19 सितंबर, 2012

शिकायत


है मुझे शिकायत तुमसे
दर्शक दीर्घा में बैठे
आनंद उठाते अभिनय का
सुख देख खुश होते
दुःख से अधिक ही
द्रवित हो जाते
 जब तब जल बरसाते
अश्रु पूरित नेत्रों से
आपसी रस्साकशी देख 
उछलते अपनी सीट से
फिर वहीँ शांत हो बैठ जाते
जो भी प्रतिक्रिया होती
अपने तक ही सीमित रखते
मूक दर्शक बने रहते
अरे नियंता जग के
यह कैसा अन्याय तुम्हारा  
तुम अपनी रची सृष्टि के
कलाकारों को देखते तो हो
पर समस्याओं से उनकी
सदा दूर रहते
उन्हें सुलझाना नहीं चाहते
बस मूक दर्शक ही बने रहते |
क्या उनका आर्तनाद नहीं सुनते
 ,या जानबूझ कर अनसुनी करते
या  मूक बधिर हो गए हो
क्या तुम तक नहीं पहुंचता
कोइ समाचार उनका
 हो निष्प्रह सम्वेदना विहीन
क्यूँ नहीं बनते सहारा उनका |
आशा