22 सितंबर, 2016

उर्मियाँ


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लगता है मुझे  मनमोहक
घंटों सागर तट पर बैठना
अंतहीन सागर को निहारना
तरंगों के संग बह जाना |
उत्तंग तरंगें नीली नीली
उठती गिरतीं आगे बढ़तीं
आपस में टकरातीं
चाहे जब विलीन हो जातीं |
प्रातः झलक बाल अरुण की
रश्मियों के साथ दीखती
कभी अरुण को बाहों में भरतीं  
चाहे जब उर्मियों से खेलतीं |
उनका बादलों में छिपना निकलना
छोटी बड़ी लहरों से उलझना
दृश्य मनोहारी होता
मन तरंगित कर जाता |
स्वर्णिम दृश्य ऐसा होता
समूचा मुझे सराबोर   करता
मन उर्मियों सा होता तरंगित
भावविभोर हो बहना चाहता |
अब उठने का मन न होता
ठंडी रेत पर बैठ वहीं 
दृश्य मन में उतारती
स्वप्नों का किला बनाती|
तभी एक लहर अचानक
मुझे भिगो कर चली गई
झाड़ी रेत  भीगे तन से
ठोस धरातल पर पैर टिके|
पीछे लौटी जाने को घर
 सागर तट का मोह  छोड़
बाल अरुण  सुनहरी धूप
 उर्मियों की   लुका छिपी
और स्वप्नों से मुंह मोड़ कर |
आशा