28 फ़रवरी, 2014

चिराग जला


रात भर चिराग जला
एक पल भी न सोया
फिर भी तरसा
 एक प्यार भरी निगाह को
जो सुकून दे जाती
उसकी खुशी में शामिल होती |
वह तो संतुष्टि पा जाता
किंचित स्नेह यदि पाता
दुगुने उत्साह से टिमटिमाता
उसी की याद में पूरी सहर
जाने कब कट जाती
कब सुबह होती जान न पाता |
पर ऐसा  कब हुआ
मन चाहा कभी न मिला
सारी शब गुजरने  लगी
शलभों  के साथ में |
आशा