05 दिसंबर, 2010

नहीं होता जीवन एक रस


नहीं होता जीवन एक रस
कभी सरस तो कभी नीरस
जब होता जीवन संगीत मय
 हँसी खुशी रहती है
तभी जन्म ले पाती हैं
राग रागिनी और मधुर धुनें
जब हो जाता जीवन अशांत
थम जाता मधुर संगीत
धुनें या तो बनती ही नहीं
बन भी जायें यदि
मधुरता हो जाती गुम
समय के साथ-साथ
होते परिवर्तन दोनों में
समय निर्धारित है
हर राग गाने का
सही समय पर गाया जाये
तभी मधुर लगता है
बेसमय गाया राग
कर्ण कटु लगता है
समानता दोनों में है
पर है एक अन्तर भी
जीवन तो क्षणभंगुर है
संगीत स्थाईत्व लिये है
प्रकृति के हर कोने में
बिखरा पड़ा है संगीत
है यह मानव प्रकृति
उसे किस रूप में अपनाए
अपने कितने निकट पाए 
सृजन संगीत का
समय के साथ होता जाता है |


आशा

9 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा है ..हमेशा एक सी बात सरस नहीं लगती ..तभी तो आज कल मुन्नी और शीला धूम मचा रही हैं

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  2. aasaa ji, jaisaa naam vaisaa gun. sundar kavita, ek sandesh, ek satya. vadhaai. harendra

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  3. सुंदर रचना। विचारणीय मुद्दा।

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  4. प्रकृति के हर कौने मै ,
    बिखरा पड़ा है संगीत ,
    है यह मानव प्रकृति ,
    उसे किस रूप मै अपनाता है ,,
    अपने कितने निकट पाता है ....
    जीवन भी ऐसा ही है ...कैसे कौन जीता है ...
    सुन्दर आशावादी कविता ...
    आभार !

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  5. बहुत सुन्दर रचना ! जीवन में संगीत भी तभी मधुर और सुखदायी लगता है जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं अन्यथा मधुर से मधुर राग भी कोलाहल सा लगता है !

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  6. सुन्दर कविता.. मन को छूती हुई.. प्रेरणा देती हुई

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  7. प्रेरणा देती हुई सुन्दर कविता........आशा माँ

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  8. साथ हैं केवल यादें ,
    जो बार बार साकार हो ,
    स्मृति पटल पर,
    रखी किताब के ,
    पिछले पन्ने खोल देती हैं
    --
    यादों को लेकर मनोभावों का बढ़िया विश्लेषण किया है आपने!

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