से सलाह
मांगी |उन्होंने कहा कि राजकुमार को घर से निकाल दीजिये |जब खुद के पैरों पर खडा होगा अपने आप
सुधर जाएगा |राजाने बेटे को निकाल दिया |
राजकुमार अकेला चलने लगा |राह में जंगल था |उसके पैर में एक काँटा चुभ
गया |जैसे ही वह काँटा निकालने के लिए झुका उसने चार महिलाओं को आपस में झगड़ते देखा |उससे रहा नहीं गया |आपस में झगड़ने का कारण
जानना चाहा |पहली महिला ने अपना नाम 'प्यास' बताया |राज कुमार ने कुछ सोचा और कहा प्यास का क्या जब प्यास लगे कहीं का भी पानी पीया जा सकता है नही मैंने आपको सलाम नहीं किया है |
फिर वह दूसरी की और मुखातिब हुआ उसने अपना नाम 'भूख 'बताया |वह सोच रहा था कहने लगा " भूख जब लगती है कुछ भी खा कर शान्ति मिल जाती है "|
अब तीसरी से नाम जानना चाहा |उसने अपना नाम 'नींद' बताया |
राज कुमार ने सोच कर कहा नींद तो चाहे जहां आ जाती है |उसको किसी आलीशान बिस्तर की आवश्यकता नहीं होती |
चौथी ने अपना नाम 'आस'बताया |राजकुमार ने झुक कर उसे सलाम किया और
कहा "आस् माता तुम्हें मेरा प्रणाम |आस पर तो सारी दुनिया निर्भर है |
वास्तव् में वे देवियाँ थीं और राज कुमार की परिक्षा लेने आई थीं |
चारों ने राजकुमार को खूब आशीर्वाद दिया और अंतर्ध्यान हो गईं |
आगे गया तो कुछ लोग आपस में किसी स्वयंबर की बात कर रहे थे |उसने
सोचा क्यों न वह भी वहां जाए और उस में भाग ले |वह भी उन लोगों के साथ चल दिया |आयोजन बहुत भव्य था |पर राजा ने एक शर्त रखी थी |पंडाल में बीच में एक घूमती मछली टागी गई थी |जो भी उस की आँख पर
निशाना लगाएगा उससे ही राज कुमारी की शादी होगी |
पहले ही बाण से सही निशाना लगाया और राज कुमारी से ब्याह ख़ुशी से संपन्न हुआ |राजा इस लिए खुश था कि बेटी से जुदाई नहीं सहनी पडीं |
जब पहली करवा चौथ आई राज कुमारी ने बायना निकाला पर धोवन ने उसे अस्वीकार कर दिया यह कहते हुए की जिसके कोई परिवार न हो उसका दिया वह नहीं लेती |राज कुमारी बहुत रोई और जिद्द कर बैठी किजब अपनी ससुराल नहीं जाएगी तब तक अन्न जल भी ग्रहण नहीं करेगी |राजा के पास समाचार पहुंचा
उन्होंने बेटी की बिदाई बहुत धूमधाम से की |राज कुमार अपने राज्य में पहुंचा
तब तक राजा वृद्ध हो चुका था |उसने सोचा कि किसी राजा ने चढ़ाई की है |पर जब बेटे ने रथ से उतर कर पैर छुए उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा |
राजकुमार और बहू को देख मा का आँचल दूध की धार से भर गया |
राजा राजपाठ बेटे को सोंप तीर्थाटन को चला गया |बहुत समय तक राजकुमार अपनी पत्नी सहित कुशलता से राज करता रहा |प्रजा बहुत खुशहाल रही |
आशा


 

 करवा चौथ की कुछ  कहानियां -

१-एक कहानी तुलसी की

एक गाँव में तुलसी नाम की एक महिला रहती थी | वह रोज अपने आँगन में लगी तुलसी पर जल चढ़ाती थी |
जब वह पूजन करती थी तब वह भगवान से प्रार्थना करती थी कि यदि वह मरे तब उसे भगवान विष्णु का
कन्धा मिले |

एक रात वह अचानक चल बसी | आसपास के सभी लोग एकत्र हो कर उसे चक्रतीर्थ ले जाने की तैयारी
करने लगे | जब उसकी अर्थी तैयार की जा रही थी लागों ने पाया कि उसे उठाना असम्भव है | वह पत्थर
की  तरह भारी हो गई थी |
उधर विष्णु लोक में जोर जोर से घंटे बजने लगे | उस समय विष्णु जी शेष शैया पर विश्राम कर रहे थे |
लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रहीं थीं | घंटों की आवाज से विष्णु जी विचलित हो उठे | लक्ष्मी जी ने परेशानी का
कारण जानना चाहा | भगवान ने कहा मुझे मेरा कोई भक्त बुला रहा है |मुझे अभी वहाँ जाना होगा |
हरी ने एक बालक का रूप धरा व वहाँ जा पहुँचे | वहाँ जा कर उसे अपना कन्धा दिया |जैसे ही भगबान आशा का स्पर्श हुआ अर्थी एकदम हल्की हो गयी और महिला की मुक्ति हो गई |

 

 

२-सात भाइयों की एक बहिन


  सात भाइयों की एक ही बहिन थी |सातों उससे बहुत प्यार करते थे |
वय  प्राप्ति के बाद उसका बिवाह उसी शहर में एक संपन्न परिवार में हुआ |ससुराल में कोई कमीं  न थी |पर भाई बहुत चिंता करते थे उसकी| 
    जब पहली करवा चतुर्थी आई बहन ने निर्जला व्रत रखा |
उसे व्रत चाँद देख कर ही खोलना था |भाई बहुत परेशान थे कि बिना जल के बहिन उपास कैसे रखेगी |उन्हों ने आपस में विचार विमर्श किया |कोई तरकीब निकाली जाए कि बहिन का व्रत जल्दी समाप्त हो जाए |
   आँगन में एक अखैवर का वृक्ष लगा था |भाइयों में से एक
शाम होते ही पेड़ की  सबसे ऊंची  डाल पर एक छलनी ले कर चढ़ गया |उसमें एक जलता हुआ दिया रख लिया |
  सबसे छोटा भाई  बहिन के पास जा कर बोला “चाँद निकल आया है”चलो बहिन व्रत खोलो | बहिन बहुत सीधी थी |उसने पानी पी कर
व्रत तोड़ा |इतने में उसकी ससुराल से समाचार आया कि न जाने उसके पति को क्या हो गया |वह खबर सुनते ही अपनी ससुराल चल दी |वहाँ  सब  हिचकियाँ ले कर रो रहे थे |आसपास के लोग ले जाने की तैयारी करने लगे |उससे रहा नहीं गया और पति की अर्थी को ठेले पर रख घर से निकली |
सबसे पहले घूरे के पास गई उससे कहा “घूरे मामा मैं तुम्हारे पास
आऊँ”|घूरे ने कहा “बेटी तेरे दिन भारी हैं मेरे पास न आ” उसे बुरा लगा और कहा “जाओ१२ वर्ष बाद भी तुम जैसे हो वैसे ही रहोगे”| थोड़ा और आगे चली|राह में एक गाय मिली उससे कहा “क्या मैं तेरे पास आऊँ”|गाय ने भी उसे अपने पास ठहराने से मना कर दिया और कहा “बेटी तेरे दिन भारी है मेरे पास कैसे रहेगी”|उसे बहुत दुःख हुआ और श्राप दिया जिस मुंह से गाय ने मना किया था उसी मुंह से गाय  विष्ठा पान करेगी |
हारी थकी वह एक गूलर के पास पहुंची “गूलर भैया मैं  तुम्हारे पास
रुक जाऊं”|पर गूलर से भी निराशा ही हाथ लगी |उसने गूलर को श्राप दिया की तुम्हारा फल कोई नहीं खाएगा उसमें कीड़े पड़ जाएंगे |
   आगे जा कर वह एक बरगद के नीचे बैठने लगी और पूंछा  “क्या मैं आपके आश्रय में रह सकती हूँ”|बरगद ने जबाब दिया “जहां इतने लोगों ने आश्रय लिया है तुम्हारे लिए क्या कमी है”|वह पेड़ के नीचे छाँव देख कर बैठ गई और प्रार्थना करने लगी  मेरी क्या भूल थी जो मुझे यह कष्ट दिया है|एक ने सलाह दी तुमसे कोई भूल हुई है
देवी की प्रार्थना करो और अपने सुहाग की भिक्षा मांगो |पूरा साल होने को आया जब बारहवी चतुर्थी आई उसने माँ के चरण पकड़ लिए और
कहा पहले मेरा  सुहाग लौटाओ तभी तुम्हारे पैर छोडूंगी |देवी का मन पसीजा और अपनी छोटी उंगली सेउसके पती को  छुआ |उसका पती राम राम कह कर उठ कर बैठ गया |वे दौनों  घर आए और अपने परिवार के साथ रहने लगे |
आशा

   

  

   



३-एक कहानी सूरज नारायण की

एक परिवार में रहते तो केवल तीन सदस्य थे ,पर महिलाओं में आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी |सारे दिनआपस में झगडती रहती थी । घर में सारे दिन की कलह से सूरज नारायण बहुत तंग आ चुका था |न तो घर
में कोईबरकत रह गई थी और न ही कोई रौनक |
यदि कोई अतिथि आता ,सास बहू के व्यबहार से वह भी दुखी होकर जाता | धीरे धीरे घर के वातावरण
से उकता कर वह घर से बाहर अधिक रहने लगा |जब इतने से भी बात नहीं बनी ,एक दिन शान्ति की तलाश
में सूरज ने घर छोड़ दिया |
इधर पहले तो कोई बात न हुई पर जब वह नहीं आया तो सास बहू ने उसकी तलाश शुरू की |सास भानुमती
एक जानकर के पास गयी व अपने पुत्र की बापसी का उपाय पूंछा | बहू ने भी अपने पति को पाने के उपाय
अप्नी सहेलियों से पूछे|
सब लोगों से चर्चा करने पर उन्होंने पाया की यदि घर का अशान्त वातावरण,गंदगी व आपसी तालमेल का
अभाव रहे तो कोई भी वहां नहीं रहना चाहता , चाहे पति ही क्यूँ न हो |
दूसरे ही दिन सास भानुमती ने अपनी बहू सुमेधा को अपने पास बुलाया |लोगों द्वारा दिए गये सुझावों की
जानकारी उसे दी |पति के घर छोड़ देने से परेशान सुमेधा ने भी हथियार दल दिए व सास का कहना मानने लगी |
अब घर में सभी कार्य सुचारू रूप से होने लगे घर की साफ सफाई देखने योग्य थी |यदि कोई आता तो उसे
ससम्मान बैठाया जाता |आदर से जलपान कराया जाता तथा यथोचित भेट ,उपहार आदि देकर विदा किया जाता | धीरे धीरे सभी बाते सूरज तक पहुचने लगी |उसने माँ व सुमेधा की परीक्षा लेने के लिए एक कोढ़ी का वेश
धरण किया और अपने घर जाकर दरवाजा खटखटाया | जैसे ही दरवाजा खुला सुमेधा को अपने सामने पाया |
सुमेधा उसे न पहचान सकी |फिरभी वह व भानुमती उसकी सेवा करने लगी|आदर से एक पाट पर बैठकर
उसके पैर धुलाए , भोजन करवाया व पान दिया | भोजन के बाद सूरज ने सोना चाहा और सूरज नारायण के बिस्तर पर सोने की इच्छा जाहिर की |सास ने खा बुजुर्ग है सोजानेदो |सुमेधा ने उसे सोजाने दिया |
पर सूरज ने एकाएक उसका हाथ पकड़ा व कहा मई सूरज नारायण हूँ |इस पर सुमेधा ने कहा "मेरेपति तो इस करवे की टोटी में से निकल सकते है ,यदि आप निकल जाओ तभी मैं आपको अपना पति मानू"
सूरज ने बड़ी सरलता से करवे की टोंटी से निकल कर दिखा दिया व अपने असली रूप मे आगये |
अब घर का माहोल बदल गया व घर फिरसे खुश हाल होगया |
आशा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 




Saturday, April 18, 2020

EK BAAL KATHAA


19 अप्रैल, 2020

बाल कथा





एक बाल कथा –
एक चिड़िया अकेली डाल पर बैठी थी |इन्तजार कर रही थी कब चिड़ा आए और दाना लाए |बहुत समय हो गया वह अभी तक  नहीं आया |अब चिड़िया को चिंता होने लगी |बुरे ख्यालों ने मन को घेरा |न जाने दाने की तलाश में वह कहाँ भटक रहा होगा |किसी बड़े पक्षी ने हमला तो न कर दिया होगा |अचानक एक भजन उसे याद आया
“वह जमाने से क्यूँ डरे जिसके सर पर हाथ प्रभू का”|
फिर थोड़ी देर मन बहलाया अपने बच्चों से मन का हाल बताया |पर फिर से बेचैन होने लगी |वह बार बार ईश्वर को याद करती थी और अपने पति  की कुशलता की फरियाद भगवान से करती थी |तभी देखा वह दूर से आ रहा था |दाना नहीं मिला था |चिड़िया ने सोचा दाना नहीं मिला तो क्या हुआ कल के दाने से गुजारा चला लेंगे |ईश्वर की यही कृपा बहुत है की मुसीबतों  से बचता बचाता वह यहां तक आ तो गया |किसी ने सच कहा है विपरीत परिस्थितियों में ईश्वर ही याद आता है वही सच्चा मददगार होता है |
|आशा

Sunday, April 12, 2020

एकता


एकता –
खिंच रही  थी घर में दीवार |पर बटवारा होता कैसे संभव |अचानक बटवारा  रूकने के पीछे छिपे कारण का खुलासा नहीं हो पाया था  तब |एक दिन सब आँगन में बैठ बातें कर रहे थे |
उस दिन सच्चाई सामने आई |घर में दो सदस्य थे ऐसे जो पूर्ण रूप से आश्रित थे | बिलकुल असमर्थ
कोई काम न कर पाते थे |बुढापे से जूझ रहे थे |प्रश्न था कौन उन्हे सम्हाले ?तब एक ने सलाह दी थी क्यूँ न इन्हें वृद्ध आश्रम में पहुचा दें |मिल कर आ जाया करेंगे |पर छोटे का मन नहीं माना |बात वहीं समाप्त हो गई थी तब |
तब से रोज लड़ाई होती थी उन की देखरेख  के लिए |जब अति हो गई फिर से बटवारे की बात उठी |दरार दिलों में और बढ़ी  |ललक अलग  रहने  की जागी| फिर बात वहीं आकर अटकी उनकी देखरेख कौन करे ?
अचानक कोरोना का कहर की दहशत से न उबार पाए आसपास के एकल परिवार | पर उनके परिवार में एकता रंग लाई एक दूसरे की  मदद से कठिन समय से उभरने की शक्ति काम आई |
     सभी ने वादा किया अब अकेले रहने की कभी न सोचेंगे |एक साथ रहेंगे कठिनाई का सामना आपसी समन्वय से  बहादुरी से करेंगे |
आशा


Sunday, March 29, 2020

सात भाइयों की एक बहिन


  सात भाइयों की एक ही बहिन थी |सातों उससे बहुत प्यार करते थे |
वय  प्राप्ति के बाद उसका बिवाह उसी शहर में एक संपन्न परिवार में हुआ |ससुराल में कोई कमीं  न थी |पर भाई बहुत चिंता करते थे उसकी| 
    जब पहली करवा चतुर्थी आई बहन ने निर्जला व्रत रखा |
उसे व्रत चाँद देख कर ही खोलना था |भाई बहुत परेशान थे कि बिना जल के बहिन उपास कैसे रखेगी |उन्हों ने आपस में विचार विमर्श किया |कोई तरकीब निकाली जाए कि बहिन का व्रत जल्दी समाप्त हो जाए |
   आँगन में एक अखैवर का वृक्ष लगा था |भाइयों में से एक
शाम होते ही पेड़ की  सबसे ऊंची  डाल पर एक छलनी ले कर चढ़ गया |उसमें एक जलता हुआ दिया रख लिया |
  सबसे छोटा भाई  बहिन के पास जा कर बोला “चाँद निकल आया है”चलो बहिन व्रत खोलो | बहिन बहुत सीधी थी |उसने पानी पी कर
व्रत तोड़ा |इतने में उसकी ससुराल से समाचार आया कि न जाने उसके पति को क्या हो गया |वह खबर सुनते ही अपनी ससुराल चल दी |वहाँ  सब  हिचकियाँ ले कर रो रहे थे |आसपास के लोग ले जाने की तैयारी करने लगे |उससे रहा नहीं गया और पति की अर्थी को ठेले पर रख घर से निकली |
सबसे पहले घूरे के पास गई उससे कहा “घूरे मामा मैं तुम्हारे पास
आऊँ”|घूरे ने कहा “बेटी तेरे दिन भारी हैं मेरे पास न आ” उसे बुरा लगा और कहा “जाओ१२ वर्ष बाद भी तुम जैसे हो वैसे ही रहोगे”| थोड़ा और आगे चली|राह में एक गाय मिली उससे कहा “क्या मैं तेरे पास आऊँ”|गाय ने भी उसे अपने पास ठहराने से मना कर दिया और कहा “बेटी तेरे दिन भारी है मेरे पास कैसे रहेगी”|उसे बहुत दुःख हुआ और श्राप दिया जिस मुंह से गाय ने मना किया था उसी मुंह से गाय  विष्ठा पान करेगी |
हारी थकी वह एक गूलर के पास पहुंची “गूलर भैया मैं  तुम्हारे पास
रुक जाऊं”|पर गूलर से भी निराशा ही हाथ लगी |उसने गूलर को श्राप दिया की तुम्हारा फल कोई नहीं खाएगा उसमें कीड़े पड़ जाएंगे |
   आगे जा कर वह एक बरगद के नीचे बैठने लगी और पूंछा  “क्या मैं आपके आश्रय में रह सकती हूँ”|बरगद ने जबाब दिया “जहां इतने लोगों ने आश्रय लिया है तुम्हारे लिए क्या कमी है”|वह पेड़ के नीचे छाँव देख कर बैठ गई और प्रार्थना करने लगी  मेरी क्या भूल थी जो मुझे यह कष्ट दिया है|एक ने सलाह दी तुमसे कोई भूल हुई है
देवी की प्रार्थना करो और अपने सुहाग की भिक्षा मांगो |पूरा साल होने को आया जब बारहवी चतुर्थी आई उसने माँ के चरण पकड़ लिए और
कहा पहले मेरा  सुहाग लौटाओ तभी तुम्हारे पैर छोडूंगी |देवी का मन पसीजा और अपनी छोटी उंगली सेउसके पती को  छुआ |उसका पती राम राम कह कर उठ कर बैठ गया |वे दौनों खुशी खुशी घर आए और अपने परिवार के साथ रहने लगे |