01 अप्रैल, 2012

झीना आवरण


वे व्यस्त नजर आते 
जीवन की आपाधापी मे 
अभ्यस्त  नजर आते 
मनोभाव छिपाने में 
आवरण से ढके 
सत्य स्वीकारते नहीं 
झूट हजारों के
सत्य स्वीकारते नहीं
हर वार से बचना चाहते
ढाल साथ रखते
व्यंग वाणों से बचने के लिए
सीधे बने रहने के लिए
यह तक भूल जाते
है आवरण बहुत झीना
जाने कब हट जाए
हवा के किसी  झोंके से
कितना क्या प्रभाव होगा
जब बेनकाब चेहरा होगा
सोचना नहीं चाहते
बस यूं  ही जिये जाते
अनावृत होते ही
जो कुछ भी दिखाई देगा
होगी फिर जो प्रतिक्रया
वह कैसे सहन होगी
है वर्तमान की सारी महिमा
कल को किसने देखा है
बस यही है अवधारणा
मनोभाव छिपाने की |


आशा

19 टिप्‍पणियां:

  1. है वर्तमान की सारी महिमा
    कल को किसने देखा है
    सुन्दर भाव... बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आभार...

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  2. बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आभार|सादर|

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  3. है वर्तमान की सारी महिमा
    कल को किसने देखा है
    बस यही है अवधारणा
    मनोभाव छिपाने की |
    बहुत ही सटीक और बेहतरीन अभिव्यक्ति....

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  4. बहुत ख़ूबसूरत और सटीक प्रस्तुति...आभार

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  5. बहुत सुन्दर...............

    जब तक धक जाये धक जाये..........

    सादर.

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  6. वाह!!!!!बहुत सुंदर रचना,क्या बात है,बेहतरीन भाव अभिव्यक्ति,

    MY RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तुम्हारा चेहरा,

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 02-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ

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  8. बस यही है अवधारणा मानोभावना छुपाने की ....वाह बहुत खूब बेहतरीन भवाव्यक्ति

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  9. बेनकाब चेहरों की वीभत्सता जब उजागर होती है तो वह अनावृत होने वाले और जो उसे अनावृत होते हुए देखते हैं सभी के लिए शर्मिंदगी का कारण बन जाती है इसीलिये दोनों के बीच झीने आवरण का एक पर्दा बना रहे वही अच्छा है ! बहुत सुन्दर रचना ! बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  10. ...आवरण बहुत झीना
    जाने कब हट जाए
    हवा के किसी झोंके से
    कितना क्या प्रभाव होगा
    जब बेनकाब चेहरा होगा....

    गहनता से बुने भाव... सुंदर रचना...
    सादर।

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  11. है वर्तमान की सारी महिमा
    कल को किसने देखा है
    बस यही है अवधारणा
    मनोभाव छिपाने की |

    वर्तमान में जीना ही सही है. गंभीर भाव की रचना. बधाई एवं शुभकामनायें.

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