11 फ़रवरी, 2010

हाट बाज़ार


भीड़ भरे बाजार में
एक मूक दर्शक सी खड़ी हूँ
कई लोग लगे  मोल भाव में
कभी  झुके तो कभी अड़े हैं
देख सजी दुकानों को
मन करता सब कुछ ले लूं
इतने में एक क्रेता ने
बार बार कीमत पूँछी
सब्जी वाली तुनक गयी
गुस्से में नाक फुला बोली
यह सब लेने की
है तेरी  औकात नहीं
चल निकल यहाँ से
ना  कर मेरा  समय खोटी
पर वह कैसे टल जाता
अपमान कैसे सह पाता
लगा आवाज बढाने में
तोल मोल बदला  शोर में
हुई बारिश अपशब्दों की
हाल बद से बदतर हुआ
छीनाझपटी  मारामारी
हुई हावी पुरजोर
अवसाद से मन भरा
कई प्रश्नों ने घेरा
ऐसा क्यूं होता है ?
हर  वस्तु का मूल्य
क्यूं  सही नहीं होता ?
यहाँ  सीघा ठगा जाता
चतुर  सयाना सब पाता
पर  मुझ सा रह जाता
डरा हुआ सहमा सा
क्या हर हाट में
 बाजार में यही होता है ?
सोच सोच कर थक जाती हूँ
इस मोल भाव की दुनिया में
जीवन से कटती जाती हूँ
भीड़ भरे बाजार में
जाने कहाँ खो जाती हूँ
खुद को बहुत अकेला पाती हूँ |
आशा


























2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रत्येक हाट बाज़ार का शायद यही चरित्र है | यहाँ सदैव उन्हीं का बोलबाला और वर्चस्व रहता है जो चतुर सुजान होते हैं | सामान्य जन कदाचित केवल ठगे जाने के लिये ही होते हैं | सुन्दर दार्शनिक अभिव्यक्ति |

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  2. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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