10 दिसंबर, 2017

असमंजस



वह झुकी-झुकी पलकों से 
कनखियों से देखती है 
बारम्बार तुम्हें !
हैं जानी पहचानी राहें 
पर भय हृदय में रहता है 
कहीं राह से दूरी न हो जाए !
कोई साथ नहीं देता बुरे समय में 
जब भी नज़र भर देखती है 
यही दुविधा रहती है 
कहीं राह न भूल जाए ! 
पर ऐसा नहीं होता 
भ्रम मात्र होता है ! 
भ्रमित मन भयभीत बना रहता 
जिससे उबरना है कठिन 
जब कोई नैनों की भाषा न पढ़ पाए
अर्थ का अनर्थ हो जाता !
इससे कैसे बच पायें 
है कठिन परीक्षा की घड़ी 
कहीं असफल न हो जाए 
जब सफलता कदम चूमे 
मन बाग़-बाग़ हो जाए 
जब विपरीत परीक्षाफल आये 
वह नतमस्तक हो जाए 
निगाहें न मिला पाए ! 


आशा सक्सेना 



07 दिसंबर, 2017

स्वप्न मेरे



हो तुम बाज़ीगर सपनों के 
जिन्हें तुम बेचते हो तमाशा दिखा कर 
मेरे पास है स्वप्नों का जखीरा 
क्या खरीदोगे कुछ उनमें से ?
पर जैसे हों वही दिखाना 
कोई काट छाँट नहीं करना  !
हर स्वप्न अनूठा है अपने आप में 
परिवर्तन मुझे रास नहीं आता  ! 
नए किरदार नए विचारों को 
संजोया है मैंने उनमें  !
बंद आँखों से तो अक्सर 
सपने देखे ही जाते हैं 
कुछ याद रह जाते हैं 
अधिकांश विस्मृत हो जाते हैं  !
खुली आँखों से देखे गए सपनों की 
बात है सबसे अलग  !
होते हैं वे सत्यपरक 
अनोखा अंदाज़ लिए ,
नवीन विचारों का सौरभ है उनमें  !
ऊँची उड़ान उनकी अनंत में 
बहुत रुचिकर है मुझे 
तभी वे हैं अति प्रिय मुझे ! 


आशा सक्सेना 



02 दिसंबर, 2017

फलसफा प्रजातंत्र का


बंद ठण्डे कमरों में बैठी सरकार
नीति निर्धारित करती 
पालनार्थ आदेश पारित करती 
पर अर्थ का अनर्थ ही होता 
मंहगाई सर चढ़ बोलती 
नीति जनता तक जब पहुँचती 
अधिभार लिए होती 
हर बार भाव बढ़ जाते 
या वस्तु अनुपलब्ध होती 
पर यह जद्दोजहद केवल 
आम आदमी तक ही सीमित होती 
नीति निर्धारकों को 
छू तक नहीं पाती 
धनी और धनी हो जाते 
निर्धन ठगे से रह जाते 
बीच वाले मज़े लेते ! 
न तो दुःख ही बाँटते 
न दर्द की दवा ही देते 
ये नीति नियम किसलिए और 
किसके लिए बनते हैं 
आज तक समझ न आया ! 
प्रजातंत्र का फलसफा 
कोई समझ न पाया ! 
शायद इसीलिये किसीने कहा 
पहले वाले दिन बहुत अच्छे थे 
वर्तमान मन को न भाया !


आशा सक्सेना 




26 नवंबर, 2017

स्वीकार



व्यस्तता भरे जीवन में 
वह ऐसी खोई कि 
खुद को ही भूल गयी,
दिन और रात में 
ज़िंदगी एक ही सी हो गयी !
नहीं कोई परिवर्तन
आसपास रिक्तता का साम्राज्य 
और मस्तिष्क मशीन सा 
हुआ विचारों में मंदी का आलम 
ऐसा भी नहीं कि खुशियों ने 
कभी दी ही नहीं दस्तक 
मन के दरवाज़े पर 
लेकिन बंद द्वार 
न तो खुलता था ना ही खुला !
बाह्य आवरण 
जिसे उसने ओढ़ रखा था 
और सीमा पार करना वर्जित 
मन में झाँक कर देखा 
वह अकेली ही न थी ज़िम्मेदार 
आसपास की दुनिया भी तो थी 
उतनी ही गुनाहगार 
अब है बहुत उदास 
उदासी पीछा नहीं छोड़ती 
ना ही वह कोई परिवर्तन चाहती 
सब कुछ कर लिया है 
उसने अब स्वीकार ! 



17 नवंबर, 2017

सत्यानुरागी




मिलते हज़ारों में 
दो चार अनुयायी सत्य के 
सत्यप्रेमी यदा कदा ही मिल पाते 
वे पीछे मुड़ कर नहीं देखते !
सदाचरण में होते लिप्त 
सद्गुणियों से शिक्षा ले 
उनका ही अनुसरण करते 
होते प्रशंसा के पात्र ! 

लेकिन असत्य प्रेमियों की भी 
इस जगत में कमी नहीं 
अवगुणों की माला पहने 
शीश तक न झुकाते 
अधिक उछल कर चले 
वैसे ही उनके मित्र मिलते 
लाज नहीं आती उन्हें 
किसी भी कुकृत्य में !

भीड़ अनुयाइयों की 
चतुरंगी सेना सी बढ़ती 
कब कहाँ वार करेगी 
जानती नहीं 
उस राह पर क्या होगा 
उसका अंजाम 
इतना भी पहचानती नहीं !

दुविधा में मन है विचलित 
सोचता है किधर जाए 
दे सत्य का साथ या 
असत्य की सेना से जुड़ जाए 
जीवन सुख से बीते 
या दुखों की दूकान लगे 
ज़िंदगी तो कट ही जाती है 
किसी एक राह पर बढ़ती जाती है  
परिणाम जो भी हो 
वर्तमान की सरिता के बहाव में 
कैसी भी समस्या हो 
उनसे निपट लेती है ! 


आशा सक्सेना 






06 नवंबर, 2017

आने को है बाल दिवस



हे कर्मवीर  
चाचा नेहरू तुम्हें 
मेरा प्रणाम 

रहे सक्रिय 
विविध रंग देखे 
राजनीति में 

नेहरू रहे 
गाँधी के अनुयायी 
आज़ादी चाही 

बाल दिवस 
चाचा नेहरू का है 
जन्म दिवस 

नेहरू जी ने 
दिया स्नेह अपार 
नन्हे मुन्नों को 

लाल गुलाब 
कोट की जेब पर 
सजा प्रेम से 

लुटाया प्यार 
देश के बच्चों पर 
अपरम्पार 

बालक मन 
सरिता सा निश्च्छल 
होता सरल 

धनुषाकार 
चंचल चितवन 
है विलक्षण 

जीत लेते हैं 
बच्चे सभी का मन 
भोली बातों से 

आने वाला है 
बच्चों को अति प्रिय 
बाल दिवस 



आशा सक्सेना 






29 अक्तूबर, 2017

दीया और बाती



चौराहे पर चौमुख दीया 
दिग्दिगंत रौशन करता 
अपार प्रसन्नता होती 
जब यायावरों को राह दिखाता 
वायु के झोंके करते जब प्रहार 
झकझोर कर रख देते उसे 
बाती काँप जाती 
अपने को अक्षम पाती 
कभी तो घटती कभी बढ़ जाती 
वह दीपक से शिकायत करती 
अपने नीचे झाँको
है कितना अंधेरा तुम्हारे तले
है तुम्हारा कार्य 
भटकों को राह दिखाना 
परोपकार करते रहना 
पर क्या मिला बदले में तुम्हें ? 
दीपक ने सोचा क्षण भर के लिए 
कुछ मिला हो या न मिला हो 
जीता हूँ आत्म संतुष्टि के लिए 
किसी पर अहसान नहीं करता 
जब तुम हो मेरे साथ 
स्नेह से भरपूर ! 


आशा सक्सेना