01 नवंबर, 2018

नारी बेचारी





थी एक अवला
शोषण का शिकार
रोज की हाथापाई
कर गई सीमा पार
नौवत बद से बत्तर हुई
एक दिन दोनो हाथ
गले तक जा पहुंचे
न जाने कहाँ छुपे
ठहर गए आंसू आँखों में
इतनी क्षमता आई
बगावत करने को
हुई बाध्य वह
अब सहन न कर पाएगी
हिंसा और अत्याचार
है आज की नारी
नहीं अब बेचारी |
आशा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Your reply here: